नई दिल्ली में हाल ही में हुई उच्च-स्तरीय मुलाकात ने भारत और दक्षिण कोरिया के रिश्तों को एक नए मोड़ पर ला दिया है। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता – खासतौर पर पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष – के बीच दोनों देशों ने अपने आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने का बड़ा फैसला लिया है। इस महत्वपूर्ण बैठक में यह लक्ष्य तय किया गया कि वर्ष 2030 तक दोनों देशों के बीच व्यापार को लगभग दोगुना करते हुए 50 अरब डॉलर तक पहुंचाया जाएगा।
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग तीन दिन की यात्रा पर भारत आए, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ विस्तृत बातचीत की। इस दौरान दोनों देशों के मंत्रियों, अधिकारियों और बड़े उद्योगपतियों ने भी भाग लिया। बातचीत के बाद एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस और बिजनेस लंच का आयोजन हुआ, जिसमें भविष्य की योजनाओं को ठोस रूप देने पर जोर दिया गया।
नई दिशा में बढ़ते रिश्ते
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच संबंध पहले से ही मजबूत माने जाते हैं, लेकिन इस यात्रा ने इन्हें और व्यापक बना दिया है। दोनों देशों ने कुल 25 प्रमुख निर्णयों की घोषणा की, जिनमें तकनीक, रक्षा, ऊर्जा, और औद्योगिक सहयोग जैसे कई अहम क्षेत्र शामिल हैं।
इन फैसलों का मुख्य उद्देश्य न केवल व्यापार बढ़ाना है, बल्कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को अधिक लचीला और भविष्य के लिए तैयार बनाना भी है। खास तौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिज, और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देने पर सहमति बनी है।
व्यापार समझौते में बदलाव की तैयारी
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच 2010 में एक व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) हुआ था। इस समझौते के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार 14 अरब डॉलर से बढ़कर 27 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। हालांकि, भारत के लिए व्यापार संतुलन उतना अनुकूल नहीं रहा है, क्योंकि आयात ज्यादा और निर्यात कम है।
इसी असंतुलन को ठीक करने के लिए अब इस समझौते को अपडेट करने की योजना बनाई गई है, जिसे “CEPA 2.0” कहा जा रहा है। इसका उद्देश्य गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करना, सेवाओं के निर्यात को बढ़ाना और व्यापार को अधिक संतुलित बनाना है। उम्मीद है कि यह नया समझौता प्रधानमंत्री की अगली दक्षिण कोरिया यात्रा के दौरान अंतिम रूप ले सकता है।

रणनीतिक क्षेत्रों में गहरा सहयोग
इस साझेदारी की सबसे खास बात यह है कि दोनों देश केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि रणनीतिक क्षेत्रों में भी गहराई से काम करना चाहते हैं।
सेमीकंडक्टर और AI जैसे आधुनिक क्षेत्रों के अलावा, दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को भी मजबूत करने का फैसला किया है। भारत जहां कुछ रक्षा उपकरणों का आयात करना चाहता है, वहीं दोनों देश मिलकर एंटी-एयरक्राफ्ट गन और मिसाइल सिस्टम जैसे उपकरणों का संयुक्त उत्पादन भी करेंगे। इसके लिए एक “डिफेंस एक्सेलेरेटर” भी शुरू किया गया है, जो स्टार्टअप्स को समर्थन देगा।
शिपबिल्डिंग में नई संभावनाएं
दक्षिण कोरिया दुनिया के सबसे बड़े और उन्नत जहाज निर्माण देशों में से एक है। भारत इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ना चाहता है, खासकर जब वह तेल और उर्वरक जैसे आयात-निर्यात के लिए नए रास्ते तलाश रहा है।
इसी दिशा में एक बड़ा समझौता हुआ है, जिसके तहत एक नई ग्रीनफील्ड शिपयार्ड परियोजना दक्षिण भारत में विकसित की जाएगी। इसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होगा, बड़े जहाजों के निर्माण के लिए ड्राई डॉक बनाए जाएंगे, और मौजूदा सुविधाओं को भी अपग्रेड किया जाएगा।
इसके अलावा, कोरिया की एजेंसी भारत में कौशल प्रशिक्षण भी देगी, जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।
निवेश और SMEs की भूमिका
अब तक भारत में दक्षिण कोरिया का निवेश मुख्य रूप से बड़ी कंपनियों जैसे सैमसंग के जरिए हुआ है। लेकिन अब ध्यान छोटे और मध्यम उद्योगों (SMEs) पर है।
राष्ट्रपति ली ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि भारत में केवल 700 कोरियाई कंपनियां ही काम कर रही हैं, जबकि यह संख्या कई गुना ज्यादा हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत में “कोरियन इंडस्ट्रियल टाउनशिप” स्थापित करने का फैसला किया गया है, जिससे छोटे उद्योगों को भारत में काम करने में आसानी होगी।
दोनों देशों का मानना है कि SMEs ही भविष्य में व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएंगे।
नई संस्थाएं और पहल
इस साझेदारी को मजबूत बनाने के लिए कई नई संस्थाओं और मंचों की घोषणा की गई है। इनमें एक “इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन कमेटी” शामिल है, जो निवेश और व्यापार से जुड़ी समस्याओं को सुलझाएगी।
इसके अलावा, “इंडिया-कोरिया फाइनेंशियल फोरम” शुरू किया गया है, जिससे दोनों देशों के बीच पूंजी का प्रवाह आसान होगा। साथ ही, “डिजिटल ब्रिज” के जरिए तकनीकी सहयोग को बढ़ावा दिया जाएगा।
एक और अहम पहल “इकोनॉमिक सिक्योरिटी डायलॉग” है, जो सप्लाई चेन और महत्वपूर्ण तकनीकों पर ध्यान देगा।
डिजिटल और तकनीकी सहयोग
आज के दौर में डिजिटल तकनीक किसी भी देश की प्रगति का आधार बन चुकी है। इसी को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों ने डिजिटल क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है।
AI, सेमीकंडक्टर और IT के अलावा, दोनों देश इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सिस्टम को भी जोड़ने पर सहमत हुए हैं। इससे दोनों देशों के नागरिक एक-दूसरे के यहां यात्रा के दौरान अपने ही देश के QR कोड से भुगतान कर सकेंगे।
यह कदम न केवल सुविधा बढ़ाएगा, बल्कि पर्यटन और व्यापार को भी गति देगा।
सांस्कृतिक जुड़ाव भी होगा मजबूत
भारत और दक्षिण कोरिया के रिश्ते केवल आर्थिक या रणनीतिक नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी गहरे हो रहे हैं। भारत में के-पॉप और के-ड्रामा की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है, वहीं कोरिया में भारतीय फिल्मों और संस्कृति को भी पहचान मिल रही है।
इस सांस्कृतिक जुड़ाव को और मजबूत करने के लिए 2028 में “इंडिया–कोरिया फ्रेंडशिप फेस्टिवल” आयोजित करने की योजना बनाई गई है। इसके जरिए दोनों देशों के लोग एक-दूसरे की संस्कृति को और करीब से समझ सकेंगे।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में साझेदारी
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और वैश्विक तनावों के बीच भारत और दक्षिण कोरिया की यह साझेदारी एक सकारात्मक संदेश देती है। दोनों देशों ने साफ कहा कि वे शांति, स्थिरता और समावेशी विकास के पक्षधर हैं।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी दोनों देशों की सोच मिलती-जुलती है, जिससे उनकी साझेदारी और मजबूत होती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह साझेदारी “चिप्स से लेकर शिप्स, और टैलेंट से लेकर टेक्नोलॉजी” तक फैली हुई है, जो भविष्य के लिए नए अवसर पैदा करेगी।
आगे का रास्ता
इस पूरी बैठक का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि भारत और दक्षिण कोरिया अपने रिश्तों को केवल मौजूदा स्तर पर बनाए रखने के बजाय उन्हें अगले स्तर तक ले जाना चाहते हैं।
व्यापार बढ़ाने, तकनीकी सहयोग, रक्षा साझेदारी, और सांस्कृतिक संबंध – इन सभी क्षेत्रों में लिए गए फैसले इस दिशा में एक मजबूत कदम हैं।
हालांकि, 50 अरब डॉलर के लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं होगा। इसके लिए दोनों देशों को नीतिगत सुधार, निवेश बढ़ाने, और व्यापार बाधाओं को कम करने जैसे कई कदम उठाने होंगे।
फिर भी, जिस तरह से दोनों देशों ने इस यात्रा के दौरान स्पष्ट रोडमैप तैयार किया है, उससे यह उम्मीद जरूर बनती है कि यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि भारत और दक्षिण कोरिया की यह नई साझेदारी न केवल दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक सकारात्मक उदाहरण पेश करेगी – जहां सहयोग, नवाचार और आपसी विश्वास के जरिए विकास का रास्ता तैयार किया जाता है।

