भारत की सबसे बड़ी पोर्ट और लॉजिस्टिक्स कंपनियों में शामिल Adani Ports and Special Economic Zone ने समुद्री कारोबार को लेकर एक बड़ा कदम उठाया है। कंपनी ने अपनी मरीन यूनिट ‘एस्ट्रो ऑफशोर’ के जरिए अमेरिकी कंपनी Oceaneering International के साथ साझेदारी की है। इस समझौते का मकसद यूरोप में गहरे समुद्र यानी अल्ट्रा-डीपवॉटर प्रोजेक्ट्स और पानी के नीचे होने वाले विशेष इंजीनियरिंग कार्यों में उतरना है।
यह कदम सिर्फ एक सामान्य बिजनेस डील नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे अडाणी समूह की उस लंबी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है जिसके तहत कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी इंटीग्रेटेड मरीन प्लेटफॉर्म कंपनियों में शामिल होना चाहती है। कंपनी अब केवल बंदरगाह संचालन तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि समुद्री लॉजिस्टिक्स, ऑफशोर सपोर्ट, अंडरवॉटर इंजीनियरिंग और डीपवॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में भी अपनी मजबूत मौजूदगी बनाना चाहती है।
आखिर यह साझेदारी इतनी अहम क्यों मानी जा रही है?
समुद्र के अंदर होने वाले प्रोजेक्ट सामान्य जहाजरानी से काफी अलग होते हैं। यहां तेल और गैस पाइपलाइन बिछाने, समुद्र के नीचे केबल लगाने, भारी मशीनरी स्थापित करने और गहरे पानी में निर्माण जैसे बेहद तकनीकी काम किए जाते हैं। इन प्रोजेक्ट्स के लिए हाई-टेक जहाज, आधुनिक उपकरण और खास इंजीनियरिंग क्षमता की जरूरत होती है।
अडाणी पोर्ट्स ने कहा है कि इस साझेदारी के जरिए उसकी मरीन यूनिट एस्ट्रो ऑफशोर को यूरोप के ऑफशोर मार्केट में एंट्री मिलेगी। वहीं दूसरी तरफ Oceaneering International को एस्ट्रो ऑफशोर के बढ़ते जहाजी बेड़े और एशियाई नेटवर्क का फायदा मिलेगा।
कंपनी के मुताबिक यह समझौता उसे अल्ट्रा-डीपवॉटर ऑपरेशंस में तेजी से आगे बढ़ने में मदद करेगा। अभी तक इस क्षेत्र में दुनिया की कुछ गिनी-चुनी कंपनियों का दबदबा रहा है, लेकिन अब भारतीय कंपनियां भी वहां अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं।
कंपनी ने खरीदा नया हाई-टेक जहाज
इस विस्तार के साथ एस्ट्रो ऑफशोर ने अपना पहला अल्ट्रा-डीपवॉटर जहाज भी शामिल किया है। पहले इसका नाम ‘एनर्जी सवाना’ था, जिसे अब ‘एस्ट्रो एटलस’ नाम दिया गया है।
यह जहाज साल 2021 में बनाया गया था और इसे बेहद आधुनिक तकनीक से लैस माना जाता है। इसकी लंबाई करीब 97 मीटर है और इसमें ऐसे सिस्टम लगाए गए हैं जो गहरे समुद्र में भी जहाज को स्थिर बनाए रखते हैं।
इस जहाज की सबसे खास बात इसकी भारी लिफ्टिंग क्षमता है। इसमें 150 टन तक वजन उठाने वाली सबसी क्रेन लगी है। इसके अलावा इसमें दूसरी सहायक क्रेन, मूनपूल सिस्टम और करीब 100 लोगों के रहने की सुविधा भी मौजूद है।
कंपनी का कहना है कि यह जहाज 3,000 मीटर से ज्यादा गहराई वाले समुद्री इलाकों में काम कर सकता है। इसका इस्तेमाल समुद्र के नीचे पाइपलाइन बिछाने, केबल लगाने और निर्माण कार्यों में किया जाएगा।

अडाणी पोर्ट्स का फोकस अब सिर्फ बंदरगाह नहीं
अब तक अडाणी पोर्ट्स को मुख्य रूप से बंदरगाह संचालन और कार्गो कारोबार के लिए जाना जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कंपनी ने मरीन सर्विसेज में भी तेजी से विस्तार शुरू किया है।
कंपनी का लक्ष्य आने वाले वर्षों में 200 जहाजों का बड़ा बेड़ा तैयार करना है। इसके लिए FY31 तक करीब 13,000 करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनाई गई है। साथ ही कंपनी मरीन बिजनेस से 6,000 करोड़ रुपये की सालाना कमाई का लक्ष्य भी रख रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऑफशोर ऊर्जा, समुद्री केबल नेटवर्क और गहरे समुद्र से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स तेजी से बढ़ेंगे। ऐसे में अडाणी समूह पहले से अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहता है।
कंपनी के अधिकारियों ने क्या कहा?
अडाणी पोर्ट्स के पूर्णकालिक निदेशक और CEO Ashwani Gupta ने कहा कि यह साझेदारी कंपनी के ग्लोबल विस्तार के लिए महत्वपूर्ण कदम है। उनके मुताबिक एस्ट्रो ऑफशोर के आधुनिक जहाजी बेड़े और Oceaneering की डीपवॉटर इंजीनियरिंग विशेषज्ञता को मिलाकर कंपनी जटिल समुद्री प्रोजेक्ट्स में बेहतर तरीके से काम कर सकेगी।
वहीं एस्ट्रो ऑफशोर के CEO Mark Humphreys ने कहा कि ‘एस्ट्रो एटलस’ कंपनी का अब तक का सबसे सक्षम जहाज है। इससे कंपनी की ऑपरेशनल क्षमता काफी बढ़ेगी और वह बड़े ऑफशोर प्रोजेक्ट्स संभाल सकेगी।
क्या होता है सबसी और ऑफशोर काम?
समुद्र के नीचे होने वाले इंजीनियरिंग कामों को सबसी ऑपरेशन कहा जाता है। इसमें समुद्र के अंदर पाइपलाइन बिछाना, बिजली और इंटरनेट केबल डालना, अंडरवॉटर मशीनरी लगाना और रखरखाव जैसे काम शामिल होते हैं।
आज दुनिया में इंटरनेट का बड़ा हिस्सा समुद्र के नीचे बिछी केबलों पर चलता है। इसके अलावा तेल और गैस उद्योग भी बड़े पैमाने पर ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करता है। यही वजह है कि इस सेक्टर को भविष्य का बड़ा बाजार माना जा रहा है।
भारत की कंपनियां अब वैश्विक समुद्री बाजार में
पिछले कुछ सालों में भारतीय कंपनियों ने सिर्फ घरेलू बाजार तक सीमित रहने के बजाय अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों में भी तेजी से विस्तार किया है। अडाणी पोर्ट्स का यह कदम भी उसी दिशा में देखा जा रहा है।
यूरोप में ऑफशोर सेक्टर काफी बड़ा है और वहां नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट्स, समुद्री केबल नेटवर्क और गहरे समुद्र से जुड़े निर्माण कार्य लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में भारतीय कंपनी की एंट्री को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर यह रणनीति सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में भारतीय कंपनियां वैश्विक समुद्री इंजीनियरिंग और डीपवॉटर ऑपरेशंस में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

