Kalapani Lipulekh Dispute: नेपाल ने चीन में फिर उठाया कालापानी-लिपुलेख विवाद, जानिए क्या है पूरा मामला?

 

Kalapani Lipulekh Dispute: नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने चीन की राजधानी बीजिंग में चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ हुई बैठक में एक बार फिर कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख विवाद का मुद्दा उठाया है। इस कदम ने दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक बार फिर उस सीमा विवाद को चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जो पिछले कई वर्षों से भारत और नेपाल के बीच तनाव का कारण बना हुआ है।

बैठक के दौरान खनाल ने भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे के उपयोग को लेकर हुए समझौतों पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि नेपाल की सहमति के बिना इस मार्ग को लेकर किस आधार पर व्यवस्था बनाई गई। इसके जवाब में वांग यी ने कहा कि यह मूल रूप से भारत और नेपाल के बीच का मुद्दा है और इसका समाधान भी दोनों देशों को बातचीत के जरिए ही निकालना चाहिए।

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नेपाल का यह रुख नया नहीं है। काठमांडू लगातार दावा करता रहा है कि कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख उसके क्षेत्र का हिस्सा हैं। वहीं भारत इन इलाकों को उत्तराखंड का अभिन्न हिस्सा मानता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कालापानी-लिपुलेख विवाद (Kalapani Lipulekh Dispute) क्या है, इसकी शुरुआत कैसे हुई और इसमें चीन की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है?

 

क्या है Kalapani Lipulekh Dispute?

कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख हिमालयी क्षेत्र में स्थित ऐसे इलाके हैं, जहां भारत, नेपाल और चीन की सीमाएं एक-दूसरे के करीब आती हैं। यह क्षेत्र सामरिक, आर्थिक और धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

विवाद मुख्य रूप से कालापानी घाटी और उससे जुड़े इलाकों को लेकर है। भारत और नेपाल दोनों इन क्षेत्रों पर अपना दावा करते हैं। इस विवाद की जड़ें 19वीं सदी में हुए एक ऐतिहासिक समझौते तक जाती हैं, जिसकी अलग-अलग व्याख्या दोनों देशों द्वारा की जाती है।

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1816 की सुगौली संधि से कैसे जुड़ा है विवाद?

भारत और नेपाल के बीच सीमा निर्धारण का आधार 1816 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के गोरखा शासकों के बीच हुई सुगौली संधि को माना जाता है।

इस संधि के अनुसार काली नदी को दोनों देशों की सीमा माना गया था। समझौते में यह तय हुआ कि काली नदी के पश्चिम का क्षेत्र ब्रिटिश भारत के अधीन होगा, जबकि नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल का हिस्सा माना जाएगा।

यहीं से विवाद शुरू होता है। दोनों देशों के बीच मतभेद इस बात पर है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम स्थल कहां है।

भारत का कहना है कि नदी की पूर्वी धारा वास्तविक काली नदी है, जबकि नेपाल का दावा है कि नदी की शुरुआत पश्चिमी धारा यानी लिम्पियाधुरा क्षेत्र से होती है। इसी अलग-अलग व्याख्या के कारण कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख पर दोनों देशों के दावे टकराते हैं।

 

कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?

यह विवाद केवल जमीन के एक छोटे से हिस्से का नहीं है। इसके पीछे कई रणनीतिक और आर्थिक कारण भी जुड़े हुए हैं। लिपुलेख दर्रा भारत और तिब्बत के बीच सदियों पुराने व्यापारिक मार्ग का हिस्सा रहा है। ऐतिहासिक रूप से भारतीय व्यापारी कपड़ा, अनाज और मसाले लेकर तिब्बत जाते थे, जबकि तिब्बती व्यापारी ऊन, नमक और बोरेक्स भारत लाते थे।

इसके अलावा यह दर्रा कैलाश मानसरोवर यात्रा का भी प्रमुख मार्ग है। हर साल हजारों भारतीय श्रद्धालु इसी रास्ते से तिब्बत स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील की यात्रा करते हैं।

सामरिक दृष्टि से भी यह इलाका बेहद संवेदनशील है क्योंकि यह भारत-चीन सीमा के बेहद करीब स्थित है। इसलिए इस क्षेत्र पर नियंत्रण को राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़कर देखा जाता है।

 

2020 में विवाद अचानक क्यों बढ़ गया?

हालांकि यह विवाद दशकों पुराना है, लेकिन 2020 में यह अचानक सुर्खियों में आ गया। मई 2020 में भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख तक करीब 80 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण पूरा किया। भारत का कहना था कि इससे कैलाश मानसरोवर यात्रा सुगम होगी और सीमावर्ती क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बेहतर बनेगी।

नेपाल ने इस परियोजना का विरोध किया और दावा किया कि सड़क उसके क्षेत्र से होकर गुजरती है। इसके कुछ ही दिनों बाद नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर दिया, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाली क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया। भारत ने नेपाल के इस कदम को “एकतरफा” और “ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत” बताया था।

 

भारत-चीन समझौते पर नेपाल को आपत्ति क्यों है?

भारत और चीन ने 2020 में लिपुलेख दर्रे के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा और सीमा पार व्यापार को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी।

नेपाल का कहना है कि जिस क्षेत्र पर वह अपना दावा करता है, उससे जुड़ा कोई भी समझौता उसकी सहमति के बिना नहीं किया जा सकता। इसी कारण नेपाल ने भारत और चीन दोनों को राजनयिक विरोध पत्र भेजा था।

हालांकि भारत और चीन ने इस मार्ग का उपयोग जारी रखा और हाल ही में दोनों देशों के बीच सीमावर्ती व्यापार को फिर से शुरू करने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं।

 

छह साल बाद फिर शुरू हो रहा है लिपुलेख व्यापार

गलवान घाटी संघर्ष के बाद भारत-चीन के बीच कई व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुई थीं। लिपुलेख मार्ग से होने वाला व्यापार भी बंद हो गया था।

अब लगभग छह साल बाद इस व्यापार को फिर से शुरू करने की तैयारी हो रही है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से करीब 300 व्यापारियों के नाम विदेश मंत्रालय को भेजे गए हैं। इन व्यापारियों को विशेष ट्रेड पास के माध्यम से तिब्बत के तकलाकोट बाजार तक जाने की अनुमति दी जाएगी।

इस बार सड़क संपर्क बेहतर होने से व्यापारियों को काफी सुविधा मिलेगी। पहले जहां सामान घोड़ों और खच्चरों के जरिए पहुंचाया जाता था, अब वाहन सीधे सीमा तक जा सकेंगे।

 

नेपाल ने भारत के बजाय चीन में यह मुद्दा क्यों उठाया?

दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में भारत यात्रा के दौरान शिशिर खनाल ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बातचीत की थी, लेकिन उस दौरान कालापानी-लिपुलेख विवाद सार्वजनिक रूप से नहीं उठाया गया।

संयुक्त बयान में भी इस विषय का उल्लेख नहीं था। इसके विपरीत, बीजिंग में उन्होंने यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया।

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल एक तरफ अपने क्षेत्रीय दावे को जीवित रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ भारत और चीन दोनों के साथ संतुलित संबंध भी बनाए रखना चाहता है। इसलिए वह समय-समय पर इस मुद्दे को उठाकर अपनी स्थिति स्पष्ट करता रहता है।

 

इस मुद्दे पर भारत का क्या रुख है?

भारत लगातार कहता रहा है कि कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा हैं। नई दिल्ली का तर्क है कि यह इलाका लंबे समय से भारतीय प्रशासनिक नियंत्रण में है और भारत वहां बुनियादी ढांचे का विकास भी करता रहा है।

विदेश मंत्रालय कई बार दोहरा चुका है कि भारत नेपाल के साथ सभी सीमा संबंधी मुद्दों का समाधान शांतिपूर्ण बातचीत और कूटनीतिक प्रक्रिया के जरिए चाहता है।

हाल ही में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी कहा कि भारत नेपाल के साथ संवाद और आपसी समझ के माध्यम से विवादों को सुलझाने के पक्ष में है।

 

चीन की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है?

हालांकि चीन सीधे तौर पर इस विवाद का पक्षकार नहीं है, लेकिन लिपुलेख दर्रा तिब्बत से जुड़ा होने के कारण उसका हित इस क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।

वांग यी की हालिया टिप्पणी से यह संकेत मिला है कि चीन इस विवाद में सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय इसे भारत और नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मुद्दा मानता है। हालांकि क्षेत्रीय रणनीति और सीमावर्ती व्यापार के कारण चीन की भूमिका पूरी तरह से नजरअंदाज भी नहीं की जा सकती।

 

आगे क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में इस विवाद का कोई त्वरित समाधान निकलना मुश्किल है। इसके पीछे ऐतिहासिक दस्तावेजों की अलग-अलग व्याख्या, राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलू और घरेलू राजनीतिक दबाव जैसे कई कारण हैं।

हालांकि भारत और नेपाल दोनों ही सार्वजनिक रूप से यह कहते रहे हैं कि सीमा विवाद का समाधान बातचीत के जरिए निकाला जाएगा। इसलिए संभावना यही है कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर वार्ता जारी रहेगी।

 

निष्कर्ष

Kalapani Lipulekh Dispute केवल सीमा विवाद नहीं बल्कि इतिहास, भूगोल, कूटनीति और सामरिक हितों से जुड़ा एक जटिल मुद्दा है। नेपाल का दावा सुगौली संधि और काली नदी की अपनी व्याख्या पर आधारित है, जबकि भारत अपने प्रशासनिक नियंत्रण और ऐतिहासिक रिकॉर्ड को आधार मानता है।

हालिया घटनाक्रम में नेपाल द्वारा चीन के सामने यह मुद्दा उठाने से विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। हालांकि चीन ने इसे भारत और नेपाल का द्विपक्षीय मामला बताया है। ऐसे में इस विवाद का स्थायी समाधान केवल भारत और नेपाल के बीच संवाद और आपसी सहमति से ही संभव नजर आता है।

 

FAQs

Q. What is the Kalapani-Lipulekh dispute?

Ans: कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख क्षेत्र को लेकर भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद है। दोनों देश काली नदी के वास्तविक उद्गम स्थल को लेकर अलग-अलग दावे करते हैं और उसी आधार पर इस क्षेत्र पर अपना अधिकार जताते हैं।

 

Q. Why did Nepal raise the issue with Wang Yi?

Ans: नेपाल ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के सामने यह मुद्दा इसलिए उठाया क्योंकि भारत और चीन ने लिपुलेख मार्ग के उपयोग को लेकर समझौते किए हैं। नेपाल का कहना है कि उसकी सहमति के बिना ऐसे समझौते स्वीकार नहीं किए जा सकते।

 

Q. What is India’s position on the dispute?

Ans: भारत का कहना है कि कालापानी और लिपुलेख उत्तराखंड का हिस्सा हैं और यह क्षेत्र लंबे समय से भारतीय प्रशासनिक नियंत्रण में है। भारत विवाद के समाधान के लिए बातचीत का समर्थन करता है।

 

Q. How is China connected to the issue?

Ans: लिपुलेख दर्रा तिब्बत से जुड़ा हुआ है और भारत-चीन व्यापार तथा कैलाश मानसरोवर यात्रा का महत्वपूर्ण मार्ग है। इसलिए चीन इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पक्ष है, हालांकि वह इसे भारत-नेपाल का द्विपक्षीय विवाद मानता है।

 

Q. What impact could this have on regional relations?

Ans: यह विवाद भारत-नेपाल संबंधों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन दोनों देश बातचीत के जरिए समाधान की बात करते हैं। इसलिए फिलहाल बड़े क्षेत्रीय तनाव की संभावना कम मानी जा रही है।

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