सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को दी मंजूरी: वोटर लिस्ट जांच पर लगी मुहर, विपक्ष ने उठाए सवाल

देश में चुनावी राजनीति के बीच वोटर लिस्ट की जांच को लेकर चल रही बड़ी कानूनी लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने बुधवार को चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों में कराई गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को वैध और संवैधानिक करार दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की विशेष जांच और संशोधन करने का अधिकार है और यह प्रक्रिया मनमानी नहीं कही जा सकती।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह निर्देश भी दिया कि जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनकी जानकारी चार हफ्तों के भीतर केंद्र सरकार को भेजी जाए। इस फैसले के बाद जहां चुनाव आयोग ने इसे चुनावी व्यवस्था की मजबूती की दिशा में बड़ा कदम बताया, वहीं विपक्षी दलों ने प्रक्रिया के समय और तरीके पर सवाल उठाए हैं।

 

क्या है SIR प्रक्रिया?

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR चुनाव आयोग द्वारा चलाया जाने वाला एक विशेष अभियान है, जिसका उद्देश्य वोटर लिस्ट को सही और अपडेट रखना होता है। इस प्रक्रिया के तहत बूथ लेवल अधिकारी यानी BLO घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करते हैं।

इस दौरान नए योग्य मतदाताओं के नाम जोड़े जाते हैं, जबकि मृत लोगों, स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर जा चुके लोगों, डुप्लीकेट नामों और गैर-योग्य व्यक्तियों के नाम हटाए जाते हैं। साथ ही नाम, पता और दूसरी जानकारियों में गलती होने पर उन्हें भी ठीक किया जाता है।

चुनाव आयोग का कहना है कि इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी योग्य नागरिक वोट देने के अधिकार से वंचित न रहे और कोई गैर-योग्य व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल न हो।

 

बिहार से शुरू हुई थी प्रक्रिया

SIR की शुरुआत जून 2025 में बिहार से की गई थी। उस समय राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। बाद में यह प्रक्रिया पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में भी लागू की गई। वहीं असम में स्पेशल रिवीजन (SR) प्रक्रिया चलाई गई।

बिहार में यह अभ्यास 2003 के बाद पहली बार इतने बड़े स्तर पर किया गया था। चुनाव आयोग के मुताबिक पहले चरण में लगभग 99.8 प्रतिशत कवरेज हासिल किया गया और करोड़ों मतदाताओं से फॉर्म जमा कराए गए।

 

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

SIR प्रक्रिया शुरू होते ही कई विपक्षी दलों, सामाजिक संगठनों और एक्टिविस्ट समूहों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि चुनाव आयोग मतदाताओं पर नागरिकता साबित करने का बोझ डाल रहा है।

सबसे ज्यादा विवाद उस नियम को लेकर हुआ जिसमें कहा गया था कि जिन लोगों के नाम 2002 या 2003 की पुरानी वोटर लिस्ट में नहीं हैं, उन्हें अपने परिवार या पूर्वजों का लिंक पुराने रिकॉर्ड से साबित करना होगा।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि गरीब, प्रवासी मजदूर, ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले लोग ऐसे पुराने दस्तावेज आसानी से नहीं जुटा पाएंगे। इससे कई असली मतदाता वोट देने के अधिकार से बाहर हो सकते हैं।

Supreme Court approves SIR process

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की जांच करने का अधिकार है। मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि वोटर सूची में नाम होना नागरिकता का एक प्रारंभिक संकेत जरूर है, लेकिन उसकी जांच नहीं की जा सकती ऐसा नहीं कहा जा सकता।

अदालत ने साफ किया कि दस्तावेज मांगना नागरिकता खत्म करना नहीं है, बल्कि रिकॉर्ड की पुष्टि करने की प्रक्रिया का हिस्सा है। कोर्ट ने कहा कि नागरिकता की जो धारणा होती है वह “रिबटेबल” यानी जांच के दायरे में लाई जा सकती है।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग अंतिम रूप से किसी व्यक्ति की नागरिकता तय नहीं कर सकता। अगर किसी मामले में संदेह हो तो उसे केंद्र सरकार के पास भेजना होगा।

 

कानून का उल्लंघन नहीं: सुप्रीम कोर्ट

याचिकाओं में दावा किया गया था कि SIR प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के खिलाफ है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया कानून के दायरे में है और चुनावी व्यवस्था की शुद्धता बनाए रखने के लिए जरूरी भी है। अदालत ने माना कि आयोग को समय-समय पर विशेष संशोधन और सत्यापन करने का अधिकार है।

 

आधार को भी किया गया शामिल

शुरुआत में बिहार की SIR प्रक्रिया में केवल 11 दस्तावेज स्वीकार किए जा रहे थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर आधार कार्ड को भी 12वें दस्तावेज के रूप में शामिल किया गया।

अदालत ने कहा कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है, लेकिन पहचान के दस्तावेज के रूप में इसे इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके बाद चुनाव आयोग ने आधार को भी स्वीकार कर लिया।

 

चुनाव आयोग का पक्ष

चुनाव आयोग ने अदालत में कहा कि SIR कोई नागरिकता जांच अभियान नहीं है। यह केवल वोटर लिस्ट को सही बनाने की प्रक्रिया है। आयोग ने कहा कि संविधान नागरिक आधारित मतदान व्यवस्था की बात करता है, इसलिए गैर-नागरिकों के नाम हटाना उसकी जिम्मेदारी है।

आयोग ने यह भी कहा कि SIR की तुलना NRC से करना गलत है। आयोग के मुताबिक यह एक “सॉफ्ट टच” प्रक्रिया है, जिसमें लोगों को परेशान किए बिना रिकॉर्ड की पुष्टि की जाती है।

चुनाव आयोग ने राजनीतिक पक्षपात के आरोपों को भी खारिज किया और कहा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह प्रशासनिक और कानूनी आधार पर की गई है।

 

बिहार में क्या बदलाव हुए?

बिहार में SIR प्रक्रिया के बाद मतदाताओं की संख्या में बड़ा बदलाव देखने को मिला। जून 2025 में राज्य में करीब 7.89 करोड़ मतदाता थे। बाद में जारी अंतिम सूची में यह संख्या घटकर लगभग 7.42 करोड़ रह गई।

करीब 69 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए, जबकि 21 लाख से ज्यादा नए मतदाता जोड़े गए।

चुनाव आयोग के अनुसार जांच में लाखों डुप्लीकेट नाम, मृत मतदाता और दूसरे स्थान पर जा चुके लोगों की पहचान हुई। कुछ जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी, जबकि कई जगहों पर बड़ी संख्या में नाम हटे।

 

विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध?

सुप्रीम कोर्ट से फैसला आने के बाद भी विपक्षी दल संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर 2003 के बाद कई चुनाव इन्हीं वोटर लिस्ट के आधार पर हुए, तो अब अचानक इतनी बड़ी जांच की जरूरत क्यों पड़ी?

विपक्ष का आरोप है कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस प्रक्रिया को लागू करना राजनीतिक रूप से संदिग्ध लगता है। उनका कहना है कि इससे कई गरीब और प्रवासी मतदाता प्रभावित हो सकते हैं।

कांग्रेस नेता Pramod Tiwari ने फैसले के बाद कहा कि अदालत ने प्रक्रिया को पूरी तरह बिना शर्त मंजूरी नहीं दी है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा को लेकर कई बातें स्पष्ट की हैं। उन्होंने इसे विपक्ष की “नैतिक जीत” बताया।

 

कानूनी और राजनीतिक असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आने वाले समय में चुनावी राजनीति पर बड़ा असर डाल सकता है। एक तरफ चुनाव आयोग अब दूसरे राज्यों में भी इस तरह की प्रक्रिया को तेजी से लागू कर सकता है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश करेगा।

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वोटर लिस्ट की शुद्धता जरूरी है, लेकिन प्रक्रिया इतनी आसान और पारदर्शी होनी चाहिए कि किसी भी असली मतदाता को परेशानी न हो।

 

आगे क्या होगा?

अब चुनाव आयोग को उन लोगों की जानकारी केंद्र सरकार को भेजनी होगी जिनके नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर हटाए गए हैं। इसके बाद संबंधित मामलों में आगे की कानूनी प्रक्रिया चलेगी।

इस बीच विपक्षी दलों ने संकेत दिए हैं कि वे इस मुद्दे को राजनीतिक स्तर पर उठाते रहेंगे। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए सही और साफ वोटर लिस्ट बेहद जरूरी है।

यानी SIR पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगने के बाद कानूनी लड़ाई भले खत्म होती दिख रही हो, लेकिन राजनीतिक बहस अभी लंबे समय तक जारी रहने वाली है।