वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक सप्लाई चेन की समस्याओं ने दुनिया के कई देशों की तरह भारत की ऊर्जा सुरक्षा को भी चुनौती दी है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल और गैस आयात करके पूरा करता है। ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में संकट बढ़ता है, तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई और उद्योगों पर पड़ता है।
इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 37,500 करोड़ रुपये की कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी है। सरकार का उद्देश्य कोयले को सिर्फ जलाने तक सीमित न रखकर उससे गैस और कई उपयोगी औद्योगिक उत्पाद तैयार करना है।
सरकार का मानना है कि यह योजना आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने, आयात पर निर्भरता घटाने और देश को अधिक आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेगी।
सरकार ने क्यों उठाया यह कदम?
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और उपभोक्ता देश है। देश में कोयले का विशाल भंडार मौजूद है, लेकिन इसके बावजूद भारत को गैस, एलएनजी, यूरिया और कई पेट्रोकेमिकल उत्पादों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।
सरकार ने वर्ष 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले के गैसीकरण का लक्ष्य तय किया है। इसके जरिए ऐसे उत्पाद तैयार किए जाएंगे जिनका अभी बड़े पैमाने पर आयात होता है।
इस योजना के तहत सरकार कंपनियों को आर्थिक सहायता देगी ताकि वे आधुनिक गैसीकरण संयंत्र स्थापित कर सकें। इसके साथ ही सरकार ने कोल लिंकेज यानी कोयला आपूर्ति समझौते की अवधि भी बढ़ाकर 30 साल कर दी है। इससे उद्योगों को लंबे समय तक कोयला उपलब्ध रहने का भरोसा मिलेगा और निवेश बढ़ने की संभावना है।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारत के पास कई सौ वर्षों के लिए पर्याप्त कोयला भंडार है और अब इस संसाधन का इस्तेमाल गैस बनाने में भी किया जाएगा।

आखिर कोयला होता क्या है?
कोयला एक जैविक और अवसादी चट्टान है, जो लाखों वर्षों में पेड़-पौधों और वनस्पतियों के दबाव और तापमान के प्रभाव से बनता है। इसमें मुख्य रूप से कार्बन पाया जाता है।
चूंकि इसे बनने में करोड़ों साल लगते हैं, इसलिए इसे अ-नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत कहा जाता है। यानी एक बार खत्म होने के बाद इसे दोबारा जल्दी तैयार नहीं किया जा सकता।
कोयले की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके निर्माण में कितना समय, दबाव और तापमान लगा। इसी आधार पर इसे अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है।
कोयले के प्रमुख प्रकार
कोयला मुख्य रूप से पांच प्रकार का माना जाता है, जिन्हें उनकी गुणवत्ता, कार्बन मात्रा और ऊष्मा क्षमता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
- पीट (Peat): यह कोयले का शुरुआती और सबसे निम्न स्तर होता है। इसमें कार्बन की मात्रा बहुत कम और नमी बहुत अधिक होती है। यह पूरी तरह विकसित कोयला नहीं माना जाता, लेकिन कुछ स्थानों पर ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है।
- लिग्नाइट (Lignite): इसे ब्राउन कोल भी कहा जाता है। इसमें कार्बन की मात्रा 25%–35% तक होती है। यह नरम, भुरभुरा और अधिक नमी वाला कोयला होता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से बिजली उत्पादन में किया जाता है।
- सब-बिटुमिनस (Sub-Bituminous): इसमें कार्बन की मात्रा 35%–45% तक होती है। यह अपेक्षाकृत कम सल्फर वाला कोयला है और इसका उपयोग बिजलीघरों में बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है।
- बिटुमिनस (Bituminous): यह सबसे अधिक उपयोग होने वाला कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 45%–86% तक होती है। यह उच्च ऊष्मा क्षमता वाला कोयला है और बिजली उत्पादन तथा स्टील उद्योग में कोकिंग कोल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
- एंथ्रासाइट (Anthracite): यह सबसे उच्च गुणवत्ता वाला कोयला होता है। इसमें कार्बन की मात्रा 86%–97% तक होती है। यह कठोर, चमकदार और कम धुआं छोड़ने वाला कोयला है, जो सबसे अधिक गर्मी पैदा करता है। इसका उपयोग हीटिंग, धातु उद्योग और जल शोधन में किया जाता है।
भारत में कोयले की स्थिति
भारत दुनिया के सबसे बड़े कोयला संपन्न देशों में से एक है। राष्ट्रीय कोयला सूची 2025 के अनुसार, देश में कुल अनुमानित कोयला भंडार लगभग 400.715 अरब टन है। इसके अलावा भारत के पास लगभग 47 अरब टन लिग्नाइट भंडार भी मौजूद है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और उपभोक्ता देश है, जबकि चीन पहले स्थान पर है। दुनिया के कुल कोयला भंडार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 9 से 10 प्रतिशत मानी जाती है।
भारत में कोयला मुख्य रूप से गोंडवाना अवसाद क्षेत्रों में पाया जाता है। सबसे अधिक कोयला भंडार ओडिशा में है, इसके बाद झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश का स्थान आता है। देश में सबसे ज्यादा बिटुमिनस कोयला मिलता है, जिसका उपयोग बिजली उत्पादन और स्टील उद्योग में किया जाता है।
भारत में कौन-सा कोयला सबसे अधिक पाया जाता है?
भारत में सबसे अधिक मात्रा में बिटुमिनस कोयला (Bituminous Coal) पाया जाता है। यह देश के कुल कोयला भंडार का लगभग 80–85 प्रतिशत हिस्सा है। बिटुमिनस कोयला उच्च ऊष्मा क्षमता वाला होता है, इसलिए इसका उपयोग मुख्य रूप से बिजली उत्पादन और स्टील उद्योग में किया जाता है। झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश इसके प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।
इसके अलावा भारत में लिग्नाइट कोयला भी बड़ी मात्रा में पाया जाता है, जिसका कुल भंडार लगभग 47 अरब टन माना जाता है। यह मुख्य रूप से राजस्थान, तमिलनाडु और गुजरात में मिलता है और इसका उपयोग अधिकतर बिजली उत्पादन में किया जाता है। सब-बिटुमिनस कोयला सीमित मात्रा में उपलब्ध है, जबकि सबसे उच्च गुणवत्ता वाला एंथ्रासाइट कोयला भारत में बहुत कम पाया जाता है। एंथ्रासाइट मुख्यतः जम्मू-कश्मीर और मेघालय के कुछ क्षेत्रों में मिलता है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा में कोयले की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में कोयला आधारित बिजलीघरों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक है। वहीं भारत की कुल घरेलू ऊर्जा आपूर्ति में कोयले का योगदान लगभग 55 से 79 प्रतिशत के बीच माना जाता है। तेजी से बढ़ती बिजली मांग, औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण देश में कोयले की खपत लगातार बढ़ रही है।
हालांकि भारत के पास विशाल कोयला भंडार हैं, फिर भी देश को अपनी जरूरत का लगभग 15 से 20 प्रतिशत कोयला आयात करना पड़ता है। खासकर उच्च गुणवत्ता वाले कोकिंग कोल का आयात ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों से किया जाता है, क्योंकि भारत में इसकी उपलब्धता सीमित है। यही कारण है कि सरकार अब कोयला गैसीकरण और स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है, ताकि आयात निर्भरता कम की जा सके।
कोयला गैसीकरण क्या है?
सामान्य तौर पर कोयले को सीधे जलाकर बिजली या ऊर्जा बनाई जाती है। लेकिन गैसीकरण तकनीक इससे अलग है। इसमें कोयले को सीमित ऑक्सीजन और भाप की मदद से गैस में बदला जाता है।
यह प्रक्रिया विशेष उपकरण यानी गैसीफायर में की जाती है। इसमें बहुत अधिक तापमान और दबाव पर कोयले की रासायनिक प्रतिक्रिया कराई जाती है।
इस प्रक्रिया के बाद जो गैस बनती है उसे “सिन्गैस” कहा जाता है।

सिन्गैस क्या होती है?
सिन्गैस यानी सिंथेटिक गैस कई गैसों का मिश्रण होती है। इसमें मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन शामिल होते हैं।
इस गैस का उपयोग कई महत्वपूर्ण उत्पाद बनाने में किया जा सकता है, जैसे—
- सिंथेटिक नेचुरल गैस
- मेथनॉल
- एथेनॉल
- अमोनिया
- यूरिया
- पेट्रोकेमिकल उत्पाद
- सिंथेटिक ईंधन
यही कारण है कि गैसीकरण को ऊर्जा और रसायन उद्योग दोनों के लिए महत्वपूर्ण तकनीक माना जा रहा है।
गैसीकरण को क्यों माना जा रहा है अहम?
सरकार और विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक सीधे कोयला जलाने की तुलना में बेहतर है।
गैसीकरण के दौरान सल्फर और अन्य अशुद्धियों को पहले ही अलग किया जा सकता है। इससे प्रदूषण कम करने में मदद मिलती है।
इसके अलावा यह तकनीक हाइड्रोजन उत्पादन के लिए भी उपयोगी मानी जाती है। आने वाले समय में स्वच्छ ऊर्जा के रूप में हाइड्रोजन की भूमिका बढ़ने की संभावना है।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि गैसीकरण को आधुनिक तकनीक माना जाता है, लेकिन इसके सामने कई समस्याएं भी हैं।
सबसे बड़ी चुनौती इसकी लागत है। गैसीकरण संयंत्र लगाने में भारी निवेश की जरूरत होती है।
इसके अलावा इस प्रक्रिया में पानी की खपत भी बहुत अधिक होती है। वहीं कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन भी पूरी तरह खत्म नहीं होता।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इसे पर्यावरण के लिहाज से ज्यादा सुरक्षित बनाना है, तो कार्बन कैप्चर तकनीक के साथ जोड़ना जरूरी होगा।
योजना की प्रमुख बातें
सरकार की नई योजना कई मायनों में बड़ी मानी जा रही है।
- कुल 37,500 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन पैकेज
- लगभग 75 मिलियन टन कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण का लक्ष्य
- कंपनियों को संयंत्र लागत का 20 प्रतिशत तक प्रोत्साहन
- एक परियोजना को अधिकतम 5,000 करोड़ रुपये तक सहायता
- पारदर्शी बोली प्रक्रिया के जरिए कंपनियों का चयन
- स्वदेशी तकनीक को प्राथमिकता
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि योजना किसी एक तकनीक तक सीमित नहीं रहेगी। नई और आधुनिक तकनीकों को भी मौका दिया जाएगा।
राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन
भारत सरकार ने 2021 में राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन शुरू किया था। इसका उद्देश्य कोयले के आधुनिक उपयोग को बढ़ावा देना और आयात कम करना है।
जनवरी 2024 में सरकार ने इस क्षेत्र के लिए 8,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी थी। वर्तमान में कई परियोजनाएं लागू की जा रही हैं।
नई 37,500 करोड़ रुपये की योजना को उसी मिशन का बड़ा विस्तार माना जा रहा है।
अर्थव्यवस्था को क्या फायदा होगा?
सरकार का अनुमान है कि इस योजना से 2.5 से 3 लाख करोड़ रुपये तक का निवेश आकर्षित हो सकता है।
इससे कई नए उद्योग स्थापित होंगे और कोयला उत्पादक राज्यों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी।
सरकार के अनुसार लगभग 25 नई परियोजनाओं से 50 हजार से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकते हैं।
इसके अलावा अगर एलएनजी, यूरिया और मेथनॉल जैसे उत्पाद देश में बनने लगते हैं, तो आयात बिल भी कम होगा। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और व्यापार घाटा घटाने में मदद मिल सकती है।
दुनिया के दूसरे देशों से क्या सीख?
चीन इस क्षेत्र में सबसे आगे माना जाता है। वहां बड़ी मात्रा में मेथनॉल और अमोनिया कोयला गैसीकरण से तैयार होते हैं।
इंडोनेशिया भी एलपीजी आयात कम करने के लिए गैसीकरण परियोजनाओं पर काम कर रहा है।
जापान ने फुकुशिमा हादसे के बाद स्वच्छ कोयला तकनीकों पर रिसर्च बढ़ाई।
भारत अब इन देशों के अनुभवों को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बना रहा है।
क्या यह ऊर्जा संकट का स्थायी समाधान बन पाएगा?
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की है।
एक तरफ देश को तेजी से बढ़ती बिजली और औद्योगिक जरूरतों के लिए सस्ती ऊर्जा चाहिए, दूसरी तरफ दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है।
कोयला गैसीकरण को सरकार एक ऐसे विकल्प के रूप में देख रही है, जिससे कोयले का उपयोग अधिक आधुनिक और उपयोगी तरीके से किया जा सके।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबे समय में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी तकनीकों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल सरकार का फोकस यह सुनिश्चित करना है कि अंतरराष्ट्रीय संकटों के बीच देश की ऊर्जा जरूरतों पर ज्यादा असर न पड़े। ऐसे में कोयला गैसीकरण को भारत की ऊर्जा रणनीति का एक बड़ा हिस्सा माना जा रहा है।

