देश में बढ़ती कीमतों को काबू में रखने के लिए केंद्र सरकार ने एक अहम फैसला लिया है। सरकार ने अगले पांच साल यानी 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक खुदरा महंगाई (रिटेल इन्फ्लेशन) को 4% के आसपास रखने का लक्ष्य तय किया है। इसके साथ ही 2% ऊपर और 2% नीचे की छूट भी दी गई है, यानी महंगाई 2% से 6% के बीच रह सकती है।
यह फैसला वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग की ओर से जारी एक अधिसूचना के जरिए घोषित किया गया है। इस फैसले से साफ है कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) आने वाले वर्षों में भी महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए मिलकर काम करेंगे।
पहले भी लागू था यही लक्ष्य
भारत में महंगाई को नियंत्रित करने का यह मॉडल कोई नया नहीं है। साल 2016 में पहली बार सरकार ने RBI को यह जिम्मेदारी दी थी कि वह महंगाई को 4% के आसपास बनाए रखे। इसके लिए 2% ऊपर और नीचे का दायरा तय किया गया था।
पहला लक्ष्य मार्च 2021 तक के लिए था। इसके बाद 2021 में इसे फिर से पांच साल के लिए बढ़ाया गया। अब 2026 से 2031 तक के लिए तीसरी बार इसी लक्ष्य को जारी रखा गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार इस ढांचे को सफल मानती है और इसमें ज्यादा बदलाव नहीं करना चाहती।
महंगाई लक्ष्य कैसे काम करता है?
महंगाई को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के पास होती है। यह समिति 6 सदस्यों की होती है और इसकी अध्यक्षता RBI गवर्नर करते हैं।
MPC समय-समय पर ब्याज दरों (रेपो रेट) में बदलाव करके महंगाई को नियंत्रित करने की कोशिश करती है। अगर महंगाई ज्यादा बढ़ती है तो ब्याज दर बढ़ाई जाती है, ताकि खर्च कम हो और कीमतें नियंत्रित रहें। वहीं, अगर महंगाई कम होती है तो ब्याज दर घटाई जाती है, जिससे अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिले।

वर्तमान स्थिति क्या है?
हाल के आंकड़ों के अनुसार, देश में खुदरा महंगाई फरवरी महीने में 3.21% रही, जो जनवरी के 2.74% से ज्यादा है। यानी महंगाई में हल्की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन यह अभी भी तय दायरे के भीतर है।
महंगाई का यह आंकड़ा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर मापा जाता है। हाल ही में CPI की नई श्रृंखला जारी की गई है, जिसका आधार वर्ष 2024 रखा गया है।
महंगाई लक्ष्य पर RBI की समीक्षा
2026 के बाद के लिए नए लक्ष्य तय करने से पहले RBI ने इस पूरे ढांचे की समीक्षा भी की। अगस्त 2025 में RBI ने एक चर्चा पत्र जारी किया था, जिसमें कई अहम सवाल उठाए गए थे।
इन सवालों में यह शामिल था कि:
- क्या महंगाई को मापने के लिए हेडलाइन इन्फ्लेशन सही है या कोर इन्फ्लेशन?
- क्या 4% का लक्ष्य अभी भी सही है?
- क्या 2% से 6% का दायरा बदला जाना चाहिए?
- क्या फिक्स लक्ष्य हटाकर सिर्फ एक रेंज रखी जानी चाहिए?
इन सवालों पर विशेषज्ञों और आम लोगों से राय मांगी गई थी, ताकि भविष्य के लिए बेहतर नीति बनाई जा सके।
पिछले 9 साल का अनुभव कैसा रहा?
RBI के अनुसार, 2016 में शुरू हुआ यह महंगाई नियंत्रण ढांचा काफी हद तक सफल रहा है। पिछले करीब 9 साल में महंगाई लगभग 75% समय तक तय सीमा के अंदर रही।
हालांकि इस दौरान कुछ समय ऐसे भी आए जब महंगाई बढ़ गई, खासकर कोविड-19 महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के समय। इन घटनाओं ने दुनिया भर में कीमतों को प्रभावित किया था।
RBI के मुताबिक, इस पूरे दौर को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है:
- शुरुआती 3 साल: महंगाई कम और स्थिर रही
- बीच के 3 साल: महंगाई ऊपरी सीमा के करीब पहुंची
- आखिरी 3 साल: फिर से नियंत्रण में आई
महंगाई कम करने में कितना असर हुआ?
अगर आंकड़ों की बात करें, तो 2016 से पहले महंगाई औसतन 6.8% के आसपास रहती थी। लेकिन इस नए ढांचे के बाद यह घटकर करीब 4.9% के आसपास आ गई है।
इससे यह साफ होता है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए अपनाया गया यह तरीका काफी हद तक असरदार रहा है।
दुनिया में भी अपनाया गया मॉडल
महंगाई को एक तय लक्ष्य के भीतर रखने की यह प्रणाली दुनिया भर में इस्तेमाल की जाती है। इसे “Inflation Targeting” कहा जाता है।
सबसे पहले न्यूजीलैंड ने 1990 में इस मॉडल को अपनाया था। इसके बाद कई देशों ने इसे अपनाया और आज यह दुनिया का सबसे लोकप्रिय मौद्रिक नीति ढांचा बन चुका है।
इस साल इस प्रणाली को लागू हुए 35 साल पूरे हो रहे हैं।
आगे की चुनौतियां क्या होंगी?
हालांकि यह ढांचा अब तक सफल रहा है, लेकिन आने वाले समय में कई नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
- खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव: भारत में CPI में खाने-पीने की चीजों का बड़ा हिस्सा है, जिससे महंगाई पर सीधा असर पड़ता है।
- वैश्विक हालात: युद्ध, तेल की कीमतें और सप्लाई चेन की समस्याएं महंगाई को बढ़ा सकती हैं।
- तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था: भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होता।
इसी वजह से RBI ने अपने ढांचे में लचीलापन बनाए रखने की बात कही है, ताकि जरूरत के हिसाब से फैसले लिए जा सकें।
सरकार और RBI की रणनीति
सरकार और RBI दोनों का मानना है कि नीति में स्थिरता और भरोसा बहुत जरूरी है। अगर बार-बार नियम बदले जाएं, तो बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है।
इसलिए मौजूदा ढांचे को जारी रखते हुए उसमें सुधार और लचीलापन लाने पर जोर दिया जा रहा है। इससे निवेशकों और आम लोगों दोनों का भरोसा बना रहता है।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
महंगाई सीधे आम लोगों की जेब पर असर डालती है। अगर महंगाई ज्यादा होती है, तो रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाती हैं। वहीं, कम महंगाई होने पर लोगों की खरीदने की क्षमता बढ़ती है।
4% के आसपास महंगाई बनाए रखने का मतलब है कि कीमतों में बहुत ज्यादा तेजी से बढ़ोतरी न हो और अर्थव्यवस्था भी चलती रहे।
निष्कर्ष:
सरकार द्वारा 2031 तक महंगाई को 4% के आसपास रखने का लक्ष्य जारी रखना एक स्थिर और भरोसेमंद नीति का संकेत है। पिछले वर्षों का अनुभव बताता है कि यह ढांचा काफी हद तक सफल रहा है, लेकिन भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए इसमें लचीलापन बनाए रखना भी जरूरी होगा।

