Narmada Son Basin Tunnel: विंध्य पर्वत के नीचे 18 साल में बनी भारत की सबसे लंबी जल सुरंग, जानिए कैसे पूरी हुई इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी चुनौती?

Narmada Son Basin Tunnel

Narmada Son Basin Tunnel: भारत में सदियों पुरानी एक लोककथा है कि मैकाल पर्वत की पुत्री नर्मदा और सोनभद्र एक-दूसरे से प्रेम करते थे, लेकिन एक गलतफहमी ने दोनों को हमेशा के लिए अलग कर दिया। कहा जाता है कि नर्मदा पश्चिम की ओर बह निकलीं, जबकि सोन पूर्व की ओर गंगा से मिलने चले गए। दोनों नदियां एक ही पर्वत से निकलीं, लेकिन कभी मिल नहीं सकीं।

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सदियों बाद उसी विंध्य पर्वतमाला के नीचे इंसानों ने ऐसा रास्ता बना दिया है, जिसने इस लोककथा को एक नई दिशा दे दी है। मध्य प्रदेश के कटनी जिले में लगभग 11.95 किलोमीटर लंबी Sleemanabad Tunnel बनकर तैयार हो गई है। यह भारत की सबसे लंबी भूमिगत सिंचाई जल सुरंग (Underground Irrigation Water Tunnel) है। इसके जरिए पहली बार नर्मदा का पानी प्राकृतिक ढलान के सहारे विंध्य क्षेत्र और सोन बेसिन की ओर पहुंचाया जाएगा।

करीब 18 वर्षों तक चली इस परियोजना को भारत की सबसे कठिन जल अवसंरचना (Water Infrastructure) परियोजनाओं में गिना जा रहा है। यह सुरंग बर्गी डायवर्जन परियोजना (Bargi Diversion Project) का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका उद्देश्य सूखा प्रभावित क्षेत्रों तक सिंचाई और पेयजल पहुंचाना है।

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लोककथा से शुरू हुई एक नई इंजीनियरिंग कहानी

नर्मदा और सोनभद्र की कहानी मध्य भारत की सबसे प्रसिद्ध लोककथाओं में से एक है। मान्यता है कि दोनों का विवाह होना तय था, लेकिन विवाह से पहले नर्मदा ने अपनी सखी जुहिला को सोनभद्र के पास भेजा। सोनभद्र ने जुहिला को ही नर्मदा समझ लिया। जब यह बात नर्मदा तक पहुंची तो वे आहत होकर पश्चिम की ओर बह चलीं, जबकि सोनभद्र पूर्व की ओर निकल पड़े।

यही कारण बताया जाता है कि नर्मदा अरब सागर में गिरती है, जबकि सोन नदी गंगा की सहायक नदी बन जाती है। दोनों नदियों के बीच विंध्य पर्वतमाला हमेशा एक प्राकृतिक दीवार की तरह खड़ी रही।

आज भी दोनों नदियों का प्राकृतिक प्रवाह नहीं बदला है, लेकिन इंसानों ने पहली बार उसी पर्वत के भीतर ऐसा मार्ग बनाया है, जिसके जरिए नर्मदा का पानी सोन बेसिन की ओर पहुंच सकेगा।

विंध्य पर्वत बना सबसे बड़ी बाधा

बर्गी बांध से निकलने वाले नर्मदा के पानी को विंध्य क्षेत्र तक पहुंचाने की योजना वर्षों पहले तैयार हो गई थी, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती विंध्य पर्वतमाला थी।

नर्मदा और सोन घाटियों के बीच स्थित यह चट्टानी क्षेत्र आसपास की भूमि से लगभग 40 मीटर ऊंचा है। यदि इसे ऊपर से काटकर नहर बनाई जाती, तो करोड़ों घन मीटर मिट्टी और चट्टानों की खुदाई करनी पड़ती। इसके अलावा ऊंचे भूजल स्तर के कारण यह तरीका तकनीकी और आर्थिक रूप से बेहद कठिन माना गया।

इसीलिए इंजीनियरों ने पर्वत को काटने के बजाय उसके भीतर से सुरंग बनाने का निर्णय लिया। यही फैसला इस परियोजना को भारत की सबसे जटिल सिंचाई परियोजनाओं में शामिल करता है।

भारत की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंग

Sleemanabad Tunnel की कुल लंबाई 11.952 किलोमीटर और आंतरिक व्यास 10.14 मीटर है। यह देश की सबसे लंबी भूमिगत सिंचाई जल सुरंग मानी जा रही है।

इस सुरंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पानी को आगे बढ़ाने के लिए किसी पंप की आवश्यकता नहीं होगी। पूरी प्रणाली प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण (Gravity Flow) पर आधारित है। यानी नर्मदा का पानी अपने आप ढलान के सहारे विंध्य क्षेत्र और आगे सोन बेसिन की ओर बढ़ेगा।

यह व्यवस्था ऊर्जा की बचत के साथ लंबे समय तक कम लागत पर पानी पहुंचाने में मदद करेगी।

 

2008 में शुरू हुआ था निर्माण

इस परियोजना का निर्माण वर्ष 2008 में शुरू हुआ था। शुरुआती अनुमान के अनुसार काम कुछ वर्षों में पूरा होना था, लेकिन जल्द ही इंजीनियरों को देश की सबसे कठिन भूगर्भीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

सुरंग का मार्ग लगातार बदलती चट्टानों से होकर गुजरता था। कहीं कठोर संगमरमर (Marble) और चूना पत्थर (Limestone) मिले, तो कहीं डोलोमाइट (Dolomite), स्लेट (Slate) और मुलायम मिट्टी की परतें सामने आईं। कई स्थानों पर चूना पत्थर के घुलने से भूमिगत बड़ी-बड़ी खाली गुफाएं बन चुकी थीं।

हर कुछ मीटर बाद जमीन का स्वभाव बदल जाता था। इससे मशीनों की गति बार-बार प्रभावित होती रही।

 

पहाड़ के भीतर मिला सबसे कठिन भूगर्भीय इलाका

सुरंग का अधिकांश हिस्सा सतह से लगभग 20 से 40 मीटर नीचे बनाया गया। इसके ऊपर कई स्थानों पर सड़कें, रेलवे लाइनें और आबादी वाले क्षेत्र मौजूद थे। इसलिए खुदाई के दौरान ऊपर की सतह को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी था।

काम के दौरान कई बार सुरंग में 18 हजार से 25 हजार लीटर प्रति मिनट की रफ्तार से भूजल भरने लगा। कई हिस्सों में भूजल स्तर सुरंग की छत से भी ऊपर था।

इंजीनियरों को लगातार पानी बाहर निकालना पड़ा। भारी क्षमता वाले पंप दिन-रात चलते रहे। इसके साथ ही धंसाव (Sinkhole), मिट्टी के द्रवीकरण (Liquefaction), गैस उत्सर्जन और सुरंग की स्थिरता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल रहा।

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मशीनों के सामने बार-बार बदली पहाड़ की प्रकृति

सुरंग बनाने के लिए विशाल Tunnel Boring Machines (TBM) का उपयोग किया गया। शुरुआती चरण में अमेरिकी कंपनी Robbins की मशीन लगाई गई, लेकिन कठोर चट्टानों और अस्थिर भूगर्भीय परिस्थितियों के कारण मशीन कई बार फंस गई।

बार-बार मशीन के कटर हेड क्षतिग्रस्त हुए। मरम्मत करनी पड़ी और कई बार काम पूरी तरह रोकना पड़ा। लगातार बदलती चट्टानों के कारण मशीनों की गति उम्मीद से कहीं कम रही।

इंजीनियरों के लिए यह केवल चट्टान काटने का काम नहीं था, बल्कि हर कुछ मीटर बाद नई भूगर्भीय चुनौती का समाधान भी तलाशना पड़ रहा था।

 

दूसरी दिशा से भी शुरू करनी पड़ी खुदाई

जब यह स्पष्ट हो गया कि केवल एक दिशा से खुदाई करने में बहुत अधिक समय लगेगा, तब परियोजना की रणनीति बदली गई।

वर्ष 2016 में दूसरी ओर से जर्मनी की HK Tunnel Boring Machine तैनात की गई। अब सुरंग की खुदाई दोनों सिरों से एक साथ शुरू हुई।

एक टीम अपस्ट्रीम से आगे बढ़ रही थी, जबकि दूसरी टीम डाउनस्ट्रीम से। दोनों के बीच लगभग 12 किलोमीटर ठोस चट्टान थी। वे एक-दूसरे को देख नहीं सकते थे। केवल सर्वेक्षण, कंप्यूटर डेटा, जीपीएस आधारित अलाइनमेंट और इंजीनियरिंग गणनाएं ही बता रही थीं कि दोनों मशीनें एक ही बिंदु की ओर बढ़ रही हैं।

 

हर दिन होती रही मिलीमीटर स्तर की गणना

दोनों ओर से खुदाई करना जितना कठिन था, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण था उन्हें बिल्कुल एक ही स्थान पर मिलाना।

करीब 12 किलोमीटर की दूरी में यदि दिशा कुछ सेंटीमीटर भी बदल जाती, तो वर्षों की मेहनत बेकार हो सकती थी। इसलिए इंजीनियर प्रतिदिन सुरंग की गहराई, ढाल, दिशा और अलाइनमेंट की जांच करते रहे।

कोर ड्रिलिंग, आधुनिक सर्वेक्षण तकनीक और लगातार मॉनिटरिंग की मदद से दोनों टीमों को सही दिशा में आगे बढ़ाया गया। यही सटीक गणनाएं बाद में इस परियोजना की सबसे बड़ी सफलता साबित हुईं।

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17-18 वर्षों तक अंधेरे में चलता रहा संघर्ष

इस परियोजना में काम करने वाले इंजीनियरों और मजदूरों के लिए समय सूर्योदय और सूर्यास्त से नहीं, बल्कि शिफ्टों से मापा जाता था। सुरंग के भीतर कई किलोमीटर तक प्राकृतिक रोशनी नहीं पहुंचती थी। हवा की गुणवत्ता लगातार मशीनों से जांची जाती थी।

काम के दौरान कई मजदूर और इंजीनियर परियोजना पूरी होने से पहले ही दुनिया छोड़ गए। कई मशीनें बदली गईं, ठेकेदार बदले, अधिकारी बदले, लेकिन पहाड़ के भीतर सुरंग बनाने का काम लगातार चलता रहा।

करीब 18 वर्षों तक चले इस संघर्ष के बाद आखिरकार वह दिन आया, जिसका सभी को इंतजार था।

 

14 जुलाई को टूटी आखिरी चट्टान

14 जुलाई 2026 की दोपहर लगभग 3:30 बजे दोनों दिशाओं से बनाई जा रही सुरंगों के बीच केवल एक मीटर चट्टान बची थी।

जैसे ही Tunnel Boring Machine का कटर हेड उस अंतिम दीवार से टकराया, चट्टान टूट गई और दोनों सुरंगें एक-दूसरे से जुड़ गईं। लगभग 6.5 किलोमीटर लंबी अपस्ट्रीम सुरंग और करीब 5.4 किलोमीटर लंबी डाउनस्ट्रीम सुरंग मिलकर 11.95 किलोमीटर का एक सतत भूमिगत मार्ग बन गई।

धूल हटने के बाद वर्षों से केवल वायरलेस और नक्शों के जरिए जुड़े दोनों दल पहली बार आमने-सामने आए। सुरंग के भीतर तालियां गूंज उठीं। कई इंजीनियरों और मजदूरों ने मशीनों और टूटी हुई चट्टानों को छूकर इस ऐतिहासिक पल का स्वागत किया।

यहीं से नर्मदा का पानी विंध्य पर्वत के नीचे बने इस नए मार्ग से सोन बेसिन की ओर बढ़ने की दिशा में एक निर्णायक कदम पूरा हुआ।

 

बर्गी डायवर्जन परियोजना की सबसे अहम कड़ी

Sleemanabad Tunnel, Bargi Diversion Project की रीढ़ मानी जाती है। इस परियोजना का उद्देश्य नर्मदा नदी के पानी को विंध्य क्षेत्र और सोन बेसिन के उन इलाकों तक पहुंचाना है, जहां किसान आज भी बारिश पर निर्भर हैं।

सुरंग से निकलने के बाद पानी नहरों और आठ बड़े एक्वाडक्ट (Aqueduct) से होकर खेतों तक पहुंचेगा। पूरी परियोजना तैयार होने के बाद नर्मदा का पानी मध्य प्रदेश के सूखा प्रभावित इलाकों में सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।

 

1,450 गांवों को मिलेगा सीधा लाभ

इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ मध्य प्रदेश के लगभग 1,450 गांवों को मिलने की उम्मीद है।

इनमें जबलपुर, कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना जिले शामिल हैं। परियोजना के पूरा होने के बाद इन क्षेत्रों में लगभग 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।

Sleemanabad Tunnel से जुड़े कमांड एरिया की बात करें तो इसके माध्यम से लगभग 1.85 लाख हेक्टेयर भूमि तक पानी पहुंचाने की योजना है।

इसमें लगभग 21,823 हेक्टेयर कटनी, 54,227 हेक्टेयर मैहर, 1,04,970 हेक्टेयर सतना, 3,532 हेक्टेयर रीवा और 448 हेक्टेयर पन्ना जिले की कृषि भूमि शामिल है।

चरणबद्ध तरीके से बढ़ेगी सिंचाई क्षमता

परियोजना पूरी होने के साथ ही सभी क्षेत्रों में एक साथ पानी नहीं पहुंचेगा। सरकार ने इसके लिए चरणबद्ध लक्ष्य तय किए हैं।

मार्च 2026 तक लगभग 44,160 हेक्टेयर भूमि के लिए सिंचाई क्षमता विकसित की जा चुकी थी। इसे सितंबर 2026 तक बढ़ाकर 87,433 हेक्टेयर और दिसंबर 2027 तक लगभग 1,54,693 हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।

जैसे-जैसे नहरों और वितरण प्रणाली का काम पूरा होगा, वैसे-वैसे नए क्षेत्रों में पानी पहुंचना शुरू होगा।

 

किसानों की खेती में आ सकता है बड़ा बदलाव

विंध्य क्षेत्र के अधिकांश किसान आज भी मानसून पर निर्भर रहते हैं। बारिश समय पर हो जाए तो अच्छी फसल होती है, लेकिन बारिश कम होने पर पूरी खेती प्रभावित हो जाती है।

नर्मदा का पानी पहुंचने के बाद इन क्षेत्रों में केवल खरीफ फसल पर निर्भरता कम हो सकती है। कई इलाकों में साल में दो या तीन फसलें लेना संभव हो सकता है।

गेहूं, दलहन, तिलहन, सब्जियां और बागवानी जैसी फसलों का विस्तार होने की संभावना है। इससे किसानों की आय बढ़ सकती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।

 

पेयजल और उद्योगों को भी मिलेगा फायदा

यह परियोजना केवल सिंचाई तक सीमित नहीं है। इसके जरिए जबलपुर और कटनी जैसे शहरों के लिए भविष्य की पेयजल जरूरतों को भी पूरा करने की योजना बनाई गई है।

इसके अलावा औद्योगिक क्षेत्रों को भी जल उपलब्ध कराने का प्रावधान रखा गया है। यानी यह सुरंग खेतों के साथ-साथ शहरों और उद्योगों की जल आवश्यकताओं को पूरा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

 

कठिन भूगर्भीय परिस्थितियों ने बढ़ाई लागत

जब परियोजना शुरू हुई थी, तब इसकी अनुमानित लागत लगभग ₹799 करोड़ थी। लेकिन लगातार तकनीकी चुनौतियां, मशीनों की खराबी, भूजल का दबाव, कठिन चट्टानी संरचनाएं और निर्माण अवधि बढ़ने के कारण इसकी लागत बढ़कर लगभग ₹1,600 करोड़ तक पहुंच गई।

सुरंग निर्माण के दौरान कई बार Tunnel Boring Machine के कटर हेड बदलने पड़े। कुछ हिस्सों में विशेष TAM Grouting, उच्च क्षमता वाले डी-वॉटरिंग सिस्टम और अतिरिक्त भू-तकनीकी उपाय अपनाने पड़े। यही कारण रहा कि परियोजना का समय और लागत दोनों बढ़ गए।

 

इंजीनियरिंग की बड़ी उपलब्धियों में शामिल हुआ यह प्रोजेक्ट

विशेषज्ञों का मानना है कि Sleemanabad Tunnel भारत की सबसे जटिल जल अवसंरचना परियोजनाओं में से एक है।

सुरंग का निर्माण सतह से लगभग 20 से 40 मीटर नीचे किया गया है। इसके ऊपर राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे लाइनें और आबादी वाले क्षेत्र मौजूद हैं, लेकिन खुदाई के दौरान इन संरचनाओं पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा।

लगभग 12 किलोमीटर लंबी सुरंग में दोनों दिशाओं से खुदाई कर उन्हें मिलीमीटर स्तर की सटीकता के साथ जोड़ना इंजीनियरिंग की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

 

लोककथा से आगे बढ़ी नई कहानी

लोककथाओं में नर्मदा और सोनभद्र की कहानी हमेशा बिछड़ने की कहानी रही है। दोनों नदियां आज भी अपने प्राकृतिक मार्ग पर ही बहती हैं। इस परियोजना से किसी नदी का प्राकृतिक प्रवाह नहीं बदला जाएगा और न ही यह पारंपरिक अर्थों में नदी जोड़ो (River Linking) परियोजना है।

दरअसल, यह बर्गी जलाशय से नियंत्रित मात्रा में पानी को सिंचाई के लिए सुरंग और नहर प्रणाली के माध्यम से सोन बेसिन के जलग्रहण क्षेत्र तक पहुंचाने वाली जल हस्तांतरण (Water Transfer) परियोजना है। यानी इंसानों ने विंध्य पर्वत के भीतर ऐसा मार्ग बनाया है, जिससे नर्मदा का अतिरिक्त पानी उन क्षेत्रों तक पहुंच सके जहां पानी की कमी रहती है।

 

FAQ

1. नर्मदा-सोन बेसिन सुरंग परियोजना क्या है?

यह मध्य प्रदेश की बर्गी डायवर्जन परियोजना का प्रमुख हिस्सा है। इसके तहत भारत की सबसे लंबी भूमिगत सिंचाई जल सुरंग बनाकर नर्मदा का पानी विंध्य क्षेत्र और सोन बेसिन तक पहुंचाया जाएगा।

 

2. इस भूमिगत जल सुरंग की लंबाई कितनी है?

Sleemanabad Tunnel की कुल लंबाई 11.952 किलोमीटर और आंतरिक व्यास 10.14 मीटर है। यह भारत की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंग मानी जाती है।

 

3. इस परियोजना को पूरा होने में 18 साल क्यों लगे?

निर्माण के दौरान कठोर चट्टानों, भूमिगत जल के भारी दबाव, गैस उत्सर्जन, भूगर्भीय अस्थिरता, मशीनों की खराबी और जटिल इंजीनियरिंग चुनौतियों के कारण परियोजना में लगातार देरी हुई।

 

3. इससे किन क्षेत्रों को लाभ मिलेगा?

इस परियोजना से मध्य प्रदेश के जबलपुर, कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना जिलों के लगभग 1,450 गांवों और करीब 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को लाभ मिलने की उम्मीद है।

 

4. इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य क्या है?

परियोजना का मुख्य उद्देश्य नर्मदा नदी के पानी का उपयोग करके सूखा प्रभावित विंध्य क्षेत्र में सिंचाई सुविधा बढ़ाना, पेयजल उपलब्ध कराना और क्षेत्रीय जल प्रबंधन को मजबूत करना है।