भारत में गर्मी के अंतिम दौर और कई क्षेत्रों में कम बारिश के कारण देश के प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडार लगातार घटता जा रहा है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश के 166 बड़े जलाशयों में उपलब्ध पानी अब उनकी कुल क्षमता का केवल लगभग 30 प्रतिशत रह गया है। हालांकि यह स्तर पिछले वर्ष और दीर्घकालिक औसत से थोड़ा बेहतर है, लेकिन कई राज्यों में स्थिति चिंता बढ़ाने वाली बनती जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दक्षिण-पश्चिम मानसून की प्रगति में और देरी होती है तो जल संकट का दबाव और बढ़ सकता है। दूसरी ओर, मौसम विभाग को उम्मीद है कि मानसून की सक्रियता अगले कुछ दिनों में बढ़ेगी, जिससे जलाशयों में पानी का स्तर सुधर सकता है।

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166 प्रमुख जलाशयों में कितना पानी बचा है?
केंद्रीय जल आयोग की साप्ताहिक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 166 बड़े जलाशयों की कुल भंडारण क्षमता 183.565 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) है। इनमें इस समय लगभग 56.3 BCM पानी मौजूद है, जो कुल क्षमता का 30.67 प्रतिशत है।
सरल शब्दों में कहें तो देश के चार में से लगभग तीन बड़े जलाशय आधे से अधिक खाली हो चुके हैं। गर्मी के मौसम में सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक उपयोग के कारण जलाशयों से लगातार पानी निकाला जाता है, जबकि पर्याप्त वर्षा नहीं होने से इनका पुनर्भरण नहीं हो पाया।
हालांकि राहत की बात यह है कि वर्तमान भंडारण पिछले साल की समान अवधि और सामान्य औसत स्तर से थोड़ा बेहतर बना हुआ है।
कम बारिश का असर जलाशयों पर साफ दिखा
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़े बताते हैं कि 1 मार्च से 28 मई के बीच देश के लगभग 29 प्रतिशत जिलों में सामान्य से कम या बिल्कुल बारिश नहीं हुई।
इससे पहले जनवरी और फरवरी के दौरान देश के करीब 70 प्रतिशत हिस्से में वर्षा की कमी दर्ज की गई थी। लगातार कई महीनों तक कम बारिश रहने से नदियों और जलाशयों में आने वाला पानी घट गया, जिसका असर अब भंडारण स्तर पर दिखाई दे रहा है।
विशेष रूप से पूर्वी और दक्षिणी भारत के जलाशयों में पानी का स्तर काफी नीचे पहुंच चुका है।
दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा चिंता
देश के पांच भौगोलिक क्षेत्रों में दक्षिण भारत की स्थिति सबसे कमजोर नजर आ रही है।
दक्षिणी क्षेत्र के 47 प्रमुख जलाशयों की कुल क्षमता 55.288 BCM है, लेकिन इनमें इस समय केवल 12.459 BCM पानी बचा है। यह कुल क्षमता का लगभग 22.5 प्रतिशत है।
कई राज्यों में हालात और अधिक चुनौतीपूर्ण हैं।
राज्यों की स्थिति
- तेलंगाना : लगभग 16 प्रतिशत भंडारण
- कर्नाटक : लगभग 16.77 प्रतिशत
- केरल : करीब 20 प्रतिशत
- आंध्र प्रदेश : लगभग 35 प्रतिशत
- तमिलनाडु : लगभग 33 प्रतिशत
तेलंगाना और कर्नाटक में जलाशयों का स्तर सबसे निचले स्तरों में शामिल है। यदि मानसून से पर्याप्त बारिश नहीं मिली तो आने वाले हफ्तों में पेयजल और सिंचाई दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।
पूर्वी भारत के जलाशयों में भी कम पानी
पूर्वी क्षेत्र के 27 प्रमुख जलाशयों में कुल 21.759 BCM क्षमता के मुकाबले केवल 5.323 BCM पानी मौजूद है। यह कुल क्षमता का लगभग 24 प्रतिशत है।
राज्यवार स्थिति
- पश्चिम बंगाल : लगभग 12.5 प्रतिशत
- ओडिशा : लगभग 21.5 प्रतिशत
- असम : लगभग 37 प्रतिशत
- मेघालय : 55 प्रतिशत से अधिक
- त्रिपुरा : 60 प्रतिशत से अधिक
हाल की बारिश के कारण पूर्वोत्तर राज्यों में कुछ राहत मिली है। खासकर मेघालय और त्रिपुरा के जलाशयों में अपेक्षाकृत बेहतर जल भंडारण दर्ज किया गया है।
उत्तर भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर
उत्तर भारत के 11 प्रमुख जलाशयों में कुल 19.836 BCM क्षमता के मुकाबले 7.694 BCM पानी मौजूद है। यह लगभग 39 प्रतिशत भंडारण के बराबर है।
यह स्तर देश के अन्य क्षेत्रों की तुलना में बेहतर माना जा रहा है।
मुख्य राज्यों का हाल
- पंजाब : लगभग 59 प्रतिशत
- राजस्थान : लगभग 44 प्रतिशत
- हिमाचल प्रदेश : लगभग 33 प्रतिशत
पंजाब में जलाशयों की स्थिति सबसे मजबूत दिखाई दे रही है, जबकि हिमाचल प्रदेश में पानी का स्तर अपेक्षाकृत कम है।
पश्चिमी भारत में भी दबाव बढ़ रहा है
पश्चिमी क्षेत्र के 53 जलाशयों में कुल 38.094 BCM क्षमता के मुकाबले 13.625 BCM पानी उपलब्ध है। यह लगभग 36 प्रतिशत भंडारण है।
राज्यों का आंकड़ा
- महाराष्ट्र : लगभग 28 प्रतिशत
- गुजरात : लगभग 45 प्रतिशत
- गोवा : लगभग 31 प्रतिशत
महाराष्ट्र में जलाशयों का स्तर अपेक्षाकृत कम बना हुआ है। राज्य के कई हिस्से खेती और पेयजल के लिए बड़े बांधों पर निर्भर हैं, इसलिए मानसून का प्रदर्शन यहां बेहद महत्वपूर्ण रहेगा।
मध्य भारत में क्या स्थिति है?
मध्य क्षेत्र के 28 प्रमुख जलाशयों में कुल 48.588 BCM क्षमता के मुकाबले 17.199 BCM पानी मौजूद है। यह लगभग 35 प्रतिशत भंडारण है।
राज्यों की स्थिति
- छत्तीसगढ़ : लगभग 54 प्रतिशत
- मध्य प्रदेश : लगभग 36 प्रतिशत
- उत्तर प्रदेश : लगभग 33 प्रतिशत
- उत्तराखंड : लगभग 19 प्रतिशत
इस क्षेत्र में छत्तीसगढ़ सबसे बेहतर स्थिति में है, जबकि उत्तराखंड में जलाशयों का स्तर काफी नीचे बना हुआ है।
मानसून की देरी बढ़ा सकती है मुश्किलें
जल विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय जलाशयों में पानी का स्तर मुख्य रूप से आने वाले मानसून पर निर्भर करेगा। यदि मानसून सामान्य गति से आगे बढ़ता है और पर्याप्त वर्षा होती है तो अधिकांश जलाशयों में तेजी से पानी भरना शुरू हो जाएगा।
लेकिन यदि बारिश में देरी होती है या वर्षा सामान्य से कम रहती है, तो कई राज्यों को पेयजल और सिंचाई संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है
क्यों महत्वपूर्ण हैं जलाशय?
देश के बड़े बांध और जलाशय केवल पेयजल का स्रोत नहीं हैं। इनका उपयोग कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में होता है।
- किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना
- शहरों और गांवों को पेयजल देना
- जलविद्युत उत्पादन
- औद्योगिक जरूरतों की पूर्ति
- सूखे और जल संकट के दौरान राहत प्रदान करना
इसी वजह से जलाशयों में पानी का स्तर देश की जल सुरक्षा का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।
आने वाले दिनों में क्या उम्मीद?
मौसम विभाग का अनुमान है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून अगले सप्ताह के दौरान अधिक सक्रिय हो सकता है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो दक्षिण, पश्चिम और मध्य भारत के जलाशयों में पानी का स्तर बढ़ने लगेगा।
फिलहाल देश के अधिकांश बड़े जलाशय अपनी कुल क्षमता के लगभग एक-तिहाई स्तर पर हैं। ऐसे में अगले कुछ सप्ताह मानसून और जल प्रबंधन दोनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। यदि बारिश सामान्य रहती है तो जल संकट की आशंकाएं काफी हद तक कम हो सकती हैं, लेकिन कमजोर मानसून की स्थिति में कई राज्यों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ सकती है।

