Iran-US Talks: सीजफायर के बाद फिर बढ़ा तनाव, ईरान ने अमेरिका को क्यों दी युद्ध की चेतावनी?

Iran-US Talks

Iran-US Talks: ईरान और अमेरिका के बीच हाल के युद्धविराम (Ceasefire) के बाद शुरू हुई कूटनीतिक प्रक्रिया एक बार फिर तनावपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई है। ईरान ने साफ शब्दों में कहा है कि वह अमेरिका के साथ बातचीत (Diplomacy) जारी रखना चाहता है, लेकिन अगर समझौते की शर्तें लागू नहीं हुईं तो वह युद्ध के लिए भी पूरी तरह तैयार है। दूसरी ओर अमेरिका ने भी संकेत दिए हैं कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Programme) पर ठोस रियायतें नहीं देता, तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प अब भी खुला है। ऐसे में दोनों देशों के बीच जारी बातचीत के बावजूद पश्चिम एशिया में तनाव पूरी तरह खत्म होता नहीं दिख रहा।

ईरान ने युद्ध की चेतावनी क्यों दी?

ईरान की संसद के स्पीकर और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने सरकारी टीवी को दिए इंटरव्यू में कहा कि तेहरान बातचीत को प्राथमिकता देता है, लेकिन यदि अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं करता तो ईरान युद्ध के लिए भी तैयार है और उसका जवाब देगा।

गालिबाफ ने कहा कि ईरान अपने परमाणु अधिकारों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर किसी तरह का समझौता नहीं करेगा। उनके अनुसार यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) ईरान का अधिकार है और यह परमाणु अप्रसार संधि (NPT) तथा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के नियमों के दायरे में किया जा रहा है।

परमाणु कार्यक्रम पर ईरान का रुख

ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह NPT का सदस्य होने के नाते सभी अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन कर रहा है। हालांकि उसने दोहराया कि यूरेनियम संवर्धन पर किसी भी तरह की रोक या उसके परमाणु अधिकारों से समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।

गालिबाफ ने 2015 के JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) का भी जिक्र किया और कहा कि पिछले अनुभवों के कारण ईरान अब केवल अंतरराष्ट्रीय आश्वासनों पर भरोसा नहीं कर सकता। इसलिए किसी भी नए समझौते के लागू होने से पहले उसकी सभी प्रमुख शर्तों का पूरा होना जरूरी है।

किन मुद्दों पर अटका है समझौता?

ईरान का कहना है कि मौजूदा समझौता पूरी तरह लागू होने से पहले पांच प्रमुख बिंदुओं पर स्पष्ट प्रगति जरूरी है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण लेबनान में युद्ध समाप्त करना, वहां की राष्ट्रीय संप्रभुता बहाल करना, तेल निर्यात को सामान्य बनाना और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सुरक्षित नौवहन सुनिश्चित करना शामिल है।

गालिबाफ ने दावा किया कि समझौते के पहले अनुच्छेद के तहत अमेरिका ने लेबनान में सैन्य कार्रवाई समाप्त कराने और लोगों की सुरक्षित वापसी का आश्वासन दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान हॉर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन अमेरिका को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

 

अमेरिका का क्या रुख है?

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने भी साफ किया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प बातचीत जारी रखना चाहते हैं, लेकिन केवल तभी जब ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर स्थायी और सत्यापित (Verifiable) प्रतिबंध स्वीकार करे।

उन्होंने कहा कि यदि कूटनीति विफल होती है तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। वेंस के अनुसार ट्रम्प केवल उसी स्थिति में बल प्रयोग करेंगे जब उससे स्पष्ट रणनीतिक उद्देश्य पूरा होता हो। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ईरान के बयानों से ज्यादा उसके वास्तविक कदमों को महत्व देता है।

 

कतर की क्या भूमिका है?

दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष बातचीत के बजाय कतर एक मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जैरेड कुशनर के साथ बातचीत की है।

कतर ने कहा है कि वह अमेरिका और ईरान के बीच संवाद को आगे बढ़ाने और समझौते को लागू कराने के सभी प्रयासों का समर्थन करता रहेगा। हालांकि दोहा में प्रस्तावित तकनीकी वार्ता तय समय पर नहीं हो सकी, जिससे आगे की बातचीत को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

 

युद्धविराम के बावजूद तनाव क्यों बना हुआ है?

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान 60 दिन का समझौता स्थायी शांति समझौता नहीं बल्कि केवल संघर्ष को अस्थायी रूप से रोकने का माध्यम है। अमेरिका और ईरान के बीच कई मूलभूत विवाद अब भी अनसुलझे हैं।

इनमें ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, ड्रोन क्षमता, क्षेत्रीय सहयोगी संगठन (Proxy Groups) और परमाणु गतिविधियां प्रमुख हैं। यही वजह है कि युद्धविराम के बावजूद दोनों पक्ष लगातार सैन्य विकल्प का जिक्र कर रहे हैं।

 

हॉर्मुज जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हालिया संघर्ष के दौरान इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही काफी घट गई थी, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस मार्ग पर दोबारा तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों और वैश्विक सप्लाई चेन पर सीधा असर पड़ सकता है। यही कारण है कि अमेरिका और खाड़ी देशों के लिए इस क्षेत्र में स्थिरता बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

 

तेल निर्यात और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ा?

ईरान का दावा है कि प्रतिबंधों में ढील मिलने के बाद उसने 4 करोड़ बैरल से अधिक तेल का निर्यात किया है। गालिबाफ के अनुसार इससे पहले करीब दो महीने तक ईरान एक भी बैरल तेल निर्यात नहीं कर पा रहा था।

दूसरी ओर विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के कारण खाड़ी क्षेत्र के कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। पर्यटन, विमानन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों को नुकसान पहुंचा है, जबकि तेल बाजार अभी भी पूरी तरह सामान्य स्थिति में नहीं लौटा है।

 

क्या फिर से युद्ध हो सकता है?

अमेरिका के पूर्व सेंटकॉम (CENTCOM) प्रमुख जनरल जोसेफ वोटेल सहित कई विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल अमेरिकी सेना क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखने में सक्षम है, लेकिन लंबे समय तक यही स्थिति बनाए रखना आसान नहीं होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि बातचीत विफल होती है, किसी प्रॉक्सी संगठन की ओर से हमला होता है या इजरायल कोई एकतरफा सैन्य कार्रवाई करता है, तो क्षेत्र में दोबारा बड़े संघर्ष की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

 

निष्कर्ष

अमेरिका और ईरान के बीच फिलहाल बातचीत और दबाव की नीति साथ-साथ चल रही है। ईरान बातचीत जारी रखना चाहता है लेकिन उसने साफ कर दिया है कि यदि उसकी शर्तें पूरी नहीं हुईं तो वह सैन्य जवाब देने के लिए तैयार है। वहीं अमेरिका भी परमाणु कार्यक्रम पर ठोस रियायतों के बिना समझौते के पक्ष में नहीं है।

यही कारण है कि मौजूदा 60 दिन का समझौता स्थायी शांति की बजाय केवल एक अस्थायी विराम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में दोहा में होने वाली वार्ताएं और दोनों देशों के अगले कदम तय करेंगे कि पश्चिम एशिया शांति की ओर बढ़ेगा या फिर एक नए सैन्य टकराव की ओर।

FAQs:

ईरान का कहना है कि यदि अमेरिका समझौते की शर्तों का पालन नहीं करता और उसके परमाणु अधिकारों का सम्मान नहीं करता, तो वह सैन्य जवाब देने के लिए तैयार है।

सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम संवर्धन, क्षेय सुरक्षा और प्रतिबंधों कोत्री लेकर है।

यह दुनिया के सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि यदि कूटनीति विफल होती है और ईरान आवश्यक रियायतें नहीं देता, तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला रहेगा।

नहीं। मौजूदा 60 दिन का समझौता केवल अस्थायी व्यवस्था है। स्थायी समाधान के लिए अभी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है।