भारत और अज़रबैजान फिर आए करीब, क्या खत्म हुई दोनों देशों की दूरियां?

करीब एक साल तक चले तनाव और मतभेदों के बाद भारत और अज़रबैजान ने अपने रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने अज़रबैजान की राजधानी बाकू में अहम बैठक कर द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की और आगे के सहयोग को बढ़ाने पर चर्चा की। यह बैठक इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए थे।

India - Azerbaijan Relations

लंबे समय बाद हुई अहम बातचीत
यह बैठक भारत के विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज और अज़रबैजान के उप विदेश मंत्री एलनूर मम्मादोव के बीच हुई। इसे फॉरेन ऑफिस कंसल्टेशन का छठा दौर बताया जा रहा है। खास बात यह है कि इस तरह की व्यापक बातचीत 2022 के बाद पहली बार हुई है।

बैठक में दोनों देशों ने अपने संबंधों को हर पहलू से देखा और यह समझने की कोशिश की कि किन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जा सकता है और किन मुद्दों पर मतभेद हैं। दोनों पक्षों ने यह भी माना कि बातचीत और सहयोग ही आगे बढ़ने का सबसे सही रास्ता है।

 

किन-किन मुद्दों पर हुई चर्चा?

इस बातचीत में कई अहम क्षेत्रों को शामिल किया गया। दोनों देशों ने व्यापार, तकनीक, पर्यटन, दवा उद्योग, ऊर्जा, संस्कृति और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की। इसके साथ ही सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को भी उठाया गया, जो इस बैठक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।

भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि पिछले साल कुछ घटनाओं के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था। अब इस विषय पर बातचीत होना इस बात का संकेत है कि दोनों देश पुराने मतभेदों को पीछे छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

 

तनाव की जड़ क्या थी?

भारत और अज़रबैजान के बीच तनाव की शुरुआत उस समय हुई जब भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के ठिकानों पर कार्रवाई की थी। इस ऑपरेशन को भारत ने अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी बताया था, लेकिन अज़रबैजान ने इस पर आपत्ति जताई थी।

अज़रबैजान ने उस समय बयान जारी कर पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की आलोचना की थी और संयम बरतने की अपील की थी। इस रुख से भारत नाराज हुआ था, क्योंकि वह इसे अपने आंतरिक मामलों में दखल के रूप में देख रहा था।

इसके अलावा, अज़रबैजान और पाकिस्तान के बीच करीबी संबंध भी एक कारण बने। पाकिस्तान ने अज़रबैजान का समर्थन किया है, खासकर नागोर्नो-काराबाख विवाद में, जहां उसका टकराव आर्मेनिया से रहा है। वहीं भारत के आर्मेनिया के साथ संबंध बेहतर रहे हैं, जिससे दोनों देशों के बीच दूरी बढ़ी।

 

आरोप-प्रत्यारोप का दौर

तनाव उस समय और बढ़ गया जब अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने भारत पर आरोप लगाया कि उसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अज़रबैजान को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। उन्होंने यह भी कहा कि उनके लिए पाकिस्तान के साथ रिश्ते ज्यादा अहम हैं।

इन बयानों के बाद दोनों देशों के संबंधों में ठंडापन आ गया था और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत भी कम हो गई थी।

 

अब क्यों बदल रहा है माहौल?

हालांकि, हाल के महीनों में स्थिति में सुधार देखने को मिला है। दोनों देशों ने महसूस किया कि आपसी सहयोग से ही दोनों को फायदा हो सकता है। इसी सोच के साथ दोनों ने बातचीत को फिर से शुरू किया।

भारत के नए राजदूत अभय कुमार की नियुक्ति और उनकी अज़रबैजान सरकार के अधिकारियों से मुलाकातों ने भी माहौल को बेहतर बनाने में मदद की है।

 

भारत के लिए क्यों अहम है अज़रबैजान?

अज़रबैजान भारत के लिए खास तौर पर ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। हाल ही में अज़रबैजान ने भारत को फिर से कच्चे तेल की आपूर्ति शुरू की है। भारत को अज़रबैजान से होने वाला लगभग 98% निर्यात तेल से ही जुड़ा है।

इसके अलावा, भारत की सरकारी कंपनी ओएनजीसी विदेश का अज़रबैजान में तेल और गैस परियोजनाओं में निवेश है। इससे दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग मजबूत होता है।

 

मानवीय सहयोग ने बढ़ाई नजदीकी

हाल ही में एक और घटना ने दोनों देशों के रिश्तों को सुधारने में मदद की। जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा और ईरान में हालात बिगड़े, तब 200 से ज्यादा भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालने में अज़रबैजान ने मदद की।

भारत ने इस सहयोग के लिए अज़रबैजान का आभार जताया। यह कदम दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ाने में अहम साबित हुआ।

 

मतभेद अब भी हैं, लेकिन रास्ता खुला है

बैठक के दौरान दोनों देशों ने यह स्वीकार किया कि कुछ मुद्दों पर उनके विचार अलग हैं। लेकिन उन्होंने यह भी माना कि इन मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है।

यह एक सकारात्मक संकेत है क्योंकि पहले इन मुद्दों पर खुलकर चर्चा नहीं हो रही थी। अब दोनों पक्ष खुलकर अपनी बात रख रहे हैं और समाधान की दिशा में बढ़ रहे हैं।

 

क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा

इस बैठक में सिर्फ द्विपक्षीय संबंध ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा हुई। खासकर पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और सुरक्षा हालात पर दोनों देशों ने अपने विचार साझा किए।

दोनों पक्षों ने यह माना कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखना जरूरी है और इसके लिए मिलकर प्रयास करने की जरूरत है।

 

आगे की रणनीति क्या है?

बैठक के अंत में दोनों देशों ने तय किया कि वे अपनी बातचीत को जारी रखेंगे और अगली बैठक भारत में आयोजित की जाएगी। इससे यह साफ है कि दोनों देश अपने संबंधों को मजबूत बनाने के लिए लगातार प्रयास करेंगे।

इसके अलावा, व्यापार, निवेश और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी जोर दिया जाएगा, ताकि रिश्तों को और गहराई दी जा सके।

 

क्या पूरी तरह खत्म हो गया तनाव?

हालांकि बातचीत और सहयोग की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी मतभेद पूरी तरह खत्म हो गए हैं। कई मुद्दे अभी भी ऐसे हैं, जिन पर दोनों देशों के विचार अलग हैं।

लेकिन सबसे अहम बात यह है कि अब दोनों देश इन मुद्दों पर बातचीत करने के लिए तैयार हैं। यही किसी भी मजबूत रिश्ते की नींव होती है।

 

निष्कर्ष:

भारत और अज़रबैजान के बीच हालिया बातचीत यह दिखाती है कि दोनों देश अपने रिश्तों को नई दिशा देना चाहते हैं। ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं काफी हैं।

पिछले एक साल के तनाव के बाद यह एक सकारात्मक शुरुआत है, लेकिन आगे का रास्ता बातचीत और भरोसे पर ही निर्भर करेगा।

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