अंतरिक्ष में बढ़ते कचरे यानी स्पेस डेब्रिस को लेकर भारत अब गंभीरता से कदम उठा रहा है। हाल ही में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, मार्च 2026 तक भारत के करीब 129 ऐसे टुकड़े अंतरिक्ष में मौजूद हैं, जिन्हें ट्रैक किया जा सकता है। ये सभी भारत के सैटेलाइट मिशनों और रॉकेट लॉन्च से जुड़े मलबे के हिस्से हैं।
केंद्रीय मंत्री Dr Jitendra Singh ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया कि सरकार इस समस्या को समझते हुए लगातार निगरानी और समाधान पर काम कर रही है, ताकि भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों को सुरक्षित रखा जा सके।
भारत के स्पेस डेब्रिस की स्थिति
भारत के 129 ट्रैक किए जा सकने वाले मलबे में कई तरह की चीजें शामिल हैं। इनमें 23 बंद हो चुके सैटेलाइट लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में हैं, जबकि 26 सैटेलाइट जियोस्टेशनरी ऑर्बिट (GEO) में मौजूद हैं।
इसके अलावा, रॉकेट लॉन्च से जुड़े हिस्से भी इस मलबे का हिस्सा हैं।
- PSLV रॉकेट से 40 टुकड़े
- GSLV से 4 टुकड़े
- LVM3 से 3 टुकड़े
सबसे ज्यादा 33 टुकड़े PSLV-C3 रॉकेट के एक हिस्से के टूटने से बने थे।

वैश्विक स्तर पर कितनी बड़ी है समस्या?
अगर दुनिया की बात करें तो स्थिति और भी गंभीर है। अंतरिक्ष में 35,000 से ज्यादा ऐसे मलबे के टुकड़े हैं जिन्हें ट्रैक किया जा सकता है। इसके अलावा लाखों छोटे-छोटे कण भी मौजूद हैं।
ये छोटे टुकड़े भी बहुत खतरनाक होते हैं, क्योंकि वे लगभग 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलते हैं। इतनी तेज गति पर कोई भी छोटा कण सैटेलाइट या अंतरिक्ष यान को नुकसान पहुंचा सकता है।
इसरो क्या कर रहा है?
भारत की अंतरिक्ष एजेंसी ISRO इस चुनौती से निपटने के लिए कई कदम उठा रही है।
सबसे अहम पहल 2024 में शुरू की गई Debris Free Space Mission (DFSM) है। इसका लक्ष्य है कि 2030 तक भारत के किसी भी सरकारी या निजी मिशन से नया मलबा न बने।
इसके लिए मिशनों की डिजाइन में ही बदलाव किए जा रहे हैं, जैसे-
- सैटेलाइट में अतिरिक्त ईंधन रखना ताकि मिशन खत्म होने के बाद उसे सुरक्षित तरीके से पृथ्वी के वातावरण में वापस लाया जा सके
- पुराने सैटेलाइट को नियंत्रित तरीके से खत्म करना
नई तकनीक पर काम
इसरो अब ऐसी तकनीकों पर भी काम कर रहा है, जिससे भविष्य में अंतरिक्ष के मलबे को हटाया जा सके। इसमें रोबोटिक आर्म, डोकिंग सिस्टम और पास जाकर ऑपरेशन करने की क्षमता शामिल है।
2025 में SpaDeX मिशन के जरिए भारत ने ऑटोमेटिक डोकिंग और अलग होने की तकनीक का सफल परीक्षण किया। इस मिशन में रोबोटिक आर्म और मैनिपुलेटर का भी इस्तेमाल किया गया, जो आगे चलकर मलबा हटाने में काम आ सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग
स्पेस डेब्रिस एक वैश्विक समस्या है, इसलिए भारत अन्य देशों के साथ मिलकर भी काम कर रहा है। इसरो, NASA, European Space Agency और JAXA जैसी एजेंसियों के साथ मिलकर रिसर्च और ट्रेनिंग कर रहा है।
भारत अपनी नीतियों को अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों के अनुसार भी बना रहा है, जो Inter-Agency Space Debris Coordination Committee और United Nations Committee on the Peaceful Uses of Outer Space द्वारा तय किए गए हैं।
NETRA प्रोजेक्ट क्या है?
स्पेस डेब्रिस की निगरानी के लिए भारत ने NETRA प्रोजेक्ट भी शुरू किया है। इस प्रोजेक्ट के तहत एक कंट्रोल सेंटर बनाया गया है, जो अंतरिक्ष में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखता है।
यह सेंटर-
- सैटेलाइट टकराव से बचाव के लिए अलर्ट देता है
- अंतरिक्ष से गिरने वाले मलबे को ट्रैक करता है
- रडार डेटा के जरिए निगरानी करता है
इस प्रोजेक्ट के लिए 509 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है।
IS4OM की भूमिका
2022 से एक खास केंद्र IS4OM (Indian Space Situational Awareness and Management Centre) भी काम कर रहा है। इसका काम अंतरिक्ष में दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करना और मलबे को कम करना है।
यह केंद्र स्टार्टअप्स को भी मदद करता है, ताकि वे नई तकनीक विकसित कर सकें और स्पेस सेक्टर को और मजबूत बनाया जा सके।
क्या भारत की स्थिति बेहतर है?
अभी के लिए भारत का स्पेस डेब्रिस वैश्विक स्तर के मुकाबले काफी कम है। लेकिन जैसे-जैसे भारत के स्पेस मिशन बढ़ रहे हैं, यह चुनौती भी बढ़ सकती है।
इसी वजह से अब भारत सिर्फ नए मिशन लॉन्च करने पर ही नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित और टिकाऊ बनाने पर भी ध्यान दे रहा है।
निष्कर्ष:
अंतरिक्ष अब सिर्फ खोज और तकनीक का क्षेत्र नहीं रहा, बल्कि वहां भी “सफाई” और जिम्मेदारी जरूरी हो गई है। भारत ने समय रहते इस दिशा में कदम उठाए हैं, जो आने वाले समय में बेहद अहम साबित हो सकते हैं।
स्पेस डेब्रिस को नियंत्रित करना सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए जरूरी है, क्योंकि एक छोटी सी गलती बड़े नुकसान का कारण बन सकती है।

