देश की वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। 30 मार्च 2026 को लोकसभा ने इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) संशोधन बिल पास कर दिया। इस नए बदलाव का मकसद दिवालिया मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को तेज करना, देरी कम करना और बैंकों व अन्य लेनदारों का भरोसा बढ़ाना है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में जानकारी देते हुए बताया कि IBC लागू होने के बाद अब तक 1,376 कंपनियों के मामलों का समाधान किया जा चुका है और करीब 4.11 लाख करोड़ रुपये की रिकवरी हुई है। यह आंकड़ा दिखाता है कि यह कानून पहले ही बैंकिंग सिस्टम को काफी हद तक मजबूत कर चुका है।
क्या हैं नए संशोधन के बड़े बदलाव?
इस संशोधन के जरिए IBC को और ज्यादा प्रभावी बनाने की कोशिश की गई है। पहले कई मामलों में लंबी देरी होती थी, जिससे न केवल बैंकों का पैसा फंसा रहता था बल्कि कंपनियों और कर्मचारियों को भी नुकसान उठाना पड़ता था।
अब सबसे बड़ा बदलाव यह है कि जैसे ही किसी कंपनी का डिफॉल्ट (कर्ज नहीं चुका पाना) साबित होगा, तो 14 दिनों के भीतर उसकी दिवालिया याचिका को स्वीकार करना अनिवार्य होगा। इससे केस शुरू होने में होने वाली देरी खत्म होगी और पूरी प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ेगी।
नया मॉडल: लेनदारों को ज्यादा ताकत
इस बार सरकार ने एक नया सिस्टम भी पेश किया है, जिसे ‘क्रेडिटर-ड्रिवन मॉडल’ कहा जा रहा है। इसका मतलब है कि अब बैंकों और अन्य लेनदारों को ज्यादा अधिकार दिए जाएंगे ताकि वे खुद समाधान प्रक्रिया शुरू कर सकें।
इस मॉडल के तहत:
- कोर्ट के बाहर समझौते (Out-of-court settlement) को बढ़ावा मिलेगा
- कुछ मामलों में कंपनी के पुराने प्रबंधन को सीमित अधिकार दिए जा सकते हैं (Debtor-in-possession)
- जरूरत पड़ने पर लेनदार पूरी प्रक्रिया को कंट्रोल कर सकेंगे (Creditor-in-control)
इन बदलावों से उम्मीद है कि कानूनी लड़ाई कम होगी और मामलों का निपटारा जल्दी हो सकेगा।

देरी और कानूनी उलझनों पर रोक
IBC के तहत सबसे बड़ी समस्या देरी और बार-बार कोर्ट में केस अटकने की थी। नए संशोधन में इसे दूर करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं।
अब:
- 14 दिन में केस स्वीकार करना जरूरी होगा
- प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल रोकने के लिए सख्त नियम बनाए गए हैं
- कानूनी प्रक्रियाओं को सरल किया गया है ताकि अनावश्यक अड़चनें कम हों
इससे पूरा सिस्टम ज्यादा पारदर्शी और तेज बनने की उम्मीद है।
अब इंटरनेशनल कंपनियों पर भी आसान प्रक्रिया
इस संशोधन में पहली बार ग्रुप इनसॉल्वेंसी और क्रॉस-बॉर्डर इनसॉल्वेंसी से जुड़े प्रावधान भी जोड़े गए हैं। इसका मतलब है कि अगर कोई कंपनी कई देशों में काम कर रही है, तो उसके मामलों को बेहतर तरीके से संभाला जा सकेगा।
साथ ही:
- एक ही ग्रुप की कंपनियों के मामलों को साथ में सुलझाया जा सकेगा
- अलग-अलग देशों में फैले कारोबार के लिए एक समन्वित प्रक्रिया अपनाई जाएगी
- भारत का सिस्टम अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के करीब पहुंचेगा
यह कदम खास तौर पर बड़े और मल्टीनेशनल कारोबार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बैंकों और NPA पर क्या असर पड़ेगा?
IBC ने पहले ही बैंकों के फंसे कर्ज (NPA) को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई है। सरकार के अनुसार, आधे से ज्यादा एनपीए इसी प्रक्रिया के जरिए हल किए गए हैं।
नए संशोधन से:
- कर्ज लेने वालों में अनुशासन बढ़ेगा
- बैंकों को पैसा वापस मिलने की संभावना बढ़ेगी
- कंपनियों की क्रेडिट रेटिंग बेहतर हो सकती है
इससे बैंकिंग सेक्टर और मजबूत होगा और अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिलेगा।
कर्मचारियों और हितधारकों का ध्यान
सरकार ने यह भी साफ किया है कि इस पूरी प्रक्रिया में कर्मचारियों के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। IBC में पहले की तरह ही कर्मचारियों के बकाया को प्राथमिकता दी जाएगी।
इसका मतलब है कि अगर कोई कंपनी बंद होती है या उसका पुनर्गठन होता है, तब भी कर्मचारियों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे। यह संतुलन बनाए रखने की कोशिश है ताकि आर्थिक सुधार के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी निभाई जा सके।
नियमों का गलत इस्तेमाल करने पर सख्त सजा
सरकार ने इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त जुर्माने का भी प्रावधान किया है।
- गलत तरीके से प्रक्रिया रोकने पर रोजाना कम से कम 1 लाख रुपये का जुर्माना लग सकता है
- अगर किसी ने गलत तरीके से फायदा उठाया है, तो उससे तीन गुना तक रकम वसूली जा सकती है
- गंभीर मामलों में अधिकतम 5 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है
इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि IBC का इस्तेमाल सिर्फ सही मकसद के लिए ही हो।
छोटी कंपनियों को बड़ी राहत
नए सिस्टम में छोटी कंपनियों के लिए भी राहत की व्यवस्था की गई है। अब वे कोर्ट के बाहर समझौता करके अपने मामलों को सुलझा सकती हैं। इससे उन्हें लंबी और महंगी कानूनी प्रक्रिया से बचने में मदद मिलेगी।
IBC क्यों है इतना जरूरी?
2016 में लागू हुआ IBC भारत का प्रमुख कानून है, जो कंपनियों, व्यक्तियों और फर्मों के दिवालिया मामलों को तय समय में सुलझाने के लिए बनाया गया है। इससे पहले ऐसे मामलों को सुलझाने में कई साल लग जाते थे।
IBC आने के बाद एक तय प्रक्रिया बनी, जिससे बैंकों को पैसा वापस मिलने लगा और अर्थव्यवस्था में स्थिरता आई।
कितनी बार बदला जा चुका है कानून?
यह कानून पहली बार 2016 में लागू हुआ था। इसके बाद बदलती जरूरतों के अनुसार इसमें लगातार सुधार किए गए हैं। अब तक इसमें 7 बार संशोधन हो चुके हैं। हालिया संशोधन बिल को अगस्त 2025 में पेश किया गया था और दिसंबर 2025 में समिति की रिपोर्ट के बाद इसे पास किया गया।
आगे क्या संकेत मिलते हैं?
यह नया संशोधन साफ तौर पर दिखाता है कि सरकार आर्थिक सुधारों को लेकर गंभीर है। अगर यह बदलाव सही तरीके से लागू होते हैं, तो इससे न केवल बैंकों को राहत मिलेगी बल्कि कंपनियों को भी समय पर समाधान मिल सकेगा।

