अमेरिका की राजनीति और खुफिया तंत्र में उस समय हलचल मच गई जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन की सबसे चर्चित अधिकारियों में शामिल तुलसी गबार्ड ने अपने पद से इस्तीफा देने का फैसला किया। तुलसी गबार्ड अमेरिका की सबसे बड़ी खुफिया संस्था “ऑफिस ऑफ डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस” यानी ODNI की प्रमुख थीं। उनके अधीन अमेरिका की 18 बड़ी खुफिया एजेंसियां काम करती थीं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, गबार्ड ने यह फैसला अपने परिवार को प्राथमिकता देने के लिए लिया है। बताया जा रहा है कि उनके पति अब्राहम विलियम्स एक दुर्लभ हड्डी के कैंसर से जूझ रहे हैं और इस कठिन समय में तुलसी उनके साथ रहना चाहती हैं। इसी वजह से उन्होंने अपने बेहद अहम सरकारी पद से हटने का निर्णय लिया।
ओवल ऑफिस में ट्रम्प को दी इस्तीफे की जानकारी
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तुलसी गबार्ड ने शुक्रवार को व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मुलाकात की। इसी दौरान उन्होंने अपने इस्तीफे की जानकारी राष्ट्रपति को दी।
बताया जा रहा है कि ODNI में उनका आखिरी कार्य दिवस 30 जून 2026 हो सकता है। इस्तीफे के साथ उन्होंने राष्ट्रपति ट्रम्प को धन्यवाद भी दिया और कहा कि अमेरिका की खुफिया एजेंसियों का नेतृत्व करना उनके लिए सम्मान की बात रही।
तुलसी गबार्ड को 13 फरवरी 2025 को ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया प्रमुख की जिम्मेदारी सौंपी थी। इस पद को अमेरिका के सबसे ताकतवर और संवेदनशील पदों में गिना जाता है।
“पति हमेशा मेरे सबसे मजबूत सहारे रहे”
अपने इस्तीफे के पत्र में तुलसी गबार्ड ने भावुक बातें भी लिखीं। उन्होंने अपने 11 साल पुराने वैवाहिक जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि उनके पति हर मुश्किल समय में उनके साथ मजबूती से खड़े रहे।
उन्होंने लिखा कि चाहे पूर्वी अफ्रीका में उनकी सैन्य तैनाती रही हो, कोई चुनावी अभियान रहा हो या फिर राष्ट्रीय खुफिया विभाग की जिम्मेदारी, उनके पति ने हमेशा उनका साथ दिया।
गबार्ड ने कहा कि अब जब उनके पति गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं, तो वह उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकतीं। उन्होंने साफ कहा कि इतने बड़े और व्यस्त पद पर रहते हुए परिवार को समय देना संभव नहीं हो पा रहा था।
इस्तीफे से पहले कई बड़े फैसले किए
तुलसी गबार्ड का कार्यकाल छोटा जरूर रहा, लेकिन इस दौरान उन्होंने कई अहम फैसले लिए। उन्होंने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों में बड़े बदलावों की शुरुआत की।
उनकी टीम ने एजेंसियों के खर्च कम करने और स्टाफ घटाने की योजना तैयार की। दावा किया गया कि इन कदमों से अमेरिकी सरकार को हर साल करीब 70 करोड़ डॉलर की बचत हो सकती है।
इसके अलावा उन्होंने सरकारी दफ्तरों में चल रहे कई DEI कार्यक्रम भी बंद कर दिए। ये कार्यक्रम अलग-अलग समुदायों को समान प्रतिनिधित्व देने के लिए बनाए गए थे।
लाखों गोपनीय दस्तावेज किए सार्वजनिक
गबार्ड ने अपने कार्यकाल में कई पुराने सरकारी रिकॉर्ड सार्वजनिक कराए। इनमें ट्रम्प-रूस जांच से जुड़े दस्तावेज, पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी और रॉबर्ट एफ. केनेडी की हत्या से जुड़े रिकॉर्ड भी शामिल थे।
उन्होंने “क्रॉसफायर हरिकेन” जांच से जुड़े कागजात भी सामने रखे। यह वही जांच थी जिसमें 2016 के अमेरिकी चुनाव में रूस की कथित भूमिका की पड़ताल की गई थी।
गबार्ड का आरोप था कि उस समय कुछ अधिकारियों ने राजनीतिक मकसद से खुफिया जानकारी का इस्तेमाल किया था ताकि ट्रम्प की जीत पर सवाल खड़े किए जा सकें।

आतंकवाद और ड्रग नेटवर्क पर भी सख्ती
राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भी गबार्ड ने सख्त रुख अपनाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके कार्यकाल में अमेरिका में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे 10 हजार से ज्यादा ऐसे लोगों को रोका गया जिनके संबंध ड्रग्स और आतंक नेटवर्क से बताए गए।
इसके अलावा 85 हजार से ज्यादा लोगों को आतंक निगरानी सूची में डाला गया। गबार्ड ने कई बार कहा था कि अमेरिका की सुरक्षा उनके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
कौन हैं तुलसी गबार्ड?
तुलसी गबार्ड का जन्म 12 अप्रैल 1981 को अमेरिकी क्षेत्र समोआ में हुआ था। हालांकि उनके नाम की वजह से अक्सर लोग उन्हें भारतीय मूल का मान लेते हैं, लेकिन वह भारतवंशी नहीं हैं।
उनके पिता माइक गबार्ड ईसाई थे। उनकी मां कैरोल गबार्ड ने बाद में हिंदू धर्म अपनाया। तुलसी ने भी आगे चलकर हिंदू धर्म को स्वीकार किया।
कम उम्र में ही उन्होंने राजनीति में कदम रख दिया था। सिर्फ 22 साल की उम्र में वह हवाई राज्य की सांसद बन गई थीं। बाद में वह अमेरिकी संसद पहुंचीं और वहां पहली हिंदू सांसद के रूप में पहचान बनाई।
भारत-अमेरिका रिश्तों की समर्थक रहीं
तुलसी गबार्ड लंबे समय से भारत और अमेरिका के मजबूत रिश्तों की समर्थक मानी जाती रही हैं। उन्होंने कई बार भारत के साथ बेहतर रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग की वकालत की।
भारत से जुड़ी उनकी पहचान और हिंदू धर्म के प्रति झुकाव के कारण भारत में भी उनका नाम काफी चर्चा में रहा।
सेना से राजनीति तक का सफर
राजनीति में आने से पहले तुलसी गबार्ड अमेरिकी सेना में भी सेवा दे चुकी हैं। वह इराक युद्ध में लेफ्टिनेंट कर्नल के तौर पर तैनात रह चुकी हैं। साथ ही अमेरिकी आर्मी रिजर्विस्ट भी रहीं।
उनकी सैन्य पृष्ठभूमि की वजह से राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।
डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ ट्रम्प के करीब पहुंचीं
तुलसी गबार्ड पहले डेमोक्रेटिक पार्टी का हिस्सा थीं। उन्होंने 2016 और 2020 में राष्ट्रपति पद की दौड़ में भी हिस्सा लिया था।
हालांकि बाद में उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी पर गंभीर आरोप लगाते हुए 2022 में पार्टी छोड़ दी। उन्होंने कहा था कि पार्टी कुछ चुनिंदा लोगों के कंट्रोल में आ चुकी है और समाज को बांटने की राजनीति कर रही है।
उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी इस्लामी कट्टरपंथ और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कमजोर रवैया अपना रही है।
पार्टी छोड़ने के बाद वह फॉक्स न्यूज से जुड़ गईं और कई कार्यक्रमों में नजर आने लगीं। इसी दौरान उनका झुकाव रिपब्लिकन पार्टी की तरफ बढ़ा और बाद में वह ट्रम्प प्रशासन का हिस्सा बन गईं।
कमला हैरिस के खिलाफ डिबेट से मिली बड़ी पहचान
तुलसी गबार्ड 2019 में उस समय काफी चर्चा में आई थीं जब उन्होंने डेमोक्रेटिक प्राइमरी डिबेट में कमला हैरिस को कड़ी चुनौती दी थी।
उस बहस में गबार्ड ने कमला हैरिस के पुराने फैसलों और प्रॉसिक्यूटर के तौर पर उनके कामकाज पर सवाल उठाए थे। उस डिबेट के बाद तुलसी का नाम राष्ट्रीय स्तर पर तेजी से चर्चा में आया।
क्या तुलसी की वापसी होगी?
तुलसी गबार्ड का इस्तीफा अमेरिकी राजनीति में बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। हालांकि उन्होंने राजनीति से पूरी तरह दूरी बनाने का संकेत नहीं दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि परिवार की जिम्मेदारी पूरी करने के बाद वह दोबारा सक्रिय राजनीति या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े किसी बड़े पद पर लौट सकती हैं।
फिलहाल उनका पूरा ध्यान अपने पति के इलाज और परिवार पर है। यही वजह है कि उन्होंने अमेरिका के सबसे प्रभावशाली पदों में से एक को छोड़ने का फैसला किया।
तुलसी गबार्ड का यह कदम कई लोगों को भावुक भी कर रहा है, क्योंकि सत्ता और जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने परिवार को प्राथमिकता दी है।

