SAARC Revival : मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी SAARC की लंबे समय से रुकी बैठकों को दोबारा शुरू कराने में मदद करने की पेशकश की है। 26 जुलाई 2026 को मालदीव के 61वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में मुइज्जू ने कहा कि दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और विकास के लिए सदस्य देशों का फिर बातचीत की मेज पर लौटना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि सदस्य देशों के बीच बातचीत शुरू कराने में कठिनाई आती है तो मालदीव पहल करने और मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। मालदीव के राष्ट्रपति कार्यालय ने भी पुष्टि की कि मुइज्जू ने SAARC में बने गतिरोध को समाप्त करने और मतभेदों को संवाद से सुलझाने की अपील की।
यह पेशकश ऐसे समय आई है, जब SAARC का शिखर सम्मेलन स्तर का तंत्र एक दशक से अधिक समय से निष्क्रिय पड़ा है। अंतिम यानी 18वां SAARC शिखर सम्मेलन 26 और 27 नवंबर 2014 को नेपाल की राजधानी काठमांडू में आयोजित हुआ था। 19वां सम्मेलन 2016 में पाकिस्तान में होना था, लेकिन सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बनने और सीमा पार आतंकवाद से जुड़ी चिंताओं के कारण इसका आयोजन नहीं हो सका। आधिकारिक तारीखों के हिसाब से जुलाई 2026 तक लगभग 12 वर्षों से कोई SAARC शिखर सम्मेलन नहीं हुआ है, जबकि 2016 का प्रस्तावित सम्मेलन रद्द हुए करीब एक दशक हो चुका है।

मुइज्जू बोले– मतभेद छोड़कर बातचीत की मेज पर लौटें देश
राष्ट्रपति मुइज्जू ने अपने संबोधन में SAARC को दक्षिण एशिया का महत्वपूर्ण क्षेत्रीय मंच बताया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग विचार रखने वाले देशों को क्षेत्रीय विकास और शांति को प्राथमिकता देते हुए सहयोग की भावना से आगे बढ़ना चाहिए।

उनका संदेश साफ था कि सदस्य देशों के बीच राजनीतिक या कूटनीतिक मतभेदों के कारण पूरे क्षेत्र का सहयोग तंत्र लंबे समय तक बंद नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि मालदीव हमेशा विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की वकालत करता आया है और अब वह SAARC देशों के बीच संवाद शुरू कराने में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
मुइज्जू ने कहा कि युद्ध और हिंसा किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकते। इसी सोच के आधार पर उन्होंने SAARC देशों को दोबारा वार्ता शुरू करने और क्षेत्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने का आग्रह किया। मालदीव सरकार ने इस प्रस्ताव को अपनी ‘Maldives First’ विदेश नीति से भी जोड़ा है, जिसके तहत वह सभी देशों से पारस्परिक लाभ और राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध रखने की बात करती है।
SAARC क्या है और इसमें कौन-कौन से देश शामिल हैं?
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन की स्थापना 8 दिसंबर 1985 को ढाका में SAARC चार्टर पर हस्ताक्षर के साथ हुई थी। इसका उद्देश्य दक्षिण एशिया के लोगों का कल्याण बढ़ाना, आर्थिक विकास तेज करना, सामाजिक प्रगति को बढ़ावा देना और सदस्य देशों के बीच सामूहिक सहयोग मजबूत करना है।
SAARC में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और अफगानिस्तान शामिल हैं। अफगानिस्तान वर्ष 2007 में संगठन का आठवां सदस्य बना था। इसका सचिवालय जनवरी 1987 में काठमांडू में स्थापित किया गया था।
इस संगठन के सहयोग क्षेत्रों में व्यापार, ऊर्जा, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन, पर्यटन, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन, विज्ञान-तकनीक और लोगों के बीच संपर्क शामिल हैं। दक्षिण एशिया की विशाल आबादी और साझा समस्याओं को देखते हुए SAARC को क्षेत्रीय सहयोग का सबसे व्यापक मंच माना जाता है।

आखिरी सम्मेलन में बनी थी गहरे क्षेत्रीय एकीकरण की योजना
काठमांडू में हुए 18वें SAARC शिखर सम्मेलन का विषय ‘शांति और समृद्धि के लिए गहरा एकीकरण’ था। इसमें सदस्य देशों ने व्यापार, निवेश, ऊर्जा, सुरक्षा, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई थी।

सम्मेलन में SAARC ऊर्जा सहयोग ढांचे पर समझौता भी हुआ था, जिसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच बिजली व्यापार और ऊर्जा नेटवर्क को आगे बढ़ाना था। इसके अलावा दक्षिण एशियाई आर्थिक संघ की दिशा में धीरे-धीरे मुक्त व्यापार क्षेत्र, सीमा शुल्क संघ और साझा बाजार जैसे लक्ष्यों पर काम करने की बात कही गई थी।
लेकिन अगले ही शिखर सम्मेलन से पहले भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव बढ़ गया और संगठन का राजनीतिक स्तर पर काम लगभग ठहर गया।
2016 का इस्लामाबाद सम्मेलन क्यों नहीं हो पाया?
19वां SAARC सम्मेलन नवंबर 2016 में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होना था। उसी वर्ष जम्मू-कश्मीर के उरी में भारतीय सेना के शिविर पर आतंकी हमला हुआ। भारत ने सीमा पार आतंकवाद और क्षेत्र में बने असुरक्षित माहौल का हवाला देते हुए सम्मेलन में शामिल नहीं होने का फैसला किया।
इसके बाद बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान सहित कुछ अन्य देशों ने भी सम्मेलन से दूरी बनाई। SAARC के नियमों के अनुसार महत्वपूर्ण निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। किसी एक सदस्य की असहमति भी शिखर सम्मेलन को रोक सकती है। पर्याप्त सहमति न बनने के कारण पाकिस्तान में प्रस्तावित सम्मेलन स्थगित हो गया और उसके बाद नया शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं किया जा सका।
भारत की आधिकारिक स्थिति लंबे समय से यह रही है कि क्षेत्रीय सहयोग और आतंकवाद एक साथ नहीं चल सकते। नई दिल्ली के मुताबिक SAARC के शिखर सम्मेलन स्तर के संवाद में रुकावट का प्रमुख कारण सदस्य देशों में सहमति की कमी और सीमा पार आतंकवाद से जुड़ी चिंताएं हैं।
मालदीव की मध्यस्थता से क्या तुरंत शुरू हो जाएगा SAARC?
मालदीव की पेशकश महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत जरूर है, लेकिन इससे SAARC बैठकें अपने आप शुरू नहीं हो जाएंगी। संगठन को पुनर्जीवित करने के लिए सभी आठ सदस्य देशों की सहमति आवश्यक होगी। सबसे बड़ी चुनौती भारत और पाकिस्तान के बीच भरोसे की कमी तथा आतंकवाद का मुद्दा है।
मालदीव बैठक के लिए स्थान उपलब्ध करा सकता है, सदस्य देशों के बीच अनौपचारिक संपर्क बढ़ा सकता है और बातचीत का प्रस्ताव रख सकता है। लेकिन भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं या भारत-पाकिस्तान विवादों का समाधान केवल मध्यस्थता की पेशकश से होना कठिन है।
यह भी अभी स्पष्ट नहीं है कि मालदीव कोई विशेष बैठक बुलाना चाहता है, विदेश मंत्रियों की बातचीत शुरू कराना चाहता है या सीधे शिखर सम्मेलन की मेजबानी का प्रस्ताव देगा। मुइज्जू का बयान फिलहाल राजनीतिक और कूटनीतिक इच्छा जताता है; विस्तृत योजना अभी सामने नहीं आई है।
भारत के लिए प्रस्ताव के मायने
मालदीव का यह बयान भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के वर्षों में नई दिल्ली ने SAARC की तुलना में BIMSTEC जैसे संगठनों पर अधिक जोर दिया है। BIMSTEC में पाकिस्तान शामिल नहीं है और यह बंगाल की खाड़ी क्षेत्र के देशों को जोड़ता है।
फिर भी भारत ने SAARC की तकनीकी और मानवीय गतिविधियों से खुद को पूरी तरह अलग नहीं किया है। आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य, शिक्षा और क्षेत्रीय संस्थाओं से जुड़े कई तंत्र अब भी मौजूद हैं। शिखर सम्मेलन बंद होने के बावजूद संगठन के कुछ निचले स्तर के कार्यक्रम चलते रहे हैं।
भारत SAARC की नई बैठक में शामिल होगा या नहीं, इस पर अभी कोई ताजा आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि मुइज्जू की पेशकश के बाद भारत ने भागीदारी के लिए सहमति दे दी है। नई दिल्ली का निर्णय सुरक्षा स्थिति, बैठक के एजेंडे, पाकिस्तान के रुख और सदस्य देशों में बनी सहमति पर निर्भर करेगा।
मुइज्जू की क्षेत्रीय कूटनीति का नया संकेत
मोहम्मद मुइज्जू के राष्ट्रपति बनने के शुरुआती दौर में भारत और मालदीव के संबंधों में तनाव देखा गया था। हालांकि बाद में दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बढ़े और संबंधों को स्थिर करने के प्रयास हुए। वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मालदीव की स्वतंत्रता की 60वीं वर्षगांठ में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया था। इस यात्रा के दौरान विकास, व्यापार, रक्षा, पर्यटन और डिजिटल सहयोग से जुड़े समझौते आगे बढ़ाए गए थे।
ऐसे में SAARC को पुनर्जीवित करने की मुइज्जू की पेशकश को केवल संगठन तक सीमित बयान नहीं माना जा रहा है। यह मालदीव की उस कोशिश का हिस्सा भी हो सकता है, जिसके तहत वह हिंद महासागर और दक्षिण एशिया में छोटे लेकिन सक्रिय कूटनीतिक मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है।
SAARC के लौटने से दक्षिण एशिया को क्या लाभ हो सकता है?
दक्षिण एशियाई देशों के सामने जलवायु परिवर्तन, बाढ़, चक्रवात, प्रदूषण, महामारी, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संकट, गरीबी और बेरोजगारी जैसी कई साझा चुनौतियां हैं। इनमें से ज्यादातर समस्याओं को कोई देश अकेले हल नहीं कर सकता।
SAARC सक्रिय होता है तो सदस्य देश आपदा के समय तेजी से सूचनाएं और संसाधन साझा कर सकते हैं। सीमापार बिजली व्यापार, सड़क और रेल कनेक्टिविटी, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार में भी सहयोग बढ़ सकता है। संगठन के भीतर आपदा प्रबंधन, कृषि, ऊर्जा और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े संस्थागत ढांचे पहले से मौजूद हैं।
लेकिन इसके लाभ तभी मिलेंगे, जब राजनीतिक विवादों को संगठन के पूरे कामकाज पर हावी होने से रोका जाए और सदस्य देश पहले से किए गए समझौतों को लागू करने के लिए तैयार हों।
पुनर्जीवन की राह में सबसे बड़ी बाधा
SAARC की मूल कमजोरी इसकी सर्वसम्मति आधारित निर्णय प्रक्रिया है। भारत और पाकिस्तान के बीच कोई बड़ा विवाद होने पर पूरा संगठन प्रभावित हो जाता है। इसके अलावा संगठन के पास यूरोपीय संघ जैसी मजबूत कार्यकारी शक्ति, साझा बाजार या बाध्यकारी फैसले लागू कराने की क्षमता नहीं है।
अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिति भी एक अतिरिक्त चुनौती है। सदस्य देशों में तालिबान सरकार को लेकर एक समान राजनयिक रुख नहीं है। इसलिए किसी पूर्ण शिखर सम्मेलन में अफगान प्रतिनिधित्व का सवाल भी उठ सकता है।
इसी कारण मालदीव की मध्यस्थता का पहला व्यावहारिक कदम पूर्ण शिखर सम्मेलन के बजाय विदेश सचिवों, विदेश मंत्रियों या तकनीकी विशेषज्ञों की सीमित बैठक से शुरू हो सकता है। आपदा प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे कम विवादित विषय बातचीत बहाल करने का आधार बन सकते हैं।
FAQ
- मालदीव ने SAARC को पुनर्जीवित करने की बात क्यों कही है?
मालदीव का कहना है कि दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और क्षेत्रीय विकास के लिए सदस्य देशों के बीच नियमित संवाद जरूरी है। राष्ट्रपति मुइज्जू ने मतभेद दूर कराने में मध्यस्थता की पेशकश की है। - राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने क्या बयान दिया?
उन्होंने SAARC देशों से बातचीत की मेज पर लौटने, क्षेत्रीय शांति को प्राथमिकता देने और सहयोग की भावना से काम करने की अपील की। जरूरत पड़ने पर मालदीव ने मध्यस्थ बनने की इच्छा जताई है। - SAARC क्या है?
SAARC दक्षिण एशिया के आठ देशों का क्षेत्रीय संगठन है, जिसकी स्थापना 8 दिसंबर 1985 को हुई थी। इसका उद्देश्य आर्थिक, सामाजिक और क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है। - SAARC लंबे समय से निष्क्रिय क्यों है?
भारत-पाकिस्तान तनाव, सीमा पार आतंकवाद, सदस्य देशों में सहमति की कमी और सर्वसम्मति से निर्णय लेने की व्यवस्था इसके प्रमुख कारण हैं। वर्ष 2014 के बाद कोई शिखर सम्मेलन नहीं हुआ है। - क्या भारत SAARC की बैठक में शामिल होगा?
भारत ने अभी मुइज्जू की पेशकश पर भागीदारी की कोई ताजा आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। भारत का निर्णय सुरक्षा परिस्थितियों, आतंकवाद और बैठक के एजेंडे पर निर्भर करेगा। - SAARC के पुनर्जीवन से दक्षिण एशिया को क्या लाभ होगा?
इससे व्यापार, ऊर्जा, कनेक्टिविटी, आपदा प्रबंधन, जलवायु कार्रवाई, स्वास्थ्य, पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ सकता है। साझा संकटों के समय सदस्य देश तेजी से समन्वय भी कर सकेंगे।

