False Promise of Marriage को लेकर पटना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसने लंबे समय से चल रही कानूनी बहस को नई दिशा दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हर बार शादी का वादा टूटने पर रेप का मामला नहीं बनता। यदि शुरुआत से ही शादी का वादा धोखे से किया गया हो और उसका मकसद केवल शारीरिक संबंध बनाना हो, तभी महिला की सहमति (Consent) कानूनी रूप से अमान्य मानी जा सकती है। यह फैसला न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह (Justice Purnendu Singh) की एकल पीठ ने पश्चिम चंपारण की अदालत द्वारा दिए गए रेप के दोषसिद्धि आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनाया।
क्या है पटना हाई कोर्ट का फैसला?
पटना हाई कोर्ट ने कहा कि शादी का वादा तभी “False Promise of Marriage” माना जाएगा, जब शुरुआत से ही आरोपी की शादी करने की कोई मंशा न हो और उसने केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए झूठा वादा किया हो। यदि रिश्ता सहमति से चला और बाद में किसी कारण शादी नहीं हो सकी, तो केवल वादा टूटने से रेप का अपराध स्वतः सिद्ध नहीं होता।
False Promise of Marriage पर पटना हाई कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने कहा कि किसी महिला की सहमति तभी मान्य होगी जब यह साबित हो कि–
- आरोपी ने शुरुआत से ही झूठा वादा किया था।
- शादी करने की उसकी कोई वास्तविक मंशा नहीं थी।
- वादा केवल महिला को शारीरिक संबंध के लिए तैयार करने के उद्देश्य से किया गया था।
- महिला ने उसी झूठे वादे पर भरोसा करके संबंध बनाए।
यदि इन तथ्यों को साबित नहीं किया जा सके, तो केवल बाद में शादी से इनकार करना रेप की श्रेणी में नहीं आएगा।

क्या था पूरा मामला?
यह मामला बिहार के पश्चिम चंपारण जिले का है। शिकायतकर्ता और आरोपी एक ही गांव के रहने वाले थे। महिला का आरोप था कि आरोपी ने शादी का वादा कर करीब एक वर्ष तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।बाद में महिला गर्भवती हो गई। आरोप है कि इसके बाद आरोपी ने शादी करने से इनकार कर दिया और किसी दूसरी महिला से विवाह कर लिया। इसके बाद वर्ष 2009 में एफआईआर दर्ज हुई। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत दोषी मानते हुए 7 साल की कठोर कैद और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
अदालत ने आरोपी को क्यों बरी किया?
पटना हाई कोर्ट ने पूरे मामले की दोबारा समीक्षा की और पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी ने शुरुआत से ही धोखे से शादी का वादा किया था।
अदालत ने कहा–
- दोनों के बीच लगभग एक वर्ष तक सहमति से संबंध रहे।
- कहीं भी जबरदस्ती या दबाव का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला।
- मेडिकल जांच में हालिया यौन हिंसा के संकेत नहीं मिले।
- गर्भस्थ शिशु का DNA आरोपी से मैच नहीं कराया गया।
- वैज्ञानिक साक्ष्य की कमी के कारण अभियोजन का मामला कमजोर रह गया।
इन्हीं कारणों से अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
Consent और False Promise में क्या अंतर है?
पटना हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि Consent और False Promise of Marriage दोनों अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं।यदि दो वयस्क अपनी इच्छा से लंबे समय तक रिश्ते में रहते हैं और बाद में किसी कारण शादी नहीं हो पाती, तो इसे स्वतः रेप नहीं माना जा सकता।लेकिन यदि शुरुआत से ही आरोपी का उद्देश्य केवल झूठा वादा करके महिला की सहमति प्राप्त करना था, तो ऐसी सहमति Section 90 IPC के तहत Misconception of Fact मानी जा सकती है और मामला रेप की श्रेणी में आ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले क्या कहा है?
पटना हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि–
- हर टूटा हुआ प्रेम संबंध अपराध नहीं होता।
- हर असफल विवाह का वादा रेप नहीं बन जाता।
- अदालतों को यह देखना होगा कि क्या शुरुआत से ही धोखा देने की मंशा थी।
यदि संबंध वास्तविक था और बाद में परिस्थितियां बदल गईं, तो उसे आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।
इस फैसले का कानूनी महत्व
यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में Consent Law India और Rape Law India को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि–
- महिलाओं को धोखे से बनाए गए संबंधों से कानून संरक्षण देगा।
- लेकिन आपसी सहमति से बने रिश्ते के बाद हर विवाद को रेप का मामला नहीं माना जाएगा।
- अदालतें हर मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर फैसला करेंगी।
निष्कर्ष
False Promise of Marriage से जुड़े मामलों में पटना हाई कोर्ट का यह फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल शादी का वादा टूट जाना रेप का अपराध नहीं बनाता। यदि यह साबित हो कि शुरुआत से ही झूठे वादे के जरिए महिला की सहमति ली गई थी, तभी कानून के तहत रेप का मामला बन सकता है। यह फैसला महिलाओं की सुरक्षा और आपसी सहमति वाले रिश्तों के बीच कानूनी संतुलन बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है
FAQs:
पटना हाई कोर्ट ने कहा कि हर शादी का वादा टूटने पर रेप का मामला नहीं बनता। शुरुआत से धोखाधड़ी की मंशा साबित होना जरूरी है।
जब आरोपी शुरुआत से ही शादी करने का इरादा न रखता हो और केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए झूठा वादा करे।
सहमति तभी अमान्य होगी जब वह झूठे वादे या तथ्य की गलतफहमी के कारण प्राप्त की गई हो। केवल रिश्ता टूट जाना पर्याप्त नहीं है।
नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल शादी न होना या रिश्ता खत्म होना रेप का अपराध नहीं बनाता।
यह फैसला बताता है कि अदालतें हर मामले में आरोपी की शुरुआती मंशा, महिला की सहमति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लेंगी।

