भारत सरकार ने ऊर्जा और विदेशी मुद्रा को लेकर बड़ा कदम उठाया है। केंद्र ने कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन पर लगने वाली रॉयल्टी दरों में कटौती कर दी है। इसका मकसद देश में तेल और गैस की घरेलू खोज और उत्पादन को बढ़ावा देना है, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने दुनिया भर की सप्लाई चेन और ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर दिया है।
इसी बीच प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी लोगों से अपील की है कि वे विदेशी सामानों पर निर्भरता कम करें, पेट्रोल-डीजल की खपत घटाएं और गैरजरूरी विदेश यात्राओं से बचें। सरकार का मानना है कि मौजूदा वैश्विक हालात में भारत को अपनी अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाए रखना जरूरी है।
आखिर सरकार ने रॉयल्टी घटाई क्यों?
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 8 मई को नई रॉयल्टी व्यवस्था जारी की। इसके तहत जमीन पर मिलने वाले कच्चे तेल पर रॉयल्टी 10% और समुद्र में मिलने वाले तेल पर 8% कर दी गई है। वहीं प्राकृतिक गैस पर भी नई गणना पद्धति लागू की गई है, जिससे कंपनियों पर बोझ कम होगा।
सरल शब्दों में समझें तो अब भारत में तेल और गैस निकालना पहले के मुकाबले सस्ता और फायदेमंद बनाया जा रहा है। सरकार चाहती है कि कंपनियां देश के भीतर ज्यादा ड्रिलिंग करें, खासकर उन इलाकों में जहां उत्पादन तकनीकी रूप से मुश्किल और महंगा माना जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। अगर अंतरराष्ट्रीय हालात बिगड़ते हैं या तेल सप्लाई प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर प्रोजेक्ट्स को सबसे ज्यादा राहत
नई नीति में सबसे ज्यादा फायदा डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर क्षेत्रों को दिया गया है। ये वे समुद्री इलाके होते हैं जहां बहुत गहराई में तेल और गैस के भंडार मौजूद होते हैं। वहां काम करना बेहद महंगा और जोखिम भरा होता है।
सरकार ने HELP और DSF नीति के तहत आने वाले इन क्षेत्रों के लिए पहले सात साल तक रॉयल्टी पूरी तरह खत्म कर दी है। यानी शुरुआती वर्षों में कंपनियों को कोई रॉयल्टी नहीं देनी होगी।
इसके बाद भी रॉयल्टी दरें काफी कम रखी गई हैं। डीपवॉटर क्षेत्रों के लिए सिर्फ 5% और अल्ट्रा-डीपवॉटर क्षेत्रों के लिए 2% रॉयल्टी तय की गई है।
पेट्रोलियम मंत्री Hardeep Singh Puri ने इसे बड़ा सुधार बताया है। उनके मुताबिक यह फैसला पुराने ढांचे की कमियों को दूर करेगा और विदेशी व घरेलू निवेशकों के लिए माहौल बेहतर बनाएगा।
भारत को इतनी चिंता क्यों है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है। देश अपनी तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ऐसे में जब भी दुनिया में युद्ध, तनाव या सप्लाई संकट पैदा होता है, भारत की चिंता बढ़ जाती है।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने तेल बाजार को पहले ही हिला दिया है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। इसके अलावा समुद्री रास्तों पर भी खतरा बढ़ा है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम मार्गों पर।
भारत की बड़ी मात्रा में तेल सप्लाई इसी रास्ते से आती है। अगर यहां कोई रुकावट आती है, तो देश का आयात बिल और बढ़ सकता है।
यही वजह है कि सरकार अब घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है। संदेश साफ है — अगर दुनिया में संकट बढ़े, तो भारत को अपनी जरूरतों के लिए खुद ज्यादा सक्षम बनना होगा।

पीएम मोदी ने लोगों से क्या अपील की?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में लोगों से अपील की कि वे विदेशी मुद्रा खर्च करने वाली गतिविधियों को कम करें। उन्होंने कहा कि गैरजरूरी विदेश यात्राओं और सोने जैसी चीजों की खरीद को टालना चाहिए।
इसके साथ ही उन्होंने लोगों से पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल कम करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने, मेट्रो और रेलवे का ज्यादा उपयोग करने और कारपूलिंग जैसी आदतें अपनाने की भी सलाह दी।
सरकार का मानना है कि इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा। क्योंकि तेल और विदेशी यात्राओं दोनों में डॉलर खर्च होता है।
विदेशी मुद्रा भंडार पर कितना दबाव?
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक फरवरी 2026 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 728 अरब डॉलर था। लेकिन अप्रैल तक यह घटकर लगभग 691 अरब डॉलर रह गया।
विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा की तरह माना जाता है। इसी पैसे से देश तेल, गैस, मशीनें और दूसरी जरूरी चीजें खरीदता है।
जब ज्यादा डॉलर बाहर जाते हैं और कम डॉलर अंदर आते हैं, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है। इसी कारण सरकार अब खर्च और आयात दोनों पर नजर रख रही है।
विदेश यात्रा भी क्यों चिंता का कारण बनी?
सरकार की चिंता सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। विदेश यात्राओं से भी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर जाती है।
2025 में करीब 1.43 करोड़ भारतीय केवल घूमने-फिरने के लिए विदेश गए थे। जब कोई भारतीय विदेश में होटल, टिकट, खाना या खरीदारी पर खर्च करता है, तो भुगतान डॉलर या दूसरी विदेशी मुद्रा में होता है।
यानी हर विदेशी यात्रा भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर असर डालती है।
इसके उलट जब विदेशी पर्यटक भारत आते हैं, तो वे अपने साथ डॉलर और दूसरी विदेशी मुद्रा लाते हैं। इससे देश को फायदा होता है।
रुपये पर भी बढ़ रहा दबाव
पश्चिम एशिया संकट और बढ़ते आयात खर्च के बीच भारतीय रुपया भी दबाव में है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हुआ है और एक समय यह 95 रुपये प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया।
रुपया कमजोर होने का असर आम लोगों पर भी पड़ता है। विदेश यात्रा, आयातित सामान, पेट्रोल और कई दूसरी चीजें महंगी हो जाती हैं।
यही वजह है कि सरकार अब विदेशी मुद्रा बचाने और आयात घटाने के उपायों पर जोर दे रही है।
क्या घरेलू पर्यटन को मिलेगा फायदा?
ट्रैवल इंडस्ट्री के लोगों का कहना है कि हालात बदलने से घरेलू पर्यटन को बड़ा फायदा मिल सकता है।
अब कई लोग विदेश की बजाय भारत के भीतर घूमने की योजना बना रहे हैं। कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, राजस्थान, केरल और पूर्वोत्तर राज्यों में बुकिंग बढ़ने लगी है।
टूरिज्म उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ मजबूरी नहीं बल्कि अवसर भी बन सकता है। इससे भारत के भीतर रोजगार, होटल उद्योग और स्थानीय कारोबार को फायदा मिलेगा।
“वोकल फॉर लोकल” का नया रूप
सरकार का “वोकल फॉर लोकल” अभियान अब सिर्फ सामान खरीदने तक सीमित नहीं रह गया है। अब इसका असर ऊर्जा, पर्यटन और खर्च की आदतों तक भी पहुंच रहा है।
सरकार चाहती है कि लोग ज्यादा से ज्यादा घरेलू विकल्प अपनाएं। चाहे वह यात्रा हो, ईंधन की बचत हो या स्थानीय उद्योगों का समर्थन।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत आयात पर निर्भरता कम कर पाता है और घरेलू उत्पादन बढ़ाता है, तो लंबे समय में इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।

