मिडिल ईस्ट में इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अब एक नया खुलासा सामने आया है, जिसने पूरे क्षेत्र की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजराइल ने इराक के पश्चिमी रेगिस्तान में गुप्त सैन्य ठिकाने बनाए थे, जिनका इस्तेमाल ईरान के खिलाफ सैन्य अभियानों के लिए किया जा रहा था। इन ठिकानों की जानकारी तब सामने आई, जब एक स्थानीय चरवाहा गलती से उस इलाके तक पहुंच गया और कुछ ही घंटों बाद उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।
यह मामला अब सिर्फ एक सैन्य ऑपरेशन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे इराक की संप्रभुता, अमेरिका की भूमिका और पूरे क्षेत्र में बढ़ती गुप्त गतिविधियों पर नई बहस शुरू हो गई है।
चरवाहे की आखिरी यात्रा और रहस्यमयी हमला
3 मार्च की दोपहर इराक के पश्चिमी रेगिस्तानी इलाके में रहने वाले 29 वर्षीय अवाद अल-शम्मारी अपनी पिकअप गाड़ी से सामान लेने निकले थे। यह रास्ता स्थानीय लोगों के लिए सामान्य था। लेकिन कुछ घंटों बाद उनकी गाड़ी गोलियों से छलनी और आग में जलती हुई वापस दिखाई दी।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, एक हेलिकॉप्टर लगातार उस गाड़ी का पीछा कर रहा था और उस पर फायरिंग कर रहा था। कुछ देर बाद गाड़ी रेत में रुक गई और वहां आग लग गई। बाद में जब परिवार और स्थानीय लोग वहां पहुंचे, तो उन्हें अवाद का जला हुआ शव मिला।
परिवार का दावा है कि अवाद ने मरने से पहले स्थानीय सैन्य अधिकारियों को फोन कर बताया था कि उसने रेगिस्तान में सैनिकों, हेलिकॉप्टरों और टेंटों वाला एक बड़ा सैन्य कैंप देखा है। इसके बाद ही संपर्क टूट गया।
इसी घटना ने उस गुप्त सैन्य ठिकाने का पर्दाफाश किया, जिसके बारे में अब कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं।

इजराइल का गुप्त अड्डा कैसे चला रहा था ऑपरेशन?
रिपोर्ट्स के अनुसार, इजराइल ने इराक के पश्चिमी रेगिस्तान में कम से कम दो अस्थायी सैन्य अड्डे बनाए थे। इनका इस्तेमाल ईरान के खिलाफ हवाई अभियानों, हेलिकॉप्टर संचालन, ईंधन भरने और घायल सैनिकों के इलाज के लिए किया जा रहा था।
बताया जा रहा है कि यह अड्डे 2024 के अंत से तैयार किए जा रहे थे, ताकि भविष्य में ईरान के खिलाफ संभावित संघर्ष की स्थिति में इजराइल को लंबी दूरी की उड़ानों में आसानी हो सके।

विशेषज्ञों का कहना है कि इराक का पश्चिमी रेगिस्तान बेहद विशाल और कम आबादी वाला क्षेत्र है। इसलिए गुप्त सैन्य गतिविधियों के लिए यह इलाका उपयुक्त माना जाता है। यही वजह है कि इस इलाके में लंबे समय तक किसी को इन ठिकानों की जानकारी नहीं मिली।
इराकी सेना को पहले से था शक
इराकी सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, स्थानीय बेदुइन समुदाय कई हफ्तों से इलाके में संदिग्ध गतिविधियों की सूचना दे रहे थे। सेना को शक था कि रेगिस्तान में कोई विदेशी सैन्य ताकत सक्रिय है।
पश्चिमी यूफ्रेट्स फोर्स के कमांडर मेजर जनरल अली अल-हमदानी ने कहा कि सेना ने सीधे कार्रवाई करने की बजाय दूर से निगरानी शुरू की थी। उन्होंने अमेरिका से भी जानकारी मांगी, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।
जब चरवाहे की सूचना के बाद इराकी सेना जांच के लिए वहां पहुंची, तो उस पर भी हवाई हमला हुआ। इस हमले में एक सैनिक की मौत हो गई और दो घायल हो गए। सेना को पीछे हटना पड़ा।
इसके बाद इराकी संसद में बंद कमरे में सुरक्षा अधिकारियों की बैठक हुई, जिसमें कथित तौर पर इजराइली सैन्य गतिविधियों की जानकारी दी गई।
अमेरिका की भूमिका पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल अमेरिका की भूमिका को लेकर उठ रहा है। कई पूर्व अमेरिकी अधिकारियों और क्षेत्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका को इन सैन्य ठिकानों की जानकारी होना लगभग तय है।
अमेरिका और इजराइल के बीच सैन्य सहयोग बेहद गहरा माना जाता है। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि इजराइल इराक में इतने बड़े स्तर पर गुप्त सैन्य ऑपरेशन चलाए और अमेरिका को इसकी जानकारी न हो।
रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि अमेरिका ने कुछ मौकों पर इराक को अपने रडार सिस्टम बंद करने के लिए कहा था, ताकि अमेरिकी विमानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। इससे इराक की निगरानी क्षमता कमजोर हो गई और विदेशी गतिविधियों का पता लगाना मुश्किल हो गया।
हालांकि अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।
इराक की संप्रभुता पर बड़ा सवाल
इराक की जनता और कई राजनीतिक नेताओं में इस खुलासे के बाद नाराजगी बढ़ रही है। देश के सांसद वाद अल-कदू ने इसे इराक की संप्रभुता का खुला उल्लंघन बताया।
इराक पहले से ही अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा है। एक तरफ देश में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी है, तो दूसरी ओर ईरान समर्थित गुट भी मजबूत हैं।
अब अगर इजराइल ने वास्तव में इराक की जमीन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किया है, तो इससे इराक की स्थिति और कठिन हो सकती है। इससे ईरान समर्थित संगठनों को भी अमेरिका और इजराइल के खिलाफ और आक्रामक रुख अपनाने का मौका मिल सकता है।
इजराइल ने क्यों चुना इराक का रेगिस्तान?
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान पर नजर रखने और हवाई अभियानों के लिए इराक का पश्चिमी रेगिस्तान रणनीतिक रूप से बेहद अहम है।
इजराइल से ईरान की दूरी काफी ज्यादा है। ऐसे में बीच में अस्थायी सैन्य ठिकाने होने से लड़ाकू विमानों और हेलिकॉप्टरों को ईंधन, मरम्मत और मेडिकल सहायता जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं।
इसके अलावा, इराक के इस इलाके में आबादी कम है और निगरानी भी सीमित रहती है। यही कारण है कि यह क्षेत्र गुप्त अभियानों के लिए उपयोगी माना गया।
ईरान की प्रतिक्रिया भी आई सामने
ईरान ने भी इन रिपोर्ट्स पर प्रतिक्रिया दी है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि तेहरान इस मामले को गंभीरता से देख रहा है और इसे इराक सरकार के सामने उठाया जाएगा।
उन्होंने कहा कि इजराइल क्षेत्र में तनाव बढ़ाने और नए संघर्ष पैदा करने की कोशिश करता रहा है। इसलिए इस तरह की गतिविधियों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में फिर से इजराइल और ईरान के बीच सीधा संघर्ष हुआ, तो इराक भी उस तनाव का केंद्र बन सकता है।
क्या इराक बन चुका है छिपा हुआ युद्धक्षेत्र?
पिछले कुछ वर्षों में इराक लगातार क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संघर्ष का मैदान बनता गया है। कभी अमेरिकी हमले, कभी ईरान समर्थित गुटों की गतिविधियां और अब कथित इजराइली गुप्त अड्डों की खबरें यह दिखाती हैं कि इराक पूरी तरह स्थिर नहीं हो पाया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी देश की जमीन पर उसकी जानकारी के बिना विदेशी सैन्य गतिविधियां चल रही हों, तो यह उसकी सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी कमजोरी मानी जाती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इराक वास्तव में इन गतिविधियों से अनजान था, या फिर कुछ स्तर पर जानकारी होने के बावजूद चुप्पी बनाए रखी गई?
चरवाहे की मौत अब भी रहस्य
इस पूरे विवाद के केंद्र में वही चरवाहा है, जिसकी मौत ने यह मामला दुनिया के सामने ला दिया। उसके परिवार का कहना है कि सरकार को इस घटना की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।
परिवार आज भी यह जानना चाहता है कि आखिर अवाद अल-शम्मारी की मौत कैसे हुई और उसके साथ ऐसा क्यों किया गया।
फिलहाल इराक सरकार ने आधिकारिक रूप से इजराइली अड्डों की पुष्टि नहीं की है। लेकिन लगातार सामने आ रही रिपोर्ट्स ने पूरे मिडिल ईस्ट में नई बेचैनी पैदा कर दी है। अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में इराक, अमेरिका, इजराइल और ईरान इस मामले पर क्या कदम उठाते हैं।

