अमेरिका के विदेश मंत्री Marco Rubio शनिवार को भारत दौरे पर नई दिल्ली पहुंचे। उनका यह दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब पिछले कुछ महीनों में भारत और अमेरिका के रिश्तों में कुछ मुद्दों को लेकर हल्का तनाव देखने को मिला था। माना जा रहा है कि यह यात्रा दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को फिर से नई मजबूती देने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकती है।

दिल्ली पहुंचने से पहले मार्को रूबियो ने कोलकाता का दौरा किया। वहां उन्होंने Missionaries of Charity के मुख्यालय ‘मदर हाउस’ जाकर श्रद्धांजलि दी। इस दौरान उन्होंने Mother Teresa की समाधि पर प्रार्थना भी की। उनके साथ उनकी पत्नी जैनेट रूबियो और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर भी मौजूद रहे।

अब नई दिल्ली में उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री Narendra Modi और विदेश मंत्री S. Jaishankar से होने वाली है। माना जा रहा है कि इस बैठक में व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे कई बड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा होगी।

QUAD बैठक पर भी दुनिया की नजर
मार्को रूबियो का यह दौरा QUAD समूह की अहम बैठक से भी जुड़ा हुआ है। QUAD में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इस बार बैठक की मेजबानी भारत कर रहा है।
इस बैठक में ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री Penny Wong और जापान के विदेश मंत्री Toshimitsu Motegi भी हिस्सा लेने वाले हैं।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, बैठक में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को सुरक्षित और खुला बनाए रखने पर जोर रहेगा। इसके अलावा समुद्री सुरक्षा, नई तकनीक, सप्लाई चेन, साइबर सुरक्षा और रक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए QUAD देशों के बीच रणनीतिक तालमेल लगातार मजबूत किया जा रहा है। खासतौर पर दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों के कारण अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की चिंता बढ़ी हुई है।

ऊर्जा सुरक्षा पर रहेगा खास फोकस
मार्को रूबियो के इस दौरे में ऊर्जा सुरक्षा सबसे अहम मुद्दों में से एक मानी जा रही है।
भारत इस समय रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है, क्योंकि वहां से अपेक्षाकृत सस्ता तेल मिल रहा है। वहीं अमेरिका चाहता है कि भारत अमेरिकी तेल और LNG गैस के आयात को भी बढ़ाए।
रूबियो पहले भी कह चुके हैं कि अमेरिका भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादा तेल और गैस सप्लाई करने को तैयार है। ऐसे में माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच ऊर्जा साझेदारी को और मजबूत बनाने पर बातचीत हो सकती है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन की अनिश्चितता को देखते हुए भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कई देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना चाहता है। यही वजह है कि भारत अब ऊर्जा आयात के स्रोतों को और विविध बनाने पर जोर दे रहा है।
व्यापार और तकनीक पर भी बड़ा फोकस
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। दोनों देशों के बीच कुल व्यापार करीब 11 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।
भारत अमेरिका को फार्मास्यूटिकल्स, टेलीकॉम डिवाइस, ज्वेलरी, कपड़े और पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात करता है। वहीं अमेरिका से भारत कच्चा तेल, कोयला, विमान और अंतरिक्ष उपकरणों के पुर्जे समेत कई उत्पाद आयात करता है।
हालांकि पिछले कुछ समय में दोनों देशों के बीच टैरिफ और व्यापारिक प्रतिबंधों को लेकर मतभेद भी सामने आए थे। अब दोनों पक्ष इन मुद्दों को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, इस दौरे के दौरान निवेश बढ़ाने, महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई चेन मजबूत करने और नई तकनीकों में सहयोग पर चर्चा हो सकती है।
सेमीकंडक्टर और AI पर साझेदारी
भारत और अमेरिका अब सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बैटरी निर्माण और एडवांस टेक्नोलॉजी में साथ काम करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
अमेरिका चाहता है कि चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को तकनीकी निर्माण और सप्लाई चेन का बड़ा केंद्र बनाया जाए। भारत भी खुद को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित करने की कोशिश कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन सहयोग भारत-अमेरिका रिश्तों की सबसे मजबूत कड़ी बन सकता है।
रक्षा साझेदारी लगातार हो रही मजबूत
पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है। भारतीय सेना और वायुसेना पहले से ही अमेरिका के कई आधुनिक रक्षा उपकरणों का इस्तेमाल कर रही हैं।
इनमें Boeing P-8 Poseidon विमान, MQ-9B SkyGuardian ड्रोन, M777 howitzer तोप और C-17 Globemaster III ट्रांसपोर्ट विमान शामिल हैं।
अब दोनों देश सिर्फ खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि रक्षा उपकरणों के संयुक्त उत्पादन और नई सैन्य तकनीकों के विकास पर भी साथ काम करना चाहते हैं।
भारत की ‘मेक इन इंडिया’ नीति और अमेरिका की रणनीतिक जरूरतें इस साझेदारी को और मजबूत बना रही हैं।
चीन को लेकर अमेरिका का सख्त रुख
मार्को रूबियो को अमेरिका में चीन के खिलाफ कड़ा रुख रखने वाले नेताओं में गिना जाता है। वह लंबे समय से भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बताते रहे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि उनका यह भारत दौरा सिर्फ कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एशिया में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत भी है। अमेरिका चाहता है कि भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक मजबूत सहयोगी की भूमिका निभाए।
यही वजह है कि QUAD, रक्षा साझेदारी, टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ता जा रहा है।
रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश
हाल के महीनों में व्यापार, टैरिफ और कुछ राजनीतिक मुद्दों को लेकर भारत-अमेरिका संबंधों में हल्की दूरी दिखाई दी थी। लेकिन अब दोनों देश फिर से रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं।
मार्को रूबियो का यह दौरा इस लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि दोनों देश व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और तकनीक के क्षेत्र में कितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं।
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि अमेरिका भारत को एशिया में अपने सबसे अहम रणनीतिक साझेदारों में से एक मान रहा है और यही संदेश इस दौरे के जरिए दुनिया को भी दिया जा रहा है।

