मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब सीधे भारत के एविएशन सेक्टर पर दिखने लगा है। देश की प्रमुख एयरलाइन कंपनियां – Air India, IndiGo और SpiceJet – गंभीर वित्तीय दबाव में हैं। इन कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन Federation of Indian Airlines (FIA) ने सरकार को चेतावनी दी है कि अगर जल्द राहत नहीं मिली, तो उन्हें अपने ऑपरेशंस कम करने या बंद करने जैसे कठिन फैसले लेने पड़ सकते हैं।
इस पूरे संकट की जड़ है एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में तेज बढ़ोतरी, जो हाल के भू-राजनीतिक हालात के कारण आसमान छू रही है।
कैसे शुरू हुआ संकट?
दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष और पश्चिम एशिया में अस्थिरता के कारण वैश्विक तेल बाजार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) जैसे अहम समुद्री रास्तों पर असर पड़ने से तेल की सप्लाई में बाधा आई है।
28 फरवरी के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में करीब 45.5% की तेजी आई है। इसका सीधा असर विमानन ईंधन यानी ATF पर पड़ा, जो एयरलाइंस के लिए सबसे बड़ा खर्च होता है।
एयरलाइंस की लागत क्यों बढ़ी?
FIA के अनुसार, ATF की कीमतें बढ़ने से एयरलाइंस की ऑपरेशन लागत में लगभग 20% तक इजाफा हुआ है। पहले जहां फ्यूल का हिस्सा कुल खर्च का 30-40% होता था, अब यह बढ़कर 55-60% तक पहुंच गया है।
इसका मतलब साफ है – एयरलाइंस के लिए मुनाफा कमाना तो दूर, अपने खर्च निकालना भी मुश्किल होता जा रहा है।
घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में बड़ा फर्क
सरकार ने घरेलू उड़ानों के लिए ATF की कीमतों में बढ़ोतरी को सीमित करने की कोशिश की है। अप्रैल में घरेलू ATF की कीमतों में बढ़ोतरी को ₹15 प्रति लीटर तक ही रखा गया, जिससे कुल बढ़ोतरी लगभग 9.2% रही।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए ऐसा कोई नियंत्रण नहीं था। वहां ATF की कीमतों में ₹73 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी देखी गई। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय ऑपरेशंस एयरलाइंस के लिए और ज्यादा महंगे हो गए हैं।
FIA का कहना है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में इतना अंतर एयरलाइंस के नेटवर्क को अस्थिर कर रहा है।
‘क्रैक बैंड’ मैकेनिज्म की मांग क्यों?
एयरलाइंस ने सरकार से 2022 में लागू किए गए ‘क्रैक बैंड प्राइसिंग मैकेनिज्म’ को फिर से लागू करने की मांग की है। यह एक ऐसा सिस्टम था जिसमें कच्चे तेल और ATF के बीच के अंतर (क्रैक स्प्रेड) के आधार पर कीमत तय की जाती थी।
इस मैकेनिज्म के तहत $12–22 प्रति बैरल का दायरा तय किया गया था, जिससे तेल कंपनियों को भी उचित मुनाफा मिलता था और एयरलाइंस पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ता था।
अब एयरलाइंस का कहना है कि इस सिस्टम को दोबारा लागू करने से कीमतों में संतुलन आ सकता है।

सरकार से क्या मांगें रखी गई हैं?
FIA ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय के सामने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं:
- ATF पर लगने वाली 11% एक्साइज ड्यूटी को अस्थायी रूप से हटाया जाए
- राज्यों में लगने वाले वैट (VAT) को कम किया जाए
- ‘क्रैक बैंड’ प्राइसिंग सिस्टम को फिर से लागू किया जाए
एयरलाइंस का कहना है कि इन कदमों के बिना इस संकट से निकलना मुश्किल होगा।
अगर राहत नहीं मिली तो क्या होगा?
FIA ने साफ तौर पर कहा है कि अगर सरकार ने जल्द कदम नहीं उठाए, तो एयरलाइंस को अपनी क्षमता घटानी पड़ेगी। इसका मतलब होगा:
- कम फ्लाइट्स
- कम कनेक्टिविटी
- टिकट की कीमतों में बढ़ोतरी
- यात्रियों को असुविधा
इतना ही नहीं, कुछ एयरलाइंस को अपने विमानों को खड़ा करना पड़ सकता है, यानी वे उड़ानें बंद कर सकती हैं।
सरकार क्या कर रही है?
हालात को देखते हुए सरकार ने कुछ राहत उपाय शुरू किए हैं। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने अप्रैल 2026 से तीन महीने के लिए:
- लैंडिंग और पार्किंग शुल्क में 25% की कटौती की है
इसके अलावा, सरकार 5,000 करोड़ रुपए के एक इमरजेंसी क्रेडिट स्कीम पर भी विचार कर रही है, जिससे एयरलाइंस को नकदी की समस्या से राहत मिल सके।
वैश्विक बाजार में क्या स्थिति है?
वैश्विक स्तर पर ATF की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है। पहले जहां कीमत करीब 87.24 डॉलर प्रति बैरल थी, अब यह बढ़कर 235 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा हो गई है।
रेटिंग एजेंसी ICRA ने भी चेतावनी दी है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो ATF और महंगा हो सकता है।
एयरस्पेस बंद होने का भी असर
मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव के कारण कई बार एयरस्पेस बंद हो जाते हैं। इससे एयरलाइंस को लंबा रास्ता लेना पड़ता है, जिससे:
- ज्यादा ईंधन खर्च होता है
- उड़ानों में देरी होती है
- लागत और बढ़ जाती है
इससे पहले से ही संकट में फंसी एयरलाइंस पर और दबाव बढ़ जाता है।
क्या यह संकट नया है?
कोविड-19 के दौरान भी एयरलाइंस को भारी नुकसान हुआ था। उस समय भी सरकार ने कुछ राहत दी थी। लेकिन अब फिर से संकट गहराता दिख रहा है।
फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार वजह महामारी नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीतिक तनाव और ऊर्जा संकट है।
यात्रियों पर क्या असर पड़ेगा?
अगर यह स्थिति जारी रहती है, तो इसका असर सीधे आम लोगों पर पड़ेगा:
- हवाई टिकट महंगे हो सकते हैं
- फ्लाइट्स की संख्या कम हो सकती है
- छोटे शहरों की कनेक्टिविटी प्रभावित हो सकती है
यानी जो लोग रोजमर्रा के काम या बिजनेस के लिए हवाई यात्रा करते हैं, उन्हें ज्यादा परेशानी उठानी पड़ सकती है।
आगे का रास्ता क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से निकलने के लिए सरकार और एयरलाइंस दोनों को मिलकर काम करना होगा। कुछ संभावित कदम हो सकते हैं:
- टैक्स में राहत
- फ्यूल प्राइसिंग में पारदर्शिता
- वैकल्पिक ईंधन पर काम
- लागत कम करने के उपाय
निष्कर्ष:
भारत का एविएशन सेक्टर इस समय एक कठिन दौर से गुजर रहा है। महंगे ईंधन, वैश्विक तनाव और ऑपरेशनल चुनौतियों ने एयरलाइंस की हालत कमजोर कर दी है।
हालांकि, सरकार के कुछ कदम राहत दे सकते हैं, लेकिन लंबी अवधि के समाधान के लिए ठोस नीति की जरूरत होगी।

