भारत ने 2028 में होने वाले वैश्विक जलवायु सम्मेलन COP33 की मेजबानी करने का प्रस्ताव हाल ही में वापस ले लिया है। यह फैसला अचानक आया है और इससे देश के जलवायु नेतृत्व को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस निर्णय की जानकारी आधिकारिक रूप से कुछ दिन पहले दी गई, हालांकि अभी तक सरकार की ओर से सार्वजनिक रूप से स्पष्ट बयान नहीं आया है।
कैसे शुरू हुई थी मेजबानी की पहल?
साल 2023 में दुबई में आयोजित जलवायु सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि भारत 2028 में COP33 सम्मेलन की मेजबानी करना चाहता है। यह घोषणा COP28 के मंच से की गई थी।
इसके बाद भारत सरकार ने इस आयोजन की तैयारी के लिए एक उच्च स्तरीय समिति भी बनाई थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत के इस प्रस्ताव को अच्छा समर्थन मिला था, खासकर विकासशील देशों और BRICS समूह ने इसका स्वागत किया था।
अचानक क्यों बदला फैसला?
सूत्रों के मुताबिक, 2 अप्रैल को एशिया-प्रशांत समूह के अध्यक्ष को भेजे गए एक पत्र में भारत ने अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की जानकारी दी। इस पत्र में कहा गया कि 2028 के लिए देश की अन्य प्राथमिकताओं को देखते हुए यह फैसला लिया गया है।
हालांकि, इस निर्णय के पीछे के कारणों को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। कई अधिकारियों का कहना है कि यह फैसला “ऊपरी स्तर” पर लिया गया है और उन्हें भी पूरी जानकारी नहीं है।
संभावित कारण क्या हो सकते हैं?
विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों के अनुसार, इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं:
1. बड़े आयोजनों का दबाव: 2028 के आसपास भारत में अन्य बड़े कार्यक्रमों की योजना हो सकती है। उदाहरण के तौर पर 2030 में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े आयोजन की तैयारी भी उसी समय चल सकती है। ऐसे में सरकार एक साथ इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों को संभालने से बचना चाहती है।
2. चुनावी साल का असर: 2029 में लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में सरकार शायद किसी बड़े और जटिल अंतरराष्ट्रीय आयोजन में उलझना नहीं चाहती, जो दो हफ्तों तक चलता है और जिसमें करीब 200 देशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
3. जलवायु प्रतिबद्धताओं का दबाव: कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि COP की मेजबानी करने से देश पर जलवायु लक्ष्यों को लेकर अतिरिक्त दबाव आता है। भारत पहले से ही अपने जलवायु लक्ष्यों (NDC) को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवालों का सामना कर रहा है। ऐसे में सरकार शायद अतिरिक्त जिम्मेदारियों से बचना चाहती है।

COP क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?
UNFCCC के तहत होने वाला COP (Conference of the Parties) दुनिया का सबसे बड़ा जलवायु मंच है। इसमें हर साल लगभग 200 देश शामिल होते हैं।
इस मंच पर देश:
- जलवायु परिवर्तन पर अपनी प्रगति की समीक्षा करते हैं
- नए समझौते करते हैं
- अपने लक्ष्य (NDCs) अपडेट करते हैं
यह प्रक्रिया 1992 के रियो अर्थ समिट से शुरू हुई थी और बाद में क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता के जरिए और मजबूत हुई।
मेजबानी क्यों होती है खास?
COP सम्मेलन की मेजबानी हर साल अलग-अलग देशों को मिलती है और यह पांच क्षेत्रों के बीच घूमती रहती है। 2028 का COP33 एशिया-प्रशांत क्षेत्र के किसी देश को मिलना है।
भारत इससे पहले 2002 में COP8 की मेजबानी कर चुका है। अगर भारत COP33 की मेजबानी करता, तो यह दूसरा मौका होता।
भारत के लिए क्या मायने थे?
COP जैसे बड़े आयोजन भारत के लिए कई तरह से अहम होते हैं:
1. वैश्विक नेतृत्व दिखाने का मौका: भारत खुद को “ग्लोबल साउथ” की आवाज के रूप में पेश करता रहा है। COP की मेजबानी से यह छवि और मजबूत होती।
2. जलवायु उपलब्धियों को दिखाने का मंच: भारत अपनी नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और अन्य पहल को दुनिया के सामने रख सकता था।
3. फाइनेंस और सहयोग: इस मंच के जरिए भारत जलवायु फाइनेंस, खासकर “लॉस एंड डैमेज फंड” जैसे मुद्दों पर विकसित देशों से समर्थन मांग सकता था।
4. क्षेत्रीय मुद्दों को उठाने का मौका: दक्षिण एशिया जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में से एक है। भारत इस मंच के जरिए क्षेत्र की समस्याओं को दुनिया के सामने रख सकता था।
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
कई जलवायु विशेषज्ञ इस फैसले को “चूका हुआ मौका” मान रहे हैं।
एक विशेषज्ञ के अनुसार, भारत ने तेजी से हरित ऊर्जा की दिशा में काम किया है और COP33 उसके लिए अपनी उपलब्धियों को दिखाने का बड़ा मंच हो सकता था।
दूसरे विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से भारत का वैश्विक जलवायु नेतृत्व कमजोर पड़ सकता है। साथ ही, विकासशील देशों की आवाज को भी नुकसान हो सकता है, क्योंकि भारत अक्सर इन देशों के पक्ष में मजबूत भूमिका निभाता रहा है।
अब आगे क्या होगा?
भारत के पीछे हटने के बाद अब 2028 के COP33 की मेजबानी को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। फिलहाल दक्षिण कोरिया ही ऐसा देश है जिसने इसमें रुचि दिखाई है। अंतिम फैसला इस साल के अंत तक लिया जा सकता है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस पर आश्चर्य जताते हुए कहा कि यह सरकार के एजेंडे में महत्वपूर्ण था, खासकर चुनाव से पहले के माहौल को देखते हुए।
निष्कर्ष:
भारत का COP33 की मेजबानी से पीछे हटना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह देश की वैश्विक जलवायु रणनीति पर भी असर डाल सकता है। एक तरफ यह निर्णय सरकार के लिए व्यावहारिक और रणनीतिक हो सकता है, वहीं दूसरी तरफ यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की भूमिका को सीमित भी कर सकता है।

