अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अब एक बार फिर बातचीत का दौर तेज हो गया है। दोनों देश सार्वजनिक तौर पर यह संकेत दे रहे हैं कि वे किसी समझौते तक पहुंचना चाहते हैं, लेकिन असली समस्या वहीं अटकी हुई है – ईरान का संवर्धित (एनरिच्ड) यूरेनियम भंडार।
जहां एक तरफ अमेरिका चाहता है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार न बना सके, वहीं ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को अपनी संप्रभुता और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा अधिकार बता रहा है। इसी टकराव ने बातचीत को बेहद जटिल बना दिया है।
ट्रंप का दावा: “ईरान देगा न्यूक्लियर डस्ट”
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने हाल ही में बड़ा दावा किया कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम (एनरिच्ड यूरेनियम) को छोड़ने के लिए तैयार हो गया है। उन्होंने इसे “न्यूक्लियर डस्ट” कहा।
व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि समझौते की संभावना काफी मजबूत है और बातचीत सही दिशा में बढ़ रही है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगर यह डील होती है तो इसका असर सिर्फ परमाणु मुद्दे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र में स्थिरता आ सकती है।
ट्रंप के मुताबिक, इस समझौते से तेल की सप्लाई आसान हो सकती है, Strait of Hormuz खुला रह सकता है और क्षेत्र में तनाव कम हो सकता है।
हालांकि, उनकी इस आशावादी टिप्पणी के बावजूद, जमीनी हकीकत थोड़ी अलग नजर आती है।
21 घंटे की बातचीत, लेकिन नतीजा शून्य
हाल ही में इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच लंबी बातचीत हुई, जो करीब 21 घंटे चली। लेकिन इसके बावजूद कोई ठोस समझौता सामने नहीं आया।
सूत्रों के मुताबिक, बातचीत में कई अहम मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी, खासकर यूरेनियम संवर्धन को लेकर। यही कारण है कि भले ही बयान सकारात्मक हों, लेकिन असल में स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।

ईरान का रुख: “यूरेनियम संवर्धन हमारा अधिकार”
ईरान के लिए यूरेनियम संवर्धन सिर्फ तकनीकी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उसकी राष्ट्रीय नीति का अहम हिस्सा है। तेहरान साफ कर चुका है कि वह किसी भी हालत में इस प्रक्रिया को पूरी तरह बंद नहीं करेगा।
ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और इसका मकसद सिर्फ बिजली उत्पादन और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है।
देश ने 2041 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को 20 गीगावॉट तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन फिलहाल स्थिति काफी सीमित है।
बुशेहर प्लांट और ऊर्जा की चुनौती
ईरान का एकमात्र सक्रिय परमाणु संयंत्र Bushehr Nuclear Power Plant है, जिसकी क्षमता करीब 1000 मेगावॉट है। यह देश की कुल बिजली उत्पादन का लगभग 1% ही पूरा करता है।
ईरान में करीब 25,000 मेगावॉट की ऊर्जा कमी बताई जाती है। इस कमी को पूरा करने के लिए उसे बुशेहर जैसे करीब 25 नए संयंत्र बनाने होंगे – जो एक लंबी और महंगी प्रक्रिया है।
बढ़ता यूरेनियम भंडार, बढ़ती चिंता
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा चिंता ईरान के बढ़ते यूरेनियम भंडार को लेकर है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 2025 में अमेरिकी और इजरायली हमलों से पहले ईरान के पास 60% तक संवर्धित 400 किलोग्राम से ज्यादा यूरेनियम और 20% स्तर का करीब 200 किलोग्राम यूरेनियम मौजूद था।
यह स्तर सामान्य ऊर्जा उत्पादन के लिए जरूरी सीमा से काफी ज्यादा है और इसे आगे बढ़ाकर 90% तक ले जाया जा सकता है, जो हथियार बनाने के लिए जरूरी होता है।
हालांकि, ईरान लगातार इस बात से इनकार करता रहा है कि वह परमाणु हथियार बनाना चाहता है।
अमेरिका की चिंता: “जोखिम अभी भी बरकरार”
अमेरिका का मानना है कि भले ही ईरान के पास अभी परमाणु हथियार न हो, लेकिन उसकी मौजूदा क्षमता उसे जल्दी ही यह क्षमता हासिल करने की स्थिति में ला सकती है।
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता Olivia Wales ने साफ कहा कि अमेरिका कभी भी ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं देगा।
अमेरिका ने इसीलिए सख्त शर्तें रखी हैं – जैसे यूरेनियम संवर्धन पर रोक और मौजूदा भंडार को खत्म करना या बाहर भेजना।
लंबी रोक बनाम छोटी अवधि: यहीं फंसी बात
अमेरिका चाहता है कि ईरान कम से कम 20 साल तक यूरेनियम संवर्धन रोक दे। वहीं ईरान ने 3 से 5 साल तक के अस्थायी रोक का प्रस्ताव दिया है।
यह अंतर ही दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी बाधा बन गया है। अमेरिका स्थायी समाधान चाहता है, जबकि ईरान अपनी तकनीकी क्षमता छोड़ने को तैयार नहीं है।
रूस का प्रस्ताव और अमेरिका का इनकार
इस बीच Russia ने एक समाधान भी सुझाया था। रूस ने प्रस्ताव दिया कि वह ईरान के यूरेनियम को अपने पास रखेगा और उसे नागरिक उपयोग के लिए ईंधन में बदल देगा।
लेकिन अमेरिका ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उसे डर है कि इससे ईरान को अप्रत्यक्ष रूप से अपने परमाणु कार्यक्रम तक पहुंच मिलती रहेगी।
IAEA की भूमिका और जमीनी स्थिति
अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी International Atomic Energy Agency (IAEA) के प्रमुख Rafael Grossi के अनुसार, ईरान का परमाणु सामग्री मुख्य रूप से दो जगहों पर मौजूद है – इस्फहान और नतांज।
इनमें से कई सुविधाएं जमीन के नीचे बनी हुई हैं, जिससे उन पर निगरानी और कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है।
JCPOA से बाहर निकलने का असर
इस पूरे विवाद की जड़ 2015 का परमाणु समझौता Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) है।
इस समझौते के तहत ईरान ने अपने यूरेनियम भंडार को 98% तक कम किया था और संवर्धन स्तर को 3.67% तक सीमित रखा था।
लेकिन 2018 में Donald Trump ने अमेरिका को इस समझौते से बाहर निकाल लिया और ईरान पर फिर से प्रतिबंध लगा दिए।
इसके बाद ईरान ने भी धीरे-धीरे अपने वादों से पीछे हटना शुरू कर दिया और संवर्धन स्तर बढ़ा दिया।
आगे क्या?
इस समय स्थिति बेहद नाजुक है। एक तरफ बातचीत जारी है और उम्मीद जताई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ बड़े मुद्दों पर सहमति बनना अभी बाकी है।
ईरान अपने अधिकारों से पीछे हटने को तैयार नहीं है, जबकि अमेरिका सुरक्षा से समझौता नहीं करना चाहता।

