परिसीमन पर भड़के स्टालिन! काले झंडों से विरोध -कहा- केंद्र को ‘भारी कीमत’ चुकानी होगी

देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। वजह है लोकसभा सीटों के नए बंटवारे यानी परिसीमन (Delimitation) का प्रस्ताव, जिसे केंद्र सरकार महिला आरक्षण लागू करने के साथ जोड़कर आगे बढ़ाना चाहती है। इस मुद्दे ने खासकर दक्षिण भारत के राज्यों में चिंता बढ़ा दी है। कई गैर-बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इसे लेकर खुलकर विरोध जताया है और इसे राजनीतिक ताकत के संतुलन में बदलाव की कोशिश बताया है।

 

परिसीमन क्या है?

परिसीमन से तात्पर्य है कि किसी देश में जनसंख्या के आधार पर विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को नए सिरे से निर्धारित करना। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर निर्वाचन क्षेत्र में लगभग समान संख्या में जनसंख्या हो, ताकि हर नागरिक का प्रतिनिधित्व उचित रूप से हो सके। यह काम परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है और आयोग को किसी भी प्रकार के कार्यकारी हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र रूप से कार्य करना होता है।

संविधान के अनुसार, परिसीमन आयोग का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होता है। इसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे चुनावी प्रक्रिया में बार-बार देरी हो सकती है। आयोग द्वारा जारी किए गए आदेश जब लोकसभा या राज्य विधानसभा के समक्ष रखे जाते हैं, तो इनमें कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।

 

परिसीमन की आवश्यकता

परिसीमन इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे जनसंख्या के हर वर्ग के नागरिकों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का समान अवसर मिलता है। यह भौगोलिक क्षेत्रों का उचित विभाजन सुनिश्चित करता है, जिससे चुनाव में किसी एक राजनीतिक दल को दूसरों की तुलना में अनुचित लाभ न मिल सके। सबसे महत्वपूर्ण बात, यह “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के लोकतांत्रिक सिद्धांत को मजबूत करता है।

 

परिसीमन आयोग की संरचना

परिसीमन आयोग का गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। यह आयोग भारत निर्वाचन आयोग के सहयोग से अपना कार्य करता है। आयोग में शामिल सदस्य होते हैं  –  सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश (जो आमतौर पर अध्यक्ष होते हैं), मुख्य निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्य के निर्वाचन आयुक्त।

 

परिसीमन की प्रक्रिया

हर जनगणना के बाद संसद संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत एक परिसीमन अधिनियम पास करती है। इसी प्रकार अनुच्छेद 170 के तहत राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों को भी पुनर्निर्धारित किया जाता है। अधिनियम पास होने के बाद केंद्र सरकार परिसीमन आयोग का गठन करती है।

भारत में अब तक चार बार पूर्ण परिसीमन हुआ है  –  वर्ष 1952, 1963, 1973 और 2002 में। इनका आधार 1952, 1962, 1972 और 2002 के परिसीमन अधिनियम थे। हालांकि, 1981 और 1991 की जनगणना के बाद परिसीमन नहीं किया गया था।

पहला परिसीमन 1950-51 में राष्ट्रपति द्वारा (निर्वाचन आयोग की सहायता से) किया गया था। बाद में 1952 में परिसीमन आयोग अधिनियम बनाया गया, जिसके तहत परिसीमन आयोग को एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय का दर्जा प्राप्त हुआ।

Stalin furious over delimitation

दक्षिण के राज्यों की बढ़ती चिंता
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इस मुद्दे पर सबसे कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने साफ चेतावनी दी है कि अगर परिसीमन से दक्षिणी राज्यों को नुकसान हुआ, तो राज्यभर में बड़े स्तर पर विरोध होगा और हालात ठप तक हो सकते हैं। उनका कहना है कि केंद्र सरकार चुनाव के समय इस तरह का फैसला लेकर राज्यों की आवाज दबाना चाहती है।
स्टालिन ने यह भी आरोप लगाया कि संसद का विशेष सत्र बुलाकर इस प्रस्ताव को जल्दबाजी में पास कराने की कोशिश हो रही है, बिना राज्यों से ठीक से चर्चा किए। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताया और कहा कि अगर तमिलनाडु के हितों को नुकसान पहुंचा, तो जनता सड़क पर उतरने को तैयार है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी स्टालिन का समर्थन करते हुए दक्षिणी राज्यों को एकजुट होने की अपील की है। उन्होंने कहा कि “प्रो-राटा” फॉर्मूला यानी आबादी के हिसाब से सीट बढ़ाने का तरीका दक्षिण के लिए नुकसानदेह हो सकता है। रेड्डी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर सहमति बनाने की मांग की है।


कर्नाटक का भी विरोध
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस प्रस्ताव के समय और मंशा पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत के बंटवारे का मामला है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सीटों की संख्या बढ़ती है, तो बड़ी आबादी वाले राज्यों को ज्यादा फायदा मिलेगा, जिससे दक्षिणी राज्यों की आवाज कमजोर हो सकती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अभी उत्तर प्रदेश के पास कर्नाटक से काफी ज्यादा सीटें हैं, और परिसीमन के बाद यह अंतर और बढ़ सकता है। इससे संसद में निर्णय लेने की ताकत असंतुलित हो सकती है।


आंध्र प्रदेश का अलग रुख
जहां दक्षिण के ज्यादातर राज्य इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं, वहीं आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने अलग राय रखी है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे मतभेद छोड़कर महिला आरक्षण का समर्थन करें। हालांकि उन्होंने परिसीमन से जुड़े विवाद पर ज्यादा कुछ नहीं कहा।
पश्चिम बंगाल की प्रतिक्रिया
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उनका आरोप है कि यह कदम देश और राज्यों को बांटने के लिए उठाया गया है, ताकि राजनीतिक फायदा लिया जा सके। उन्होंने कहा कि जब केंद्र में सरकार पूर्ण बहुमत में नहीं है, तब ऐसे फैसले राजनीतिक उद्देश्य से किए जा रहे हैं।


विपक्ष का रुख
विपक्षी गठबंधन (INDIA) ने भी इस मुद्दे पर बैठक की और साफ किया कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे लागू करने के तरीके पर उन्हें आपत्ति है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि सरकार जिस तरह से यह बिल ला रही है, उसमें राजनीतिक चाल नजर आती है।
उनका कहना है कि परिसीमन के साथ इसे जोड़ना ठीक नहीं है और इससे विपक्ष की ताकत को कम करने की कोशिश हो सकती है। उन्होंने सभी दलों से संसद में एकजुट होकर इस मुद्दे पर आवाज उठाने की अपील की।


केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि सभी राज्यों की सीटों में लगभग 50% की बढ़ोतरी की जाएगी और किसी राज्य की हिस्सेदारी कम नहीं होगी। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी राज्य के पास अभी 39 सीटें हैं, तो उसे बढ़ाकर लगभग 58 कर दिया जाएगा।
गृह मंत्री अमित शाह संसद में इस पूरे प्रस्ताव को विस्तार से समझाएंगे। सरकार का कहना है कि परिसीमन का उद्देश्य केवल सीटों की संख्या बढ़ाना और महिला आरक्षण लागू करना है, न कि किसी राज्य को नुकसान पहुंचाना।
संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने भी कहा कि महिला आरक्षण को लेकर सभी दल एकमत हैं और यह मुद्दा राजनीति से ऊपर होना चाहिए।


महिला आरक्षण और परिसीमन का संबंध
महिला आरक्षण कानून 2023 में पास हुआ था, जिसमें लोकसभा और विधानसभा में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है। लेकिन इसे लागू करने के लिए परिसीमन जरूरी बताया गया था, जो जनगणना के बाद ही संभव है।
पहले यह माना जा रहा था कि यह आरक्षण 2034 के बाद लागू होगा, लेकिन अब सरकार इसे 2029 के चुनाव से लागू करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर करीब 850 तक करने का प्रस्ताव है।


विवाद की असली वजह
इस पूरे विवाद की जड़ है “राजनीतिक ताकत का संतुलन”। दक्षिण के राज्यों का कहना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है, जबकि उत्तर भारत के कुछ राज्यों में आबादी ज्यादा तेजी से बढ़ी है।
अगर सीटों का बंटवारा केवल आबादी के आधार पर होगा, तो ज्यादा आबादी वाले राज्यों को ज्यादा सीटें मिलेंगी। इससे संसद में उनका प्रभाव बढ़ जाएगा और दक्षिण के राज्यों की आवाज कमजोर हो सकती है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने इस समस्या का हल निकालने के लिए एक “हाइब्रिड मॉडल” सुझाया है। इसके तहत आधी सीटें आबादी के आधार पर और आधी आर्थिक प्रदर्शन (GSDP) के आधार पर दी जाएं, ताकि संतुलन बना रहे।


संसद का विशेष सत्र
इस पूरे मुद्दे पर चर्चा के लिए 16 से 18 अप्रैल तक संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है। इस दौरान महिला आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों पर लंबी बहस होने की संभावना है।
लोकसभा में लगभग 18 घंटे और राज्यसभा में करीब 10 घंटे चर्चा हो सकती है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपना पक्ष रख सकते हैं, जबकि अंत में गृह मंत्री जवाब देंगे।


आगे क्या होगा?
आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गर्म होने वाला है। एक तरफ केंद्र सरकार महिला आरक्षण लागू करने के लिए इसे जरूरी बता रही है, तो दूसरी तरफ कई राज्य इसे अपने राजनीतिक अधिकारों पर असर मान रहे हैं।
अगर सहमति नहीं बनती है, तो यह विवाद संसद से सड़कों तक पहुंच सकता है। खासकर दक्षिण भारत में बड़े स्तर पर विरोध देखने को मिल सकता है।