सरकार ने पेट्रोल-डीजल से घटाई एक्साइज ड्यूटी, फिर भी दाम क्यों नहीं घटे?

देश में बढ़ती महंगाई और अंतरराष्ट्रीय हालात के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर बड़ी राहत का ऐलान किया है। सरकार ने दोनों ईंधनों पर एक्साइज ड्यूटी में ₹10-₹10 प्रति लीटर की कटौती कर दी है। इस फैसले का उद्देश्य आम लोगों पर बढ़ती कीमतों का दबाव कम करना बताया जा रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस फैसले के बाद पेट्रोल-डीजल तुरंत सस्ता हो जाएगा? जवाब इतना आसान नहीं है।

 

कितनी कम हुई एक्साइज ड्यूटी?

सरकार के फैसले के बाद पेट्रोल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी ₹13 प्रति लीटर से घटकर ₹3 प्रति लीटर रह गई है। वहीं डीजल पर ₹10 प्रति लीटर की ड्यूटी को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है, यानी अब इस पर एक्साइज ड्यूटी शून्य हो गई है।

 

यह कटौती ऐसे समय में की गई है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।

 

कच्चे तेल की कीमतों का असर

मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव, खासकर ईरान से जुड़े हालात के कारण कच्चे तेल के दाम 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 110 डॉलर के पार पहुंच गए हैं। इसका सीधा असर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर पड़ता है।

 

तेल महंगा होने का मतलब है कि पेट्रोल-डीजल बनाने की लागत भी बढ़ जाती है। इसी वजह से तेल कंपनियों को हर लीटर पर नुकसान उठाना पड़ रहा था।

 

क्या तुरंत सस्ता होगा पेट्रोल-डीजल?

यह सबसे अहम सवाल है। एक्साइज ड्यूटी कम होने के बावजूद पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत ₹10 घट जाएंगे, ऐसा जरूरी नहीं है।

 

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें सीधे सरकार तय नहीं करती। यह काम तेल कंपनियां करती हैं, जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड।

 

ये कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, डॉलर-रुपया रेट और अपने मुनाफे को ध्यान में रखकर रिटेल कीमत तय करती हैं।

government reduced excise duty on petrol and diesel

तेल कंपनियां दाम क्यों नहीं घटा रहीं?

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, तेल कंपनियां फिलहाल भारी नुकसान झेल रही हैं। अनुमान है कि पेट्रोल पर लगभग ₹24 प्रति लीटर और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर तक का घाटा हो रहा है।

 

ऐसे में कंपनियां एक्साइज ड्यूटी में मिली राहत का इस्तेमाल अपने नुकसान की भरपाई करने में कर सकती हैं, न कि कीमतें कम करने में।

 

तेल के दाम तय कैसे होते हैं?

पेट्रोल-डीजल की कीमत कई हिस्सों को मिलाकर बनती है:

  • कच्चे तेल की लागत
  • रिफाइनरी का खर्च और मार्जिन
  • केंद्र सरकार का टैक्स (एक्साइज)
  • राज्य सरकार का टैक्स (VAT)
  • डीलर कमीशन
  • कंपनी का मुनाफा

यानी सिर्फ एक हिस्से में बदलाव से पूरी कीमत पर तुरंत असर नहीं पड़ता।

 

कच्चा तेल महंगा होने का असर

एक रिपोर्ट के अनुसार, जब कच्चे तेल की कीमत 65-70 डॉलर प्रति बैरल थी, तब कंपनियों को प्रति लीटर लगभग ₹8 का मुनाफा मिलने की उम्मीद थी। लेकिन अब जब कीमत 100 डॉलर के पार चली गई है, तो यह मुनाफा नुकसान में बदल गया है।

 

आमतौर पर कच्चे तेल की कीमत 1 डॉलर बढ़ने पर पेट्रोल-डीजल की लागत करीब 50-60 पैसे प्रति लीटर बढ़ जाती है।

 

प्राइवेट कंपनियों का रुख

सरकारी कंपनियों के अलावा निजी कंपनियां भी इस बाजार में सक्रिय हैं, जैसे रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी।

 

हाल ही में नायरा एनर्जी ने पेट्रोल के दाम ₹5 और डीजल के ₹3 प्रति लीटर बढ़ा दिए हैं। जबकि रिलायंस ने अभी तक कीमतों में बदलाव नहीं किया है।

 

क्या आगे और बढ़ेंगे दाम?

यह पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर करता है। अगर मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है और सप्लाई बाधित होती है, तो कच्चे तेल के दाम और ऊपर जा सकते हैं।

 

ऐसी स्थिति में सरकार की यह टैक्स कटौती सिर्फ एक “कुशन” का काम करेगी, यानी बढ़ती कीमतों का असर थोड़ा कम करेगी, लेकिन पूरी राहत नहीं दे पाएगी।

 

सरकार को कितना नुकसान?

एक्साइज ड्यूटी कम करने से सरकार की आमदनी पर सीधा असर पड़ेगा। अनुमान के मुताबिक:

  • पेट्रोल से रोज लगभग ₹138 करोड़ का नुकसान
  • डीजल से रोज लगभग ₹278 करोड़ का नुकसान
  • कुल मिलाकर रोज करीब ₹416 करोड़ का राजस्व घटेगा

फिर भी सरकार ने यह फैसला इसलिए लिया है ताकि जनता पर महंगाई का ज्यादा बोझ न पड़े।

 

क्या राज्य सरकारें भी टैक्स घटाएंगी?

केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद अब नजर राज्य सरकारों पर है। अगर राज्य भी अपना VAT कम करते हैं, तभी लोगों को पंप पर असली राहत मिल सकती है।

 

आमतौर पर राज्यों द्वारा टैक्स घटाने पर ₹2 से ₹5 प्रति लीटर तक की राहत मिल सकती है।

 

सस्ता होने पर भी क्यों नहीं घटते दाम?

अक्सर यह सवाल उठता है कि जब कच्चा तेल महंगा होता है तो दाम तुरंत बढ़ जाते हैं, लेकिन सस्ता होने पर उतनी तेजी से नहीं घटते।

 

इसके पीछे “अंडर-रिकवरी” का कारण होता है। जब कंपनियां नुकसान में होती हैं, तो बाद में कीमतें कम करने के बजाय उसी नुकसान की भरपाई करती हैं।

 

इसके अलावा, कई बार सरकार भी तेल सस्ता होने पर टैक्स बढ़ा देती है, जिससे आम जनता तक पूरा फायदा नहीं पहुंच पाता।

 

वित्त मंत्री का क्या कहना है?

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस फैसले को जनता के हित में बताया है। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों का असर सीधे लोगों पर न पड़े।

 

पीएम की बैठक और आगे की रणनीति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस मुद्दे पर सक्रिय हैं। वे राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर हालात की समीक्षा कर रहे हैं।

 

सरकार ने यह भी साफ किया है कि देश में पेट्रोल, डीजल और गैस की कोई कमी नहीं है और सप्लाई पूरी तरह सुरक्षित है।

 

निष्कर्ष:

सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में कटौती एक अहम कदम जरूर है, लेकिन इसका सीधा फायदा तुरंत आम जनता को मिलेगा, यह जरूरी नहीं है। तेल कंपनियों के घाटे, अंतरराष्ट्रीय बाजार और राज्यों के टैक्स जैसे कई फैक्टर मिलकर कीमत तय करते हैं।