पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध के बीच भारत की भूमिका को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इसी मुद्दे पर केंद्र सरकार ने संसद में सर्वदलीय बैठक बुलाई, जिसमें विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और भारतीयों की सुरक्षा जैसे अहम विषयों पर चर्चा हुई। बैठक के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने साफ शब्दों में कहा कि भारत किसी भी स्थिति में पाकिस्तान की तरह मध्यस्थ (मीडिएटर) की भूमिका नहीं निभाएगा। उनका यह बयान उस समय आया जब विपक्ष ने सरकार की चुप्पी और रणनीति पर सवाल उठाए।
बैठक में क्या हुआ, क्यों उठे सवाल?
करीब दो घंटे तक चली इस अहम बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। इसमें गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। हालांकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधि बैठक में शामिल नहीं हुए।
बैठक में विपक्ष ने यह सवाल उठाया कि जब अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तनाव बढ़ रहा है, तो भारत की भूमिका क्या है? कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने कहा कि पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, जबकि भारत सिर्फ देख रहा है। इसी पर जवाब देते हुए जयशंकर ने कहा कि भारत की विदेश नीति अलग है और वह किसी के बीच दलाली नहीं करता।
भारत की स्पष्ट नीति: ‘मध्यस्थ नहीं, संतुलन’
विदेश मंत्री ने साफ किया कि भारत का रुख हमेशा संतुलित और स्वतंत्र रहा है। भारत किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय सभी देशों से संबंध बनाए रखता है। यही कारण है कि भारत एक साथ अमेरिका, इजराइल और ईरान तीनों के साथ बातचीत करता है।
सरकार के मुताबिक, भारत की प्राथमिकता अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और विदेशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा सबसे अहम है। यही वजह है कि भारत सीधे तौर पर किसी विवाद में कूदने के बजाय कूटनीतिक तरीके से संवाद बनाए रखता है।

ऊर्जा सुरक्षा पर सरकार का भरोसा
बैठक में सबसे ज्यादा चिंता तेल और गैस की सप्लाई को लेकर थी। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से अक्सर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं और सप्लाई पर असर पड़ता है। लेकिन सरकार ने भरोसा दिलाया कि देश में फिलहाल किसी तरह की कमी नहीं है।
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि भारत के पास मजबूत रिफाइनिंग सिस्टम है और सप्लाई लगातार बनी हुई है। अब तक चार शिपमेंट आ चुकी हैं और आगे भी आने की उम्मीद है।
सरकार ने यह भी बताया कि भारत अब सिर्फ एक या दो देशों पर निर्भर नहीं है, बल्कि 40 से ज्यादा देशों से तेल और गैस आयात करता है। इसमें रूस की हिस्सेदारी भी बढ़ी है, जिससे सप्लाई सुरक्षित बनी हुई है।
ईरान का कदम और भारत के लिए राहत
बैठक में यह जानकारी दी गई कि ईरान ने पांच दिन बाद अपने सप्लाई रूट फिर से खोल दिए हैं। इसे एक सकारात्मक संकेत माना गया। इससे भारत सहित कई देशों को राहत मिली है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है।
सरकार का कहना है कि भारत लगातार सभी देशों के संपर्क में है और स्थिति पर नजर बनाए हुए है। अगर हालात बिगड़ते हैं तो वैकल्पिक रास्तों की भी तैयारी की जा रही है।
भारतीयों की सुरक्षा: सबसे बड़ी प्राथमिकता
पश्चिम एशिया में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है। सरकार ने बताया कि अब तक लाखों भारतीयों को सुरक्षित वापस लाया जा चुका है और जो वहां हैं, उनकी सुरक्षा के लिए दूतावास लगातार काम कर रहे हैं।
जरूरत पड़ने पर तुरंत निकासी (evacuation) की भी पूरी तैयारी रखी गई है। विदेश मंत्रालय ने हेल्पलाइन और संपर्क चैनल भी सक्रिय रखे हैं।
प्रधानमंत्री का संदेश: युद्ध नहीं, बातचीत जरूरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से बातचीत में कहा कि युद्ध जल्द खत्म होना चाहिए, क्योंकि इससे सभी देशों को नुकसान हो रहा है।
राज्यसभा और लोकसभा में दिए गए अपने बयान में प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाला समय भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। उन्होंने राज्यों से सहयोग की अपील करते हुए कहा कि देश को “टीम इंडिया” की तरह काम करना होगा।
विपक्ष का असंतोष जारी
हालांकि सरकार के जवाबों से विपक्ष पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखा। विपक्षी दलों ने संसद में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की मांग की है। उनका कहना है कि सरकार को अपनी विदेश नीति और रणनीति को और स्पष्ट करना चाहिए।
कुछ नेताओं का मानना है कि भारत को वैश्विक मंच पर ज्यादा सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, जबकि सरकार का मानना है कि संतुलित और व्यावहारिक नीति ही देश के हित में है।
भारत की विदेश नीति का बड़ा संदेश
इस पूरी बहस के बीच एक बात साफ हो गई है कि भारत अपनी विदेश नीति में किसी दबाव में आने वाला नहीं है। भारत न तो किसी का पक्ष ले रहा है और न ही खुद को मध्यस्थ बना रहा है। वह अपने हितों को ध्यान में रखते हुए सभी देशों से संबंध बनाए रखने की नीति पर काम कर रहा है।
भारत की यही रणनीति उसे वैश्विक स्तर पर एक भरोसेमंद और संतुलित देश बनाती है। जहां एक तरफ वह शांति की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ अपने आर्थिक और सुरक्षा हितों से समझौता नहीं करता।
आगे क्या हो सकता है?
आने वाले समय में पश्चिम एशिया की स्थिति पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। अगर तनाव बढ़ता है तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा, खासकर ऊर्जा बाजार पर। ऐसे में भारत को अपनी रणनीति और मजबूत करनी होगी।
सरकार ने संकेत दिए हैं कि वह कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय बनी रहेगी और जरूरत पड़ने पर नए कदम भी उठाएगी।

