7 साल बाद फिर ईरान से तेल खरीद रहा भारत – यह राहत है या नई चुनौती की शुरुआत?

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल के बीच भारत ने एक अहम कदम उठाया है। लगभग सात साल के अंतराल के बाद भारत ने फिर से ईरान से कच्चा तेल खरीदना शुरू कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब एक तरफ तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

शिपिंग डेटा के अनुसार, ‘जया’ नाम का एक टैंकर ईरानी कच्चा तेल लेकर भारत की ओर बढ़ रहा है। शुरुआत में यह जहाज गुजरात के वाडिनार पोर्ट की तरफ आ रहा था और इसमें करीब 6 लाख बैरल तेल भरा हुआ था। लेकिन अचानक इसकी दिशा बदलकर चीन की ओर कर दी गई थी। उस समय खबरें आई थीं कि भुगतान से जुड़ी समस्याओं के कारण जहाज भारत नहीं आ रहा है, हालांकि भारत के तेल मंत्रालय ने इन दावों को खारिज कर दिया था।

अब यह टैंकर दोबारा भारत की ओर मुड़ गया है और फिलहाल मलेशिया के आसपास समुद्र में है। अनुमान है कि यह सप्ताह के अंत तक भारत के पूर्वी तट पर पहुंच सकता है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर भारत-ईरान ऊर्जा संबंधों को चर्चा में ला दिया है।

 

अमेरिका की सीमित छूट ने बदली स्थिति

भारत का यह कदम सीधे तौर पर अमेरिका की ओर से दी गई सीमित छूट से जुड़ा हुआ है। अमेरिका ने हाल ही में 30 दिनों के लिए कुछ राहत दी है, जिसके तहत समुद्र में मौजूद ईरानी तेल को खरीदा जा सकता है। यह छूट 19 अप्रैल तक लागू है।

यह समझना जरूरी है कि यह पूरी तरह से प्रतिबंध हटाने जैसा नहीं है। अमेरिका ने 2018 से ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए हुए हैं, जिनके तहत अगर कोई देश सीधे ईरान से तेल खरीदता है, तो उस पर सेकेंडरी सैंक्शन लग सकते हैं। यानी उस देश की कंपनियों को भी अमेरिकी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

ऐसे में यह 30 दिन की छूट एक अस्थायी व्यवस्था है, जिसका मकसद केवल यह है कि वैश्विक तेल बाजार में संतुलन बना रहे और कीमतें ज्यादा न बढ़ें। इस दौरान देश नए बड़े समझौते नहीं कर सकते, बल्कि केवल पहले से समुद्र में मौजूद तेल ही खरीद सकते हैं।

 

भारत क्यों फिर लौटा ईरानी तेल की ओर?

2018 से पहले भारत, ईरान का एक बड़ा ग्राहक था। उस समय भारत रोजाना करीब 5.18 लाख बैरल ईरानी तेल आयात करता था, जो कुल आयात का लगभग 11.5 प्रतिशत था। ईरानी तेल सस्ता होने के कारण भारतीय रिफाइनरियों के लिए यह एक किफायती विकल्प था।

लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत को यह खरीद बंद करनी पड़ी और उसे अन्य देशों पर निर्भर होना पड़ा। अब जब तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और सप्लाई में अनिश्चितता है, तो भारत ने फिर से ईरानी तेल की ओर रुख किया है।

मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण तेल की कीमतों में अचानक उछाल आया। रिपोर्ट्स के अनुसार, फरवरी 2026 में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत करीब 69 डॉलर प्रति बैरल थी, जो मार्च में बढ़कर 113 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इस बढ़ोतरी का सीधा असर भारतीय तेल कंपनियों और आम उपभोक्ताओं पर पड़ा।

ऐसे में सस्ता ईरानी तेल भारत के लिए राहत का कारण बन सकता है।

India buying oil from Iran again after 7 years

पेमेंट सिस्टम भी है बड़ा मुद्दा

ईरान से तेल खरीदने में सबसे बड़ी चुनौती भुगतान की रहती है। आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर का इस्तेमाल होता है, लेकिन ईरान पर लगे प्रतिबंधों के कारण डॉलर के जरिए भुगतान करना जोखिम भरा होता है।

पहले भारत ने रुपया-रियाल सिस्टम का इस्तेमाल किया था, जिससे बिना अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम के भुगतान किया जा सके। इस बार भी इसी तरह के वैकल्पिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है, ताकि नियमों का उल्लंघन न हो।

 

रूस से भी बढ़ाई खरीद

ईरान के साथ-साथ भारत ने रूस से भी तेल खरीद बढ़ा दी है। डेटा के अनुसार, संघर्ष बढ़ने के बाद एक ही हफ्ते में भारत ने करीब 30 मिलियन बैरल रूसी तेल खरीदा। 24 मार्च तक रूस से आयात बढ़कर लगभग 1.9 मिलियन बैरल प्रति दिन हो गया, जबकि फरवरी में यह करीब 1 मिलियन बैरल प्रति दिन था।

यह दिखाता है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक ही देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि अलग-अलग स्रोतों से सप्लाई सुनिश्चित कर रहा है।

 

होर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का कारण

मिडिल ईस्ट के मौजूदा हालात में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से भारत का लगभग 35 से 50 प्रतिशत कच्चा तेल और ज्यादातर LPG गुजरता है।

तनाव के कारण यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिलहाल 17 भारतीय जहाज इस रास्ते में फंसे हुए हैं और सुरक्षित रास्ते का इंतजार कर रहे हैं। वहीं सात जहाज हाल ही में इस क्षेत्र से गुजर चुके हैं।

इस स्थिति को देखते हुए भारत ने अमेरिकी नौसेना के गठबंधन में शामिल होने के बजाय सीधे ईरान से बातचीत का रास्ता चुना है, ताकि अपने जहाजों और सप्लाई को सुरक्षित रखा जा सके।

 

LPG सप्लाई भी जारी

ईरान से केवल कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि LPG की सप्लाई भी भारत आ रही है। हाल ही में करीब 44,000 मीट्रिक टन LPG लेकर एक जहाज मैंगलोर पोर्ट पहुंचा, जहां फिलहाल ईंधन उतारने का काम चल रहा है।

यह दिखाता है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए हर संभव विकल्प का इस्तेमाल कर रहा है।

 

आगे की राह क्या होगी?

फिलहाल अमेरिका की छूट 19 अप्रैल तक ही है, जिससे साफ है कि यह कोई स्थायी समाधान नहीं है। भारत के लिए यह एक अस्थायी राहत जरूर है, लेकिन लंबी अवधि की रणनीति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।

भारत को एक तरफ सस्ते तेल की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर उसे अंतरराष्ट्रीय नियमों और प्रतिबंधों का भी ध्यान रखना होगा। ऐसे में संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है।

 

निष्कर्ष:

ईरान से तेल खरीद की शुरुआत भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जो मौजूदा हालात में राहत दे सकता है। लेकिन यह फैसला कई जोखिमों और अनिश्चितताओं के साथ भी आता है।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत इस अवसर का फायदा उठाकर अपनी ऊर्जा लागत कम कर पाएगा या फिर वैश्विक राजनीति और प्रतिबंधों के कारण उसे फिर से पीछे हटना पड़ेगा।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *