भारत में पिछले कुछ सालों से सड़क और हाईवे निर्माण तेजी से बढ़ा था। नई सड़कों, एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों का जाल तेजी से फैल रहा था। लेकिन अब इस रफ्तार पर असर पड़ता दिख रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि 2026-27 में हाईवे निर्माण की गति धीमी हो सकती है और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में जारी संकट है।
यह संकट सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर भारत के निर्माण कार्यों पर भी पड़ रहा है। खासकर सड़क बनाने में इस्तेमाल होने वाले जरूरी कच्चे माल की कमी और बढ़ती लागत ने स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
घटती रफ्तार के आंकड़े क्या कहते हैं?
हालिया आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि सड़क निर्माण की गति पहले जैसी नहीं रही है।
- 2023-24 में रोजाना औसतन 33.83 किमी सड़क बन रही थी
- 2024-25 में यह घटकर 29.21 किमी रह गई
- 2025-26 में (मार्च के तीसरे सप्ताह तक) यह और गिरकर 23.74 किमी प्रतिदिन हो गई
विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2026-27 में यह रफ्तार और घटकर करीब 21-22 किमी प्रतिदिन रह सकती है। यह गिरावट अचानक नहीं आई है, बल्कि कई कारणों का परिणाम है, जिनमें सबसे बड़ा कारण कच्चे माल की कमी है।

बिटुमेन की कमी बना सबसे बड़ा संकट
सड़क निर्माण में सबसे जरूरी सामग्री बिटुमेन होती है, जो पेट्रोलियम से बनती है और सड़क की ऊपरी परत तैयार करने में इस्तेमाल होती है। इस समय देश में बिटुमेन की भारी कमी देखी जा रही है। ठेकेदारों का कहना है कि उन्हें जितनी जरूरत होती है, उसका केवल एक छोटा हिस्सा ही मिल पा रहा है।
अगर किसी प्रोजेक्ट को 10 ट्रक बिटुमेन चाहिए, तो उन्हें सिर्फ 2 ट्रक ही मिल रहे हैं। यह स्थिति खासकर तब और गंभीर हो जाती है जब निर्माण का पीक सीजन चल रहा होता है, यानी मानसून से पहले का समय।
कीमतों में तेज उछाल
बिटुमेन की कमी का सीधा असर उसकी कीमत पर पड़ा है। पहले जो बिटुमेन करीब 40,000 रुपये प्रति टन मिलता था, उसकी कीमत अब बढ़कर लगभग 65,000 रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है। यानी 20 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। इसके अलावा डीजल, स्टील और अन्य निर्माण सामग्री की कीमतें भी 15 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। इससे पूरे प्रोजेक्ट की लागत पर भारी दबाव पड़ा है।
मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर
भारत में बिटुमेन की खपत लगातार बढ़ रही है। 2025 में देश ने लगभग 8.74 मिलियन टन बिटुमेन का उपयोग किया, जबकि घरेलू उत्पादन सिर्फ 5 मिलियन टन के आसपास ही है। इसका मतलब है कि देश में हर साल बड़ी मात्रा में बिटुमेन की कमी रहती है, जिसे आयात से पूरा किया जाता है।
आयात पर बढ़ती निर्भरता
भारत अपनी जरूरत का करीब 40% बिटुमेन विदेशों से मंगाता है। इसमें से लगभग 95% सप्लाई खाड़ी देशों से आती है। पहले ईरान से भी बड़ी मात्रा में बिटुमेन आता था, लेकिन प्रतिबंधों के कारण यह रास्ता मुश्किल हो गया है। अब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों में रुकावट के कारण आयात और महंगा और अनिश्चित हो गया है।
क्यों कम हो रहा घरेलू उत्पादन?
देश में रिफाइनरियां ज्यादा मुनाफे वाले उत्पाद जैसे पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल पर ध्यान देती हैं। बिटुमेन की तुलना में इन उत्पादों से ज्यादा कमाई होती है, इसलिए रिफाइनरियां बिटुमेन उत्पादन को प्राथमिकता नहीं देतीं। इसके अलावा नई तकनीक के जरिए बिटुमेन को भी दूसरे ईंधनों में बदला जा रहा है, जिससे इसकी उपलब्धता और कम हो रही है।
परियोजनाओं पर क्या असर पड़ेगा?
कच्चे माल की कमी और बढ़ती लागत का सीधा असर सड़क परियोजनाओं पर पड़ रहा है।
- कई प्रोजेक्ट धीमे हो गए हैं
- मेंटेनेंस के काम सबसे ज्यादा प्रभावित हैं
- ठेकेदारों को तय कीमत वाले कॉन्ट्रैक्ट में नुकसान उठाना पड़ रहा है
विशेषज्ञों के अनुसार, कुल मिलाकर हाईवे प्रोजेक्ट्स की लागत में करीब 8% तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
कंपनियों के मुनाफे पर दबाव
बढ़ती लागत का असर कंपनियों के मुनाफे पर भी दिखेगा। अनुमान है कि 2026-27 में रोड डेवलपर्स के मुनाफे में 1 से 1.5 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। यह गिरावट छोटी कंपनियों के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि उनके पास लागत बढ़ने का ज्यादा विकल्प नहीं होता।
सरकार के कदम
स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं।
- ठेकेदारों को हर महीने भुगतान की सुविधा दी गई है
- लागत में बदलाव को जल्दी लागू करने के लिए समय सीमा घटाकर 3 महीने से 1 महीने कर दी गई है
इससे ठेकेदारों को थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
क्या नया विकल्प है?
बिटुमेन की कमी से निपटने के लिए कुछ नए विकल्प भी तलाशे जा रहे हैं। जैसे CSIR-CRRI ने कृषि अवशेष से बनने वाले बायो-बिटुमेन का परीक्षण किया है। अगर इसका 15% उपयोग किया जाए तो देश को हर साल करीब 4,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचत हो सकती है।
हालांकि, अभी इसे बड़े स्तर पर अपनाने में समय लगेगा क्योंकि कंपनियां नई तकनीक को तुरंत लागू करने में हिचकिचा रही हैं।
समय भी बना चुनौती
सड़क निर्माण का सबसे अहम समय फरवरी से जून के बीच होता है। इस दौरान ज्यादा काम पूरा किया जाता है क्योंकि मानसून आने के बाद काम धीमा हो जाता है। अगर इसी समय कच्चे माल की कमी हो जाए, तो कई प्रोजेक्ट एक साथ रुक सकते हैं।
भविष्य की चिंता
अगर पश्चिम एशिया का संकट लंबे समय तक चलता है, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।
- सप्लाई और महंगी हो सकती है
- प्रोजेक्ट में देरी बढ़ सकती है
- लागत और बढ़ सकती है
इसका असर न केवल निर्माण कंपनियों पर पड़ेगा, बल्कि देश के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर भी पड़ेगा।
निष्कर्ष:
भारत का सड़क निर्माण क्षेत्र एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां बाहरी परिस्थितियां उसके भविष्य को प्रभावित कर रही हैं। अब यह साफ हो गया है कि सिर्फ घरेलू नीतियों से ही नहीं, बल्कि वैश्विक घटनाओं से भी इंफ्रास्ट्रक्चर विकास प्रभावित होता है। सरकार और उद्योग दोनों को मिलकर इस चुनौती का समाधान ढूंढना होगा, ताकि विकास की रफ्तार बनी रहे।

