ILO की चेतावनी : मिडिल ईस्ट युद्ध से दुनिया भर में जा सकती हैं 3.8 करोड़ नौकरियां – जानिए भारत पर क्या होगा असर?

पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब सिर्फ युद्ध और राजनीति तक सीमित नहीं रह गया है। इसका असर धीरे-धीरे दुनिया की अर्थव्यवस्था, रोजगार और लोगों की कमाई पर भी दिखने लगा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी ILO की नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर तेल की कीमतें लगातार ऊंची रहीं और सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ता गया, तो करोड़ों नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं।

 

भारत जैसे देशों पर ज्यादा असर का खतरा

जिनेवा में जारी ‘Employment and Social Trends: May 2026 Update’ रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत जैसे देश, जो ऊर्जा और उर्वरकों के आयात पर काफी निर्भर हैं, उन्हें बड़ा झटका लग सकता है। अगर ईंधन और खाद की कीमतें बढ़ती हैं या उनकी कमी होती है, तो इसका असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं और ग्रामीण इलाकों की आर्थिक स्थिति भी कमजोर पड़ सकती है।

 

तेल महंगा हुआ तो घट सकती हैं नौकरियां

ILO के अनुसार, अगर तेल की कीमतें 2026 की शुरुआत के मुकाबले करीब 50% तक बढ़ती हैं, तो दुनिया भर में काम के घंटे कम हो सकते हैं। रिपोर्ट का अनुमान है कि 2026 में काम के घंटों में 0.5% की गिरावट आ सकती है, जो करीब 1.4 करोड़ फुल-टाइम नौकरियों के बराबर होगी। वहीं 2027 तक यह असर और बढ़ सकता है और लगभग 3.8 करोड़ नौकरियों के बराबर काम प्रभावित हो सकता है।

 

लोगों की कमाई पर भी पड़ेगा असर

रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगाई बढ़ने के साथ लोगों की वास्तविक आय भी घट सकती है। 2026 में श्रमिकों की आय में करीब 1.1% की कमी आ सकती है, जबकि 2027 तक यह गिरावट 3% तक पहुंच सकती है। इसका मतलब है कि दुनिया भर में लोगों की कमाई में खरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है।

 

बेरोजगारी बढ़ने की भी आशंका

ILO ने चेतावनी दी है कि बेरोजगारी दर भी बढ़ सकती है। अनुमान के मुताबिक 2026 में करीब 50 लाख लोग अतिरिक्त बेरोजगार हो सकते हैं। वहीं 2027 तक यह संख्या 2 करोड़ तक पहुंचने का खतरा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन देशों की अर्थव्यवस्था खाड़ी देशों की ऊर्जा सप्लाई और उद्योगों से ज्यादा जुड़ी हुई है, वहां जोखिम सबसे ज्यादा रहेगा।

Middle East war could cost 38 million jobs worldwide

एशिया और प्रशांत क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित

रिपोर्ट के अनुसार एशिया और प्रशांत क्षेत्र इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में शामिल हैं। यहां 2026 में काम के घंटों में 0.7% और 2027 में 1.5% तक गिरावट आने का अनुमान है। साथ ही लोगों की आय में भी बड़ी कमी हो सकती है।

ILO ने बताया कि इस क्षेत्र के लगभग 22% कर्मचारी ऐसे सेक्टरों में काम करते हैं, जो सीधे इस संकट से प्रभावित हो सकते हैं। इनमें खेती, ट्रांसपोर्ट, निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

 

पर्यटन और सप्लाई चेन पर दबाव

पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ने से ट्रांसपोर्ट और व्यापारिक रास्तों पर भी असर पड़ रहा है। इससे सामान की ढुलाई महंगी हो रही है और कंपनियों की लागत बढ़ रही है। वहीं पर्यटन उद्योग पर भी दबाव बढ़ रहा है, क्योंकि लोग यात्रा करने से बच रहे हैं। इसका असर होटल, एयरलाइन और ट्रैवल कारोबार से जुड़े लोगों पर पड़ सकता है।

 

प्रवासी मजदूर सबसे ज्यादा जोखिम में

रिपोर्ट में कहा गया है कि खाड़ी देशों में काम करने वाले विदेशी मजदूरों पर सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है। ILO के मुताबिक संकट के समय स्थानीय कर्मचारियों की तुलना में विदेशी कामगारों की नौकरियां ज्यादा तेजी से जाती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर स्थानीय लोगों की नौकरियों में 1% की कमी आती है, तो विदेशी कर्मचारियों की नौकरियां 4% तक घट सकती हैं।

 

ILO ने सरकारों को दी सलाह

ILO के मुख्य अर्थशास्त्री संगह्योन ली ने कहा कि पश्चिम एशिया का संकट कोई छोटी या कुछ दिनों की समस्या नहीं है। यह धीरे-धीरे दुनिया के श्रम बाजार को बदल सकता है। उन्होंने कहा कि सरकारों को रोजगार बचाने, लोगों की आय सुरक्षित रखने और छोटे कारोबारों को समर्थन देने के लिए जल्दी कदम उठाने होंगे।

 

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल पूरी दुनिया की नजर पश्चिम एशिया की स्थिति पर बनी हुई है। अगर हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो इसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में महंगाई, बेरोजगारी और कम होती आय जैसी समस्याएं कई देशों की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकती हैं।