सिंधु जल संधि पर नया विवाद: PCA ने तेज की सुनवाई, भारत ने किया बहिष्कार, जानिए क्या है मामला?

भारत और पाकिस्तान के बीच पानी को लेकर बना पुराना समझौता अब एक नए विवाद के दौर में पहुंच गया है। नीदरलैंड के हेग शहर में स्थित Permanent Court of Arbitration (PCA) ने किशनगंगा और रतले हाइड्रो प्रोजेक्ट्स से जुड़े मामले की सुनवाई तेज कर दी है। खास बात यह है कि भारत ने इस प्रक्रिया में शामिल न होने का फैसला किया है, फिर भी यह अंतरराष्ट्रीय अदालत आगे बढ़ रही है।

इस पूरे घटनाक्रम ने सिर्फ एक कानूनी बहस को जन्म नहीं दिया है, बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे जल समझौते की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

क्या है पूरा मामला?

विवाद की जड़ जम्मू-कश्मीर में बन रहे दो बड़े हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट हैं – Kishanganga Hydroelectric Project (330 मेगावाट) और Ratle Hydroelectric Project (850 मेगावाट)। पाकिस्तान का आरोप है कि इन प्रोजेक्ट्स के कारण उसके हिस्से में आने वाले पानी का प्रवाह प्रभावित हो सकता है।

वहीं भारत का कहना है कि ये दोनों परियोजनाएं पूरी तरह नियमों के अनुसार हैं और पानी के प्राकृतिक बहाव को रोके बिना बिजली उत्पादन के लिए बनाई गई हैं।

 

भारत की आपत्ति क्या है?

भारत का मुख्य विरोध इस बात को लेकर है कि विवाद सुलझाने की जो प्रक्रिया तय की गई थी, उसका पालन नहीं किया गया। दरअसल, Indus Waters Treaty के तहत किसी भी विवाद को चरणबद्ध तरीके से सुलझाया जाना चाहिए।

 

इस प्रक्रिया के अनुसार:

  1. सबसे पहले मामला स्थायी आयोग के पास जाता है
  2. फिर जरूरत पड़ने पर न्यूट्रल एक्सपर्ट नियुक्त किया जाता है
  3. और आखिरी चरण में ही अंतरराष्ट्रीय अदालत यानी PCA की भूमिका होती है

लेकिन इस बार एक साथ दो प्रक्रियाएं शुरू कर दी गईं – न्यूट्रल एक्सपर्ट और कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन। भारत का कहना है कि यह तरीका गलत है और इससे एक ही मामले में अलग-अलग फैसले आ सकते हैं।

New controversy over Indus Water Treaty

भारत ने PCA का बहिष्कार क्यों किया?
भारत का मानना है कि जब तक पहले के चरण पूरे नहीं होते, तब तक PCA को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। इसलिए भारत ने इस प्रक्रिया से दूरी बना ली है और केवल न्यूट्रल एक्सपर्ट वाली प्रक्रिया में भाग ले रहा है।
भारत के लिए यह केवल तकनीकी मामला नहीं है, बल्कि यह उसकी संप्रभुता से भी जुड़ा मुद्दा है। अगर वह PCA की सुनवाई में शामिल होता है, तो वह एक ऐसे मंच को मान्यता देता, जिसे वह नियमों के खिलाफ मानता है।


पाकिस्तान की चिंता क्या है?
पाकिस्तान को डर है कि इन प्रोजेक्ट्स के चलते उसके हिस्से में आने वाले पानी की मात्रा कम हो सकती है। इसलिए उसने अंतरराष्ट्रीय मंच का सहारा लिया है।
हालांकि भारत का कहना है कि यह चिंता तकनीकी कम और राजनीतिक ज्यादा है। भारत का दावा है कि इन प्रोजेक्ट्स से पानी के बहाव पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।


सिंधु जल संधि क्या है?
भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे को लेकर 19 सितंबर 1960 को कराची में एक समझौता हुआ था, जिसे सिंधु जल संधि कहा जाता है। इसमें World Bank ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।

इस संधि के तहत:

  • पूर्वी नदियां (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत को मिलीं
  • पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब) पाकिस्तान को दी गईं

हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित उपयोग की अनुमति है, जैसे खेती, घरेलू जरूरत और बिजली उत्पादन।

 

विवाद का असर क्या हो सकता है?

अगर PCA इस मामले में फैसला देता है और भारत उसमें शामिल नहीं होता, तो उस फैसले को लागू करना मुश्किल हो सकता है। क्योंकि इस तरह के समझौतों में दोनों देशों की सहमति जरूरी होती है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि एकतरफा फैसला जमीन पर असरदार नहीं होगा और इससे संधि कमजोर पड़ सकती है।

 

क्या संधि खतरे में है?

अब तक यह संधि कई युद्धों और तनाव के बावजूद बनी रही है। लेकिन मौजूदा स्थिति में पहली बार ऐसा लग रहा है कि इसकी प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में है।

भारत ने पहले ही इस संधि में बदलाव की बात उठाई है। उसका कहना है कि 1960 के हालात अब बदल चुके हैं – जनसंख्या बढ़ गई है, जलवायु परिवर्तन का असर है और ऊर्जा की मांग भी ज्यादा हो गई है।

 

आगे क्या होगा?

इस पूरे विवाद का असर सिर्फ दो प्रोजेक्ट्स तक सीमित नहीं रहेगा। यह तय करेगा कि भविष्य में भारत और पाकिस्तान पानी के मामलों को कैसे संभालेंगे।

भारत का फोकस अभी न्यूट्रल एक्सपर्ट की प्रक्रिया पर है, जिसे वह सही मानता है। वहीं PCA अपनी सुनवाई आगे बढ़ा रहा है।

अगर दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्थिति पर कायम रहते हैं, तो यह विवाद और लंबा खिंच सकता है।