मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सप्लाई बाधित होने के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा रणनीति में एक बड़ा बदलाव दिखाया है। दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल भारत, जो अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, अब तेजी से रूस की ओर झुकता नजर आ रहा है। पिछले कुछ महीनों में रूसी तेल की खरीद में अचानक आई तेजी इस बात का संकेत है कि वैश्विक हालात भारत को नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
मिडिल ईस्ट संकट और तेल बाजार पर असर
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। खासकर होर्मुज रूट, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, वहां तनाव के कारण सप्लाई पर खतरा बना हुआ है। यह वही रास्ता है जिससे दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है। ऐसे में अगर यहां किसी तरह की रुकावट आती है, तो उसका सीधा असर तेल की कीमतों और उपलब्धता पर पड़ता है।
भारत जैसे देश, जो खाड़ी देशों – सऊदी अरब, इराक और यूएई – से बड़े पैमाने पर तेल आयात करते हैं, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। यही वजह है कि भारतीय रिफाइनिंग कंपनियां अब वैकल्पिक स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ रही हैं।
रूस से आयात में जबरदस्त बढ़ोतरी
डेटा और विश्लेषण देने वाली कंपनी केप्लर के अनुसार, मार्च 2026 में भारत ने रूस से औसतन 19 लाख बैरल प्रति दिन (1.98 मिलियन bpd) कच्चा तेल आयात किया। यह जून 2023 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। हालांकि अप्रैल में यह आंकड़ा कुछ घटकर करीब 15.7 लाख बैरल प्रति दिन रह गया, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट अस्थायी है।
इस गिरावट की मुख्य वजह मांग में कमी नहीं, बल्कि गुजरात स्थित नयारा एनर्जी की रिफाइनरी में मेंटेनेंस के चलते उत्पादन में कमी है। जैसे ही यह काम पूरा होगा, आयात फिर से बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

क्यों रूस बन रहा है पहली पसंद?
रूस से तेल खरीदने के पीछे सबसे बड़ा कारण कीमत और उपलब्धता है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण रूस अपना तेल डिस्काउंट पर बेच रहा है, जिसका फायदा भारत और चीन जैसे देश उठा रहे हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मिडिल ईस्ट में तनाव बना रहेगा और सप्लाई बाधित रहेगी, तब तक भारत रूस से अधिकतम तेल खरीदने की कोशिश करता रहेगा। सिंगापुर की एक कंसल्टेंसी फर्म की प्रमुख वंदना हरि के अनुसार, भारत इस समय हर उस बैरल को खरीदने की कोशिश कर रहा है जो उसे रूस से मिल सकता है।
अमेरिकी दबाव और भारत की रणनीति
हालांकि रूस से तेल खरीदना पूरी तरह आसान नहीं है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हुए हैं। पहले भारत ने इन प्रतिबंधों के डर से कुछ हद तक खरीदारी कम की थी, खासकर रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसी कंपनियों से।
लेकिन मौजूदा हालात में भारत का रुख थोड़ा बदल गया है। भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों को उम्मीद है कि अमेरिका से मिलने वाली छूट (waiver) आगे भी जारी रह सकती है। और अगर ऐसा नहीं भी होता, तो भी सीमित विकल्पों के चलते भारत रूस से तेल खरीदना जारी रख सकता है।
सरकार का भी यही रुख है कि देश की ऊर्जा जरूरतें सबसे पहले हैं। तेल मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने साफ कहा है कि भारत का लक्ष्य घरेलू मांग को पूरा करना है, और इसके लिए जो भी विकल्प आर्थिक और तकनीकी रूप से सही होंगे, उन्हें अपनाया जाएगा।
समुद्र में अटके तेल का कम होना
पिछले साल जब भारत ने अमेरिकी दबाव के चलते रूसी तेल की खरीद धीमी कर दी थी, तब समुद्र में बड़ी मात्रा में तेल टैंकरों में जमा हो गया था। जनवरी 2026 तक करीब 15.5 करोड़ बैरल तेल समुद्र में खड़ा था।
अब यह आंकड़ा घटकर लगभग 10 करोड़ बैरल रह गया है। इसका मतलब है कि भारत ने न केवल नई खरीद बढ़ाई है, बल्कि पुराने अटके हुए शिपमेंट्स को भी तेजी से प्रोसेस किया है।
होर्मुज रूट क्यों है इतना अहम?
होर्मुज जलडमरूमध्य ओमान और ईरान के बीच स्थित एक संकीर्ण समुद्री रास्ता है, जो वैश्विक ऊर्जा सप्लाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
- दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल यहीं से गुजरता है
- खाड़ी देशों से भारत आने वाला अधिकांश तेल इसी रास्ते से आता है
- यहां किसी भी तरह का तनाव सीधे वैश्विक बाजार को प्रभावित करता है
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने पर कई बार इस रास्ते को बंद करने की धमकी दी गई है, जिससे तेल की कीमतों में उछाल देखा जाता है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर असर
भारत के लिए यह स्थिति एक बड़ी चुनौती और अवसर दोनों है। एक तरफ जहां सप्लाई में बाधा का खतरा है, वहीं दूसरी तरफ रूस जैसे देशों से सस्ते तेल का विकल्प भी उपलब्ध है।
भारत की रणनीति अब “डाइवर्सिफिकेशन” यानी अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदने की ओर बढ़ रही है। इससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम होगी और संकट के समय भी सप्लाई बनी रहेगी।
आगे क्या हो सकता है?
आने वाले महीनों में कई चीजें तय करेंगी कि भारत की तेल रणनीति किस दिशा में जाएगी:
- मिडिल ईस्ट में तनाव कम होता है या बढ़ता है
- अमेरिका रूस पर प्रतिबंधों को कितना सख्त बनाता है
- वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें किस स्तर पर रहती हैं
अगर हालात ऐसे ही बने रहते हैं, तो रूस भारत के लिए एक प्रमुख सप्लायर बना रह सकता है।
निष्कर्ष:
मिडिल ईस्ट संकट ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि वैश्विक राजनीति का सीधा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। भारत ने इस चुनौती का सामना करने के लिए तेजी से अपनी रणनीति बदली है और रूस की ओर झुकाव बढ़ाया है।
लेकिन यह फैसला केवल तात्कालिक नहीं है, बल्कि इसमें लंबे समय की सोच भी शामिल है। भारत अब ऐसी ऊर्जा नीति की ओर बढ़ रहा है, जो लचीली हो, विविध हो और संकट के समय भी देश की जरूरतों को पूरा कर सके।

