अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। दोनों देशों के बीच कुछ समय पहले शांति समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे और संघर्ष को कम करने की कोशिशें चल रही थीं, लेकिन इसके बावजूद अमेरिका ने बुधवार तड़के ईरान के 80 से ज्यादा सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर एयरस्ट्राइक कर दी। अमेरिका ने इन हमलों की वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तीन व्यापारिक जहाजों पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमलों को बताया है, जिनके लिए उसने ईरान समर्थित ताकतों को जिम्मेदार ठहराया है।
यह हमला केवल सैन्य कार्रवाई नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके पीछे मध्य-पूर्व की बदलती रणनीति, इज़राइल की सुरक्षा चिंताएं, वैश्विक तेल आपूर्ति और अमेरिका-ईरान शांति प्रक्रिया जैसे कई बड़े पहलू भी जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि इस कार्रवाई पर पूरी दुनिया की नजर है।
अमेरिका ने किन ठिकानों पर हमला किया?
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार यह हमला अत्याधुनिक सटीक हथियारों (Precision Guided Weapons) से किया गया। अमेरिकी सेना ने ईरान के 80 से अधिक सैन्य और नौसैनिक ठिकानों को निशाना बनाया।

इनमें एयर डिफेंस सिस्टम, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, तटीय रडार, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें (Surface-to-Air Missile Systems), एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम, ड्रोन लॉन्च साइट्स और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की 60 से अधिक सैन्य नौकाएं शामिल थीं।

ईरानी मीडिया के अनुसार दक्षिणी ईरान के सीरिक, क़ेश्म द्वीप और बंदर अब्बास में कई तेज धमाके हुए और कई स्थानों पर आग लग गई। बंदर अब्बास ईरान का सबसे महत्वपूर्ण नौसैनिक और व्यापारिक केंद्र माना जाता है, इसलिए इस पर हमला रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अमेरिका ने हमले की वजह क्या बताई?
वॉशिंगटन का कहना है कि यह कार्रवाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजर रहे तीन व्यापारिक जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में की गई।
ब्रिटेन की समुद्री सुरक्षा एजेंसी UKMTO के अनुसार पहली घटना सोमवार रात सामने आई, जब ओमान के लिमाह के पास दक्षिण की ओर जा रहे एक तेल टैंकर से अज्ञात वस्तु टकराई और उसमें आग लग गई। इसके बाद दो अन्य जहाजों पर भी ड्रोन और मिसाइलों से हमले हुए।
सूत्रों के अनुसार प्रभावित जहाजों में एक सऊदी अरब का कच्चे तेल का टैंकर और दूसरा कतर का एलएनजी (LNG) टैंकर था। अमेरिका ने इन घटनाओं के लिए ईरान समर्थित समूहों को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जवाबी कार्रवाई जरूरी थी।
हमला ऐसे समय हुआ जब ईरान में शोक का माहौल था
इस एयरस्ट्राइक की सबसे बड़ी खासियत इसकी टाइमिंग रही। यह हमला ऐसे समय हुआ, जब ईरान में पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा और धार्मिक कार्यक्रम चल रहे थे।
रॉयटर्स के अनुसार अंतिम यात्रा तेहरान से शुरू हुई थी। इसके बाद क़ोम और इराक के नजफ में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जबकि अंतिम संस्कार उनके गृह नगर मशहद में होना था।
यानी पूरा ईरान राष्ट्रीय शोक में डूबा हुआ था और शीर्ष राजनीतिक तथा धार्मिक नेतृत्व अंतिम यात्रा में मौजूद था। ऐसे संवेदनशील समय में अमेरिकी हमले ने तनाव को और बढ़ा दिया।
शांति समझौते के बाद भी क्यों बढ़ा तनाव?
अमेरिका और ईरान ने 17 जून को तनाव कम करने के उद्देश्य से एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच लगातार बढ़ रहे सैन्य तनाव को नियंत्रित करना और परमाणु कार्यक्रम समेत अन्य विवादित मुद्दों पर बातचीत जारी रखना था।

हालांकि समझौते के बाद भी दोनों पक्षों के बीच कई बार सीमित सैन्य कार्रवाई, ड्रोन हमले और जवाबी ऑपरेशन होते रहे। इसी बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमले हुए, जिसके बाद अमेरिका ने सीधी सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुना। यानी कागज पर शांति प्रक्रिया जारी रही, लेकिन जमीन पर तनाव लगातार बना रहा।
ट्रंप ने पहले क्या कहा था?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हमले से पहले Axios को दिए इंटरव्यू में कहा था कि खामेनेई की अंतिम यात्रा के दौरान दोनों पक्ष बातचीत से एक सप्ताह का विराम लेंगे और इस दौरान कोई भी पक्ष एक-दूसरे पर हमला नहीं करेगा।
उन्होंने यह भी दावा किया था कि यदि अमेरिका चाहे तो ईरान के पूरे शीर्ष नेतृत्व को एक ही हमले में खत्म कर सकता है, लेकिन ऐसा नहीं करेगा क्योंकि फिर बातचीत करने के लिए कोई नहीं बचेगा।
ट्रंप के इस बयान के कुछ समय बाद ही अमेरिकी एयरस्ट्राइक होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल खड़े हो गए।
इज़राइल और अमेरिका की रणनीति में अंतर क्यों दिखने लगा?
हाल के महीनों में अमेरिका और इज़राइल दोनों ईरान के खिलाफ एक ही पक्ष में दिखाई देते रहे हैं, लेकिन उनकी रणनीतियों में अंतर भी सामने आने लगा है।
अमेरिका जहां ईरान के साथ किसी प्रकार का स्थायी समझौता चाहता रहा, वहीं इज़राइल का मानना है कि केवल बातचीत से ईरान की सैन्य क्षमता को रोका नहीं जा सकता।
इज़राइल पहले भी कह चुका है कि यदि जरूरत पड़ी तो वह अपनी सुरक्षा के लिए अकेले भी कार्रवाई करेगा। यही कारण है कि दोनों देशों की प्राथमिकताएं कई बार अलग दिखाई देती हैं।
JD Vance ने इज़राइल को क्या संदेश दिया?
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने व्हाइट हाउस में कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप इस समय दुनिया के उन गिने-चुने नेताओं में हैं जो खुले तौर पर इज़राइल का समर्थन कर रहे हैं।

उन्होंने इज़राइली नेताओं को सलाह दी कि उन्हें अपने सबसे बड़े सहयोगी की सार्वजनिक आलोचना करने से बचना चाहिए।
वेंस ने कहा कि इज़राइल की रक्षा में इस्तेमाल होने वाले लगभग दो-तिहाई हथियार अमेरिकी उद्योग में बने हैं और उनका खर्च अमेरिकी करदाताओं ने उठाया है। इसलिए दोनों देशों के बीच सार्वजनिक मतभेद किसी के हित में नहीं हैं।
नेतन्याहू ने हथियारों में आत्मनिर्भर बनने की बात क्यों कही?
इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि अमेरिका का समर्थन हमेशा महत्वपूर्ण रहेगा, लेकिन अब इज़राइल को धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र हथियार प्रणाली विकसित करनी होगी।
उन्होंने कहा कि भविष्य के युद्ध केवल विदेशी सहायता के भरोसे नहीं लड़े जा सकते। इसलिए इज़राइल अपनी रक्षा तकनीक, मिसाइल प्रणाली और सैन्य उद्योग को और मजबूत बना रहा है।
वर्तमान में अमेरिका और इज़राइल के बीच 2028 तक लागू 10 वर्षीय रक्षा समझौता प्रभावी है, जिसके तहत अमेरिका हर वर्ष लगभग 3.8 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देता है।
ईरान के वार्ताकारों को लेकर अमेरिका क्यों चिंतित था?
हालिया घटनाक्रम के बीच एक और महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस वर्ष जब अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम शांति समझौते पर बातचीत चल रही थी, तब वॉशिंगटन को आशंका थी कि इज़राइल ईरान के उन वरिष्ठ नेताओं को निशाना बना सकता है, जो अमेरिका के साथ बातचीत का नेतृत्व कर रहे थे।
इन नेताओं में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ प्रमुख थे। अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि यदि इन नेताओं की हत्या हो जाती, तो शांति प्रक्रिया पूरी तरह टूट सकती थी और युद्ध फिर से भड़क सकता था। यही वजह थी कि अमेरिका ने क्षेत्र के कुछ अन्य देशों से भी ईरान को संभावित खतरे के बारे में सतर्क करने का अनुरोध किया था।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, युद्ध के शुरुआती चरण में ये दोनों नेता इज़राइल की संभावित लक्ष्य सूची में थे, लेकिन जब वार्ताएं गंभीर रूप से शुरू हुईं तो अमेरिका नहीं चाहता था कि बातचीत को किसी भी तरह का झटका लगे।
इज़राइल की प्राथमिकता और अमेरिका की सोच में अंतर
रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध की शुरुआत से ही इज़राइल की रणनीति ईरान के शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को कमजोर करने की रही थी। शुरुआती हमलों में ईरान के कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौत हुई। इनमें कुछ ऐसे नेता भी शामिल थे जिन्हें ट्रंप प्रशासन अपेक्षाकृत व्यवहारिक मानता था और जिनके माध्यम से वह भविष्य में बातचीत करना चाहता था।
अमेरिका का मानना था कि यदि वार्ता से जुड़े नेताओं को निशाना बनाया गया, तो कूटनीतिक समाधान की संभावना समाप्त हो जाएगी। वहीं इज़राइल की प्राथमिकता ईरान की सैन्य और राजनीतिक क्षमता को अधिकतम नुकसान पहुंचाना थी। इसी वजह से दोनों सहयोगी देशों की रणनीतियों में अंतर स्पष्ट दिखाई देने लगा।
हालांकि बाद में इज़राइल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने कभी भी ईरानी वार्ताकारों की हत्या की कोई योजना नहीं बनाई थी और इस तरह की खबरें पूरी तरह निराधार हैं।
क्या इज़राइल फैक्टर भी अमेरिकी हमले की वजह हो सकता है?
अमेरिका ने आधिकारिक रूप से कहा है कि ईरान पर की गई एयरस्ट्राइक केवल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यापारिक जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में की गई।

लेकिन इस हमले की टाइमिंग ने कई रणनीतिक सवाल जरूर खड़े किए हैं। एक तरफ ट्रंप स्वयं कह चुके थे कि खामेनेई की अंतिम यात्रा के दौरान दोनों पक्ष हमला नहीं करेंगे, वहीं दूसरी ओर इसी दौरान इज़राइल लेबनान में अपने सैन्य अभियान जारी रखे हुए था।
कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका संभवतः एक सीमित लेकिन प्रभावशाली हमला करके इज़राइल को यह संदेश देना चाहता था कि वह अभी भी ईरान पर दबाव बनाए हुए है और इज़राइल को कोई बड़ा एकतरफा सैन्य कदम उठाने की जरूरत नहीं है।
हालांकि यह केवल विश्लेषण है। अमेरिका ने कभी आधिकारिक रूप से यह नहीं कहा कि उसकी कार्रवाई का उद्देश्य इज़राइल को रोकना या संतुष्ट करना था।
इज़राइल दौरे पर जाएंगे अमेरिकी रक्षा मंत्री
अमेरिकी एयरस्ट्राइक के तुरंत बाद रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के इज़राइल दौरे की खबर भी सामने आई। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, वे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और रक्षा मंत्री इज़राइल काट्ज़ से मुलाकात करेंगे।
यह दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब ईरान पर अमेरिकी हमलों के बाद पूरे मध्य-पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच आगे की रणनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात पर विस्तार से चर्चा होगी।
ईरान ने अमेरिका पर समझौता तोड़ने का आरोप लगाया
अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने आरोप लगाया कि अमेरिका ने दोनों देशों के बीच हुए समझौते की कई शर्तों का उल्लंघन किया है।
उनके अनुसार अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान के अधिकारों में हस्तक्षेप किया, लगातार सैन्य कार्रवाई की धमकियां दीं, ईरानी तेल निर्यात पर फिर से प्रतिबंध लगाए, दक्षिणी ईरान में एयरस्ट्राइक की और लेबनान में जारी इज़राइली सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया।
ईरान के उप विदेश मंत्री ने भी अमेरिकी हमलों को अमेरिका-ईरान समझौता ज्ञापन (MoU) का उल्लंघन बताया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि होर्मुज में जहाजों पर हमले के अमेरिकी आरोप पूरी तरह निराधार हैं।
अमेरिका के हमले के बाद ईरान ने क्या दावा किया?
अमेरिकी एयरस्ट्राइक के कुछ ही समय बाद इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि उसने बहरीन और कुवैत में मौजूद 85 अमेरिकी सैन्य ठिकानों को मिसाइल और ड्रोन हमलों का निशाना बनाया है।
IRGC के अनुसार, इन हमलों में बहरीन स्थित अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट मुख्यालय और कुवैत के अली अल-सलेम एयर बेस को निशाना बनाया गया।
हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और अमेरिका की ओर से भी तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
इसी दौरान कुवैत और बहरीन में एयर रेड सायरन भी बजाए गए। दोनों देशों की सरकारों ने नागरिकों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की, हालांकि किसी बड़े नुकसान की पुष्टि नहीं की गई।
ईरानी राष्ट्रपति अंतिम यात्रा छोड़कर लौटे
अमेरिकी एयरस्ट्राइक के बाद ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान इराक के नजफ से तत्काल तेहरान लौट आए। वे पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम धार्मिक रस्मों में शामिल होने पहुंचे थे।
खामेनेई का पार्थिव शरीर पहले तेहरान से इराक के नजफ लाया गया, जहां शिया धर्मगुरुओं और इराकी अधिकारियों ने श्रद्धांजलि दी। इसके बाद अंतिम यात्रा कर्बला पहुंचनी थी और फिर पार्थिव शरीर को ईरान के मशहद ले जाकर सुपुर्द-ए-खाक किया जाना था।
तेल बाजार पर क्या असर पड़ा?
अमेरिकी हमलों के तुरंत बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल देखी गई। अमेरिकी क्रूड ऑयल (WTI) की कीमत लगभग 2.7 प्रतिशत बढ़कर 72.40 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई।
इसके अलावा अमेरिका ने 17 जुलाई से ईरानी तेल निर्यात पर दोबारा प्रतिबंध लागू करने का भी ऐलान किया है। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
तनाव का असर बॉन्ड बाजार पर भी दिखाई दिया। निवेशकों को महंगाई और ब्याज दरें बढ़ने की आशंका के चलते अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड फ्यूचर्स में गिरावट दर्ज की गई।
भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लंबे समय तक जारी रहता है या होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो इसका असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है और उसका महत्वपूर्ण भाग इसी समुद्री मार्ग से होकर आता है।
ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत, महंगाई और आयात बिल पर दबाव बढ़ने की संभावना रहती है। हालांकि इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि मौजूदा तनाव कितने समय तक बना रहता है और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही कितनी प्रभावित होती है।
FAQs
- अमेरिका ने ईरान पर एयरस्ट्राइक क्यों की?
अमेरिका का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तीन व्यापारिक जहाजों पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमलों के जवाब में उसने ईरान के 80 से अधिक सैन्य ठिकानों पर एयरस्ट्राइक की। अमेरिका ने इन हमलों के लिए ईरान समर्थित ताकतों को जिम्मेदार ठहराया है। - इस संघर्ष का वैश्विक तेल बाजार पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है या तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे दुनिया भर में ईंधन की लागत और महंगाई पर असर पड़ने की आशंका रहती है। - क्या इस घटना से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं?
हाँ। अमेरिकी एयरस्ट्राइक के बाद अमेरिकी क्रूड ऑयल (WTI) की कीमत लगभग 2.7% बढ़कर 72.40 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई। बाजार में आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका के कारण कीमतों में तेजी देखी गई। - अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर क्यों बढ़ गया?
हालांकि दोनों देशों के बीच पहले शांति समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमले, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े विवादों के कारण तनाव फिर बढ़ गया। - स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल के निर्यात का लगभग 20% हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। - क्या इस हमले पर संयुक्त राष्ट्र की कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आई है?
इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक संयुक्त राष्ट्र की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया या प्रस्ताव सार्वजनिक नहीं किया गया था। हालांकि कई देश क्षेत्र में तनाव कम करने और बातचीत जारी रखने की अपील कर रहे हैं। - क्या अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता पूरी तरह समाप्त हो गई है?
नहीं। दोनों देशों के बीच हालिया सैन्य तनाव के बावजूद अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि कूटनीतिक संपर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं और वार्ता की संभावनाएं अभी भी बनी हुई हैं।

