क्लास 8 की NCERT किताब में शामिल “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” वाले चैप्टर को लेकर शुरू हुआ विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। करीब दो महीने पहले इस मामले में सख्त टिप्पणी करने वाले सुप्रीम कोर्ट ने अब अपना ही आदेश बदल दिया है।
पहले कोर्ट ने किताब तैयार करने वाले तीन शिक्षाविदों को जिम्मेदार मानते हुए उन्हें हटाने और भविष्य में कोई शैक्षणिक काम न देने की बात कही थी। लेकिन अब कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में बदलाव करते हुए कहा है कि इस मामले में आगे क्या कार्रवाई करनी है, इसका फैसला केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, विश्वविद्यालय और सरकारी फंड पाने वाले संस्थान खुद करेंगे।
इस बदलाव के बाद शिक्षा जगत और कानूनी हलकों में एक बार फिर बहस शुरू हो गई है कि आखिर स्कूल की किताबों में न्यायपालिका से जुड़े मुद्दों को किस सीमा तक शामिल किया जाना चाहिए।

पहले क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने?
11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान काफी कड़ी टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि किताब में न्यायपालिका की छवि को गलत तरीके से पेश किया गया है और छात्रों के सामने संस्थानों की नकारात्मक तस्वीर दिखाई गई।
मामले में जिन तीन शिक्षाविदों के नाम सामने आए थे, उनमें प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार शामिल थे।
उस समय कोर्ट ने कहा था कि इन लोगों ने तथ्यों को ऐसे ढंग से प्रस्तुत किया, जिससे छात्रों के मन में न्यायपालिका को लेकर गलत संदेश जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि इन विशेषज्ञों को आगे किसी पाठ्यपुस्तक परियोजना में शामिल न किया जाए।
लेकिन अब शुक्रवार को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी वही टिप्पणी वापस ले ली। कोर्ट ने साफ कहा कि अब संबंधित संस्थान खुद तय करेंगे कि इस मामले में क्या कदम उठाने हैं।
आखिर विवाद शुरू कैसे हुआ?
पूरा मामला NCERT की क्लास 8 की सोशल साइंस किताब से शुरू हुआ। फरवरी में NCERT ने नई किताब जारी की थी, जिसका नाम था “एक्सप्लोरिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड पार्ट-2”।

यह किताब नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 से स्कूलों में पढ़ाई जानी थी। इससे पहले इसका पहला भाग जुलाई 2025 में जारी किया गया था।
इसी किताब के एक चैप्टर “द रोल ऑफ द ज्यूडीशियरी इन अवर सोसायटी” में “करप्शन इन द ज्यूडीशियरी” यानी न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ा हिस्सा शामिल किया गया था।
चैप्टर में बताया गया था कि न्याय व्यवस्था के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं, जिनमें भ्रष्टाचार, मामलों का लंबा लंबित रहना और जजों की कमी जैसी समस्याएं शामिल हैं।
‘Justice delayed is justice denied’ वाले हिस्से पर ज्यादा विवाद
किताब के एक हिस्से का शीर्षक था — “Justice delayed is justice denied” यानी “इंसाफ में देरी, इंसाफ न मिलने के बराबर है।”
इस भाग में देश की अदालतों में लंबित मामलों के आंकड़े भी दिए गए थे। किताब में बताया गया था कि सुप्रीम कोर्ट में हजारों केस, हाईकोर्ट्स में लाखों केस और जिला अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं।
साथ ही इसमें यह भी लिखा गया था कि जजों के लिए आचार संहिता होती है, जो उनके कोर्ट के अंदर और बाहर दोनों जगह के व्यवहार को नियंत्रित करती है।
इसी सामग्री को लेकर विवाद बढ़ गया। कुछ लोगों ने कहा कि इतने छोटे बच्चों के सामने न्यायपालिका की कमजोरियों को इस तरह रखना सही नहीं है, जबकि दूसरी ओर कुछ शिक्षाविदों का मानना था कि छात्रों को संस्थाओं की वास्तविक चुनौतियों के बारे में जानकारी होना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर लगाई थी रोक
24 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया था।
तत्कालीन सुनवाई के दौरान कोर्ट ने किताब की छपाई और बिक्री पर रोक लगाने का आदेश दिया। साथ ही कहा गया कि जो कॉपियां पहले से छप चुकी हैं, उन्हें भी वापस लिया जाए और डिजिटल संस्करण हटाए जाएं।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
NCERT ने मांगी थी माफी
सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद NCERT ने भी सफाई दी थी। संस्था ने कहा कि उसका उद्देश्य न्यायपालिका का अपमान करना नहीं था।
NCERT ने बयान जारी कर कहा था कि वह देश की न्याय व्यवस्था का पूरा सम्मान करती है और किताब में शामिल विवादित सामग्री अनजाने में चली गई। संस्था ने यह भी कहा था कि चैप्टर को दोबारा लिखा जाएगा।
इसके बाद किताब को NCERT की वेबसाइट से भी हटा दिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऑफलाइन बिक्री भी रोक दी गई थी। हालांकि NCERT की ओर से उस समय विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया था।
नई शिक्षा नीति के तहत तैयार हुई थीं किताबें
NCERT ने नई शिक्षा नीति 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क के तहत स्कूलों की किताबों में बड़े बदलाव किए हैं।
कोरोना महामारी के बाद पाठ्यक्रमों को नए तरीके से तैयार किया गया और कई पुराने विषयों की जगह नए टॉपिक्स जोड़े गए। पहली से आठवीं तक की नई किताबें 2025 में प्रकाशित की गई थीं।
इसी बदलाव के दौरान न्यायपालिका से जुड़ा यह नया हिस्सा भी किताब में शामिल किया गया था।
फैसले में बदलाव के क्या मायने हैं?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपना पुराना आदेश बदलने को कई लोग महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इससे यह संकेत मिलता है कि कोर्ट अब सीधे कार्रवाई करने के बजाय संस्थानों को फैसला लेने की स्वतंत्रता देना चाहता है।
वहीं शिक्षा जगत के कुछ लोगों का मानना है कि यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अकादमिक स्वतंत्रता और संस्थाओं की आलोचना की सीमा जैसे बड़े सवाल भी उठाता है।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूल की किताबों में संतुलन जरूरी है। छात्रों को संस्थाओं की उपलब्धियों के साथ उनकी चुनौतियों के बारे में भी बताया जाना चाहिए, लेकिन भाषा और प्रस्तुति ऐसी होनी चाहिए जिससे किसी संस्था की विश्वसनीयता पर अनावश्यक असर न पड़े।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल यह साफ नहीं है कि विवादित चैप्टर को पूरी तरह हटाया जाएगा या उसमें बदलाव करके दोबारा शामिल किया जाएगा।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट की नई टिप्पणी के बाद अब गेंद सरकार, विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थानों के पाले में है।
यह मामला केवल एक किताब तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने यह बहस भी शुरू कर दी है कि बच्चों की शिक्षा में संस्थागत आलोचना, लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों को किस तरह पढ़ाया जाना चाहिए।

