मध्य पूर्व में जारी तनाव अब सिर्फ युद्ध या राजनीति तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका असर धीरे-धीरे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और खास तौर पर खाद्य सुरक्षा पर दिखने लगा है। World Bank के मुख्य अर्थशास्त्री इंदरमीत गिल ने चेतावनी दी है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो दुनिया में करोड़ों लोग और भूख की चपेट में आ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि अभी दुनिया में लगभग 30 करोड़ लोग पहले से ही गंभीर खाद्य संकट से जूझ रहे हैं। लेकिन मौजूदा हालात के चलते यह संख्या बहुत तेजी से करीब 20% तक बढ़ सकती है। यानी आने वाले समय में करोड़ों नए लोग खाने की कमी का सामना कर सकते हैं।
तेल मार्ग बाधित, असर खेती पर
इस पूरे संकट की जड़ में एक अहम कारण है Strait of Hormuz, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। यहां पर रुकावट या खतरे के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है।
तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर खाद (फर्टिलाइज़र) पर पड़ता है, क्योंकि उसका उत्पादन पेट्रोलियम आधारित होता है। जब खाद महंगी होती है, तो खेती की लागत बढ़ जाती है। इसका असर अंततः खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर पड़ता है।
यही वजह है कि कई देश अब अपने खाद्य भंडार को सुरक्षित रखने के लिए निर्यात रोकने पर विचार कर रहे हैं। अगर ऐसा होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्यान्न की कमी और ज्यादा बढ़ सकती है।

गरीब देशों पर सबसे ज्यादा असर
इस संकट का सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ने वाला है, जहां पहले से ही युद्ध या राजनीतिक अस्थिरता है। ऐसे देशों के पास न तो मजबूत अर्थव्यवस्था होती है और न ही पर्याप्त संसाधन।
इंदरमीत गिल के मुताबिक, अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो इन देशों में भूख तेजी से फैल सकती है। अभी इसका असर एशिया में ज्यादा दिख रहा है, लेकिन धीरे-धीरे यह अफ्रीका जैसे क्षेत्रों तक भी पहुंच सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि फिलहाल बाजार में जो खाना उपलब्ध है, वह पहले ही उगाया जा चुका है। असली असर आने वाले महीनों में दिखाई देगा, जब नई फसल महंगे इनपुट के कारण प्रभावित होगी।
महंगाई और धीमी अर्थव्यवस्था का खतरा
इस संकट का असर सिर्फ खाने की चीजों तक सीमित नहीं रहेगा। अगर हालात बिगड़ते हैं, तो वैश्विक महंगाई भी तेजी से बढ़ सकती है।
एक अनुमान के मुताबिक, अगर संकट लंबा चला, तो दुनिया में महंगाई करीब 3% से बढ़कर 4.7% तक जा सकती है। साथ ही, आर्थिक विकास दर में भी भारी गिरावट आ सकती है।
यह स्थिति खासकर गरीब देशों के लिए दोहरी मार साबित होगी। एक तरफ महंगाई बढ़ेगी, दूसरी तरफ उनकी आर्थिक वृद्धि धीमी हो जाएगी। इससे कर्ज चुकाने की उनकी क्षमता भी कमजोर पड़ेगी और वे भविष्य के संकटों से निपटने में और पीछे रह जाएंगे।
बड़े देश क्यों सुरक्षित दिखते हैं?
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जब हम वैश्विक आंकड़ों को देखते हैं, तो कई बार हालात उतने खराब नहीं लगते। इसकी वजह है कि बड़े देश जैसे अमेरिका, चीन और भारत की मजबूत अर्थव्यवस्थाएं कुल आंकड़ों को बेहतर दिखाती हैं।
लेकिन अगर इन बड़े देशों को अलग कर दिया जाए, तो कई छोटे और कमजोर देशों की स्थिति काफी चिंताजनक नजर आती है।
आने वाले महीनों में बढ़ सकता है खतरा
इंदरमीत गिल ने चेतावनी दी कि अगर यह संकट अगस्त तक खिंचता है, तो जो आज “सबसे खराब स्थिति” लग रही है, वही सामान्य बन सकती है।
इसका मतलब है कि समय के साथ जोखिम लगातार बढ़ रहा है। हर बीतते दिन के साथ दुनिया एक बड़े खाद्य संकट के और करीब पहुंचती जा रही है।
क्या है सबसे बड़ा डर?
सबसे बड़ा खतरा यह है कि अगर देश अपने-अपने हितों को देखते हुए खाद्य निर्यात पर रोक लगाने लगते हैं, तो वैश्विक स्तर पर खाने की चीजों की कमी और महंगाई दोनों तेजी से बढ़ेंगे।
इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ेगा, खासकर उन पर जो पहले से ही अपनी आय का बड़ा हिस्सा खाने और ईंधन पर खर्च करते हैं।
निष्कर्ष:
मध्य पूर्व का यह संकट अब सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है – खासतौर पर खाने की कीमतों, महंगाई और आर्थिक स्थिरता पर।
अगर जल्द ही कोई समाधान नहीं निकला, तो आने वाले महीनों में दुनिया को एक बड़े खाद्य संकट का सामना करना पड़ सकता है।

