दुनिया में जब भी बिजनेस, स्टार्टअप और पूंजीवाद की बात होती है, तो अक्सर लोगों के दिमाग में Bill Gates, Elon Musk, Jeff Bezos या Mark Zuckerberg जैसे नाम आते हैं। आधुनिक व्यापार मॉडल की चर्चा आमतौर पर अमेरिका के सिलिकॉन वैली, वॉल स्ट्रीट या यूरोप के औद्योगिक दौर से जोड़कर की जाती है। लेकिन अब एक नई रिसर्च ने इस सोच को चुनौती दी है।
University of Glasgow से सामने आए एक रिसर्च पेपर ने यह सवाल उठाया है कि क्या भारत में व्यापार और उद्यमिता की सोच पश्चिमी पूंजीवाद से बहुत पहले से मौजूद थी? रिसर्च का दावा है कि भारत में धन कमाने की अवधारणा सिर्फ लाभ तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसे समाज, नैतिकता और जिम्मेदारी से भी जोड़ा गया था।

हिंदू उद्यमिता पर हुई खास रिसर्च
यह रिसर्च भारतीय मूल के प्रोफेसर Sreevas Sahasranamam ने की है। अध्ययन का शीर्षक है – “Understanding Hindu Religious Entrepreneurship: A Translation Perspective।”
पहली नजर में यह विषय धर्म से जुड़ा लग सकता है, लेकिन रिसर्च का केंद्र वास्तव में उद्यमिता यानी एंटरप्रेन्योरशिप है।
अध्ययन में 15 हिंदू उद्यमियों से बातचीत की गई। इनमें से कई लोगों ने कहा कि उनके लिए बिजनेस केवल पैसा कमाने का जरिया नहीं है। वे इसे समाज, संस्कृति, जिम्मेदारी और नैतिक मूल्यों से जोड़कर देखते हैं।
रिसर्च के मुताबिक भारत में “अर्थ” यानी आर्थिक समृद्धि को जीवन के चार पुरुषार्थों में शामिल किया गया था। धर्म, काम और मोक्ष के साथ अर्थ को भी जीवन का जरूरी हिस्सा माना गया। यानी धन कमाना गलत नहीं था, लेकिन उसे जिम्मेदारी और संतुलन के साथ जोड़ा गया।
पश्चिमी पूंजीवाद और भारतीय सोच में फर्क
रिसर्च में बताया गया कि आधुनिक पूंजीवाद पर अक्सर यह आरोप लगता है कि वह केवल मुनाफे और संसाधनों के अत्यधिक इस्तेमाल को बढ़ावा देता है।इसके विपरीत भारतीय सोच में व्यापार को संतुलन के साथ देखा गया। यहां लाभ के साथ कर्तव्य, प्रकृति, समाज और नैतिकता को भी महत्व दिया गया।
कई उद्यमियों ने कहा कि वे अपने काम को “धर्म” यानी नैतिक जिम्मेदारी मानते हैं। उनके लिए व्यापार केवल निजी सफलता नहीं बल्कि समाज में योगदान का जरिया भी है।
भारत में व्यापार की परंपरा नई नहीं
अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि भारत ने दुनिया को केवल दर्शन और आध्यात्मिक विचार दिए, जबकि व्यापार और उद्योग की सोच पश्चिम से आई। लेकिन इतिहास एक अलग तस्वीर दिखाता है।
करीब दो हजार साल पहले भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग 33 प्रतिशत हिस्सा माना जाता था। भारतीय मसाले, कपड़े और अन्य वस्तुएं दुनिया के कई हिस्सों में भेजी जाती थीं।

दक्षिण भारत के व्यापारी समुद्री व्यापार मार्गों से दूसरे देशों तक पहुंचते थे। चीन से लेकर पश्चिमी देशों तक भारतीय उत्पादों की मांग थी।
रिसर्च में यह भी बताया गया कि भारत में गांवों के स्तर तक उद्यमिता मौजूद थी। कुम्हार, लोहार, बुनकर, पशुपालक और जंगलों में रहने वाले समुदाय भी अपने-अपने तरीके से आर्थिक गतिविधियों से जुड़े थे।
यानी स्टार्टअप और बिजनेस मॉडल जैसे शब्द आने से बहुत पहले भारत में व्यापारिक व्यवस्था समाज का हिस्सा थी।
व्यापार और नैतिकता साथ-साथ चलते थे
रिसर्च के मुताबिक भारत की पुरानी आर्थिक व्यवस्था में व्यापार और नैतिकता को अलग नहीं माना जाता था।
मंदिर अर्थव्यवस्था, स्थानीय व्यापार नेटवर्क और सामाजिक ढांचे में आर्थिक गतिविधियों को जिम्मेदारी के साथ जोड़ा गया था। यानी व्यापार का उद्देश्य केवल लाभ नहीं बल्कि सामाजिक संतुलन भी था।
भामाशाह का उदाहरण क्यों अहम है?
रिसर्च में 16वीं सदी के एक प्रसिद्ध उदाहरण का भी जिक्र किया गया है। भामाशाह ने महाराणा प्रताप के संघर्ष के दौरान अपनी पूरी संपत्ति सहायता के रूप में दे दी थी।
इस घटना को अक्सर इस रूप में देखा जाता है कि भारतीय सोच में धन को केवल निजी संपत्ति नहीं बल्कि समाज और कर्तव्य से जुड़ी जिम्मेदारी माना जाता था।
हिंदू उद्यमिता पर रिसर्च इतनी कम क्यों?
रिसर्च पेपर में एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई कि दुनिया भर में ईसाई धर्म और पूंजीवाद, इस्लामिक फाइनेंस और व्यापार पर काफी अध्ययन हुए हैं। लेकिन करीब 1.2 अरब अनुयायियों वाले हिंदू धर्म और उद्यमिता के संबंध पर बहुत कम रिसर्च हुई। पेपर के मुताबिक इस विषय पर स्पष्ट रूप से केंद्रित केवल दो अध्ययन पहले मौजूद थे।
ब्रिटिश शासन ने बदली सोच?
अध्ययन में यह भी कहा गया कि ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज की सोच को काफी प्रभावित किया। औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था के बाद आधुनिकता को पश्चिमी और धर्मनिरपेक्ष ढांचे से जोड़ दिया गया। धीरे-धीरे लोगों के मन में यह धारणा बनी कि धर्म और पेशेवर जीवन अलग-अलग चीजें हैं।
प्रोफेसर साहस्रनामम के मुताबिक भारत जैसे देशों में “पवित्र” और “पेशेवर” जीवन के बीच की दूरी औपनिवेशिक दौर में ज्यादा बढ़ी। उन्होंने इसे “फ्रैक्चर्ड माइंड” यानी बंटी हुई सोच बताया।
AI और हिंदू सोच से शुरू हुई नई चर्चा
रिसर्च की शुरुआत भी एक दिलचस्प तरीके से हुई। 2023 के आसपास स्कॉटलैंड में AI और धर्म पर चर्चा हो रही थी। इसी दौरान प्रोफेसर साहस्रनामम से पूछा गया कि अगले 50 या 100 वर्षों में AI का हिंदू धर्म पर क्या असर हो सकता है।
उन्होंने इस विषय पर एक ब्लॉग लिखा। इसके बाद कई स्टार्टअप फाउंडर्स उनसे संपर्क करने लगे। कुछ लोग संस्कृत ग्रंथों पर आधारित AI मॉडल बना रहे थे। कुछ वर्चुअल रियलिटी के जरिए मंदिर अनुभव तैयार कर रहे थे। वहीं कुछ लोग प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की कोशिश कर रहे थे।
जब मुश्किल आई तो गीता की तरफ लौटे उद्यमी
रिसर्च में एक और दिलचस्प बात सामने आई। कई उद्यमियों ने बताया कि जब उनका व्यवसाय अच्छा चल रहा था, तब वे मोटिवेशनल स्पीकर्स, TED Talks और सेल्फ-हेल्प किताबों से प्रेरणा लेते थे।
लेकिन जब जीवन में कठिन दौर आया, तब उन्हें इन चीजों से ज्यादा मदद नहीं मिली। ऐसे समय में कई लोग Bhagavad Gita की ओर लौटे। एक उद्यमी ने कहा कि सेल्फ-हेल्प किताबों से कुछ समय के लिए प्रेरणा मिली, लेकिन असली मानसिक संतुलन उन्हें गीता से मिला।
मुनाफे से पहले ‘धर्म’ को महत्व
रिसर्च में यह भी सामने आया कि कई उद्यमियों ने शुरुआत में मुनाफे को सबसे ऊपर नहीं रखा। वे अपने काम को “धर्म” यानी जिम्मेदारी मानते थे।
एक कंपनी, जो वर्चुअल रियलिटी प्रोडक्ट बना रही थी, उसने यूजर्स के लिए अनिवार्य ब्रेक का फीचर जोड़ा ताकि लोग लगातार स्क्रीन पर न रहें। जहां ज्यादातर टेक कंपनियां ज्यादा स्क्रीन टाइम से कमाई बढ़ाना चाहती हैं, वहीं इस कंपनी ने सीमित उपयोग को बढ़ावा दिया।
टाटा और महिंद्रा जैसे उदाहरण
भारत के बड़े कारोबारी घरानों का जिक्र भी इस चर्चा में आता है। Tata Group को अक्सर समाज सेवा, संस्थान निर्माण और जिम्मेदार व्यापार मॉडल के उदाहरण के रूप में देखा जाता है।
इसी तरह Mahindra Group ने भी कई बार लाभ के साथ सामाजिक उद्देश्य की बात की है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मॉडल भारतीय सोच में मौजूद “धर्म” और जिम्मेदारी की अवधारणा से जुड़े दिखाई देते हैं।
क्या महाभारत और अर्थशास्त्र आज के स्टार्टअप्स को प्रभावित कर सकते हैं?
रिसर्च में बताया गया कि कुछ स्टार्टअप महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों पर आधारित कॉमिक्स और गेम्स बना रहे हैं। कुछ कंपनियां Arthashastra को मैनेजमेंट ट्रेनिंग में इस्तेमाल कर रही हैं।
वहीं कुछ लोग संस्कृत और न्यायशास्त्र की अवधारणाओं को बातचीत और नेतृत्व कौशल से जोड़ रहे हैं।
क्या भारत नई आर्थिक सोच की ओर लौट रहा है?
भारत का मौजूदा स्टार्टअप इकोसिस्टम आज यूनिकॉर्न, फंडिंग और वैल्यूएशन की भाषा बोलता है।
लेकिन इसके साथ एक दूसरी चर्चा भी धीरे-धीरे उभर रही है – क्या बिजनेस केवल मुनाफे के लिए होना चाहिए या समाज और जिम्मेदारी के साथ भी जुड़ा होना चाहिए? यह रिसर्च इसी सवाल को सामने लाती है।
सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी
रिसर्च किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती, लेकिन यह जरूर कहती है कि भारतीय सोच में “अर्थ” यानी आर्थिक समृद्धि हमेशा से मौजूद रही है। भारत ने केवल आध्यात्मिक विचार ही नहीं दिए, बल्कि ऐसा ढांचा भी विकसित किया जहां कर्म, धर्म और अर्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
अब सवाल यह है कि क्या आधुनिक स्टार्टअप संस्कृति इन पुराने विचारों से कुछ सीख सकती है, या फिर व्यापार पूरी तरह सिर्फ मुनाफे की दिशा में ही आगे बढ़ेगा।

