Bombay High Court Maharashtra FDA : बॉम्बे हाईकोर्ट की महाराष्ट्र FDA को फटकार, कैडिला की दवाओं पर रोक हटेगी – जानिए क्या है पूरा मामला ?
Bombay High Court Maharashtra FDA : महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की ओर से कैडिला फार्मास्युटिकल्स की कुछ दवाओं की बिक्री और वितरण रोकने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने
Bombay High Court Maharashtra FDA : महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की ओर से कैडिला फार्मास्युटिकल्स की कुछ दवाओं की बिक्री और वितरण रोकने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने FDA की कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि “पहले गोली चलाना और बाद में सवाल पूछना” Wild West का नियम हो सकता है, लेकिन कानून में इसकी जगह नहीं है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद महाराष्ट्र FDA ने कैडिला के खिलाफ जारी मौजूदा स्टॉप-सेल आदेश (Stop-Sale Orders) वापस लेने पर सहमति जताई। FDA ने कोर्ट को भरोसा दिया कि आगे अगर कंपनी के खिलाफ कोई कार्रवाई करनी होगी तो पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।
मामले की सुनवाई बॉम्बे हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस आरवी घुगे और जस्टिस गौतम अंखड की पीठ कर रही थी। कैडिला ने FDA के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनके तहत उसकी कुछ दवाओं का स्टॉक जब्त करने और उनकी बिक्री व वितरण रोकने के निर्देश दिए गए थे।
कैडिला की दवाओं पर FDA ने क्यों लगाई थी रोक?
महाराष्ट्र FDA ने कैडिला की कुछ दवाओं के स्टॉक को जब्त किया था और उनकी बिक्री व वितरण रोक दिया था। FDA की दलील थी कि कैडिला के कुछ उत्पादों की ब्रांडिंग एक जैसी या मिलती-जुलती है, जबकि उनमें अलग-अलग एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) यानी दवा में काम करने वाले मुख्य औषधीय पदार्थ मौजूद हैं।
FDA का कहना था कि ऐसी समान ब्रांडिंग से मरीज या डॉक्टर एक दवा को दूसरी दवा समझ सकते हैं। इससे Medication Error यानी गलत दवा लिए जाने या दिए जाने का जोखिम पैदा हो सकता है।
FDA का तर्क था कि दवाओं की पहचान में इस तरह की समानता सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। इसलिए उसने नियामकीय कार्रवाई करते हुए संबंधित दवाओं की बिक्री और वितरण रोकने का फैसला लिया।
कैडिला की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बीरेंद्र सराफ ने इन आदेशों को रद्द करने की मांग की। उनका कहना था कि FDA की कार्रवाई से कंपनी को काफी वित्तीय नुकसान हुआ है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी मुख्य चिंता कंपनी को हुए आर्थिक नुकसान को लेकर नहीं है।
कोर्ट ने कहा- 20 दिन दवा नहीं मिली, असली चिंता मरीजों की है
सुनवाई के दौरान एक्टिंग चीफ जस्टिस आरवी घुगे ने कहा कि अदालत की चिंता कैडिला के वित्तीय नुकसान को लेकर नहीं है। चिंता यह है कि जिस दवा की बिक्री रोक दी गई, वह मरीजों को उपलब्ध नहीं हो पाई।
कोर्ट ने कहा कि संबंधित दवा 20 दिनों तक बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं थी और सुनवाई के दिन तक प्रभावी रूप से यह अवधि 32 दिन हो चुकी थी।
यानी कोर्ट ने इस मामले को केवल कंपनी और नियामक के बीच विवाद के रूप में नहीं देखा, बल्कि यह सवाल भी उठाया कि नियामकीय कार्रवाई का असर उन मरीजों पर क्या पड़ा जिन्हें संबंधित दवा की जरूरत थी।
यही वजह है कि पीठ ने FDA की कार्रवाई के तरीके और उसकी proportionality यानी कार्रवाई कितनी जरूरी और उचित थी, इस पर सवाल उठाया।
‘पहले गोली, फिर सवाल’ वाली टिप्पणी क्यों की?
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने FDA के रवैये की तुलना Wild West से की। पीठ ने कहा कि “Shooting first and asking questions later” यानी पहले कार्रवाई करना और बाद में सवाल पूछना Wild West का नियम हो सकता है, लेकिन कानून के क्षेत्र में यह तरीका लागू नहीं हो सकता।
कोर्ट ने आगे कहा कि नियामक व्यवस्था में भी पहले कठोर कार्रवाई कर देना और बाद में कारण पूछना सही तरीका नहीं है।
पीठ ने यह उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे होटल के मामलों में भी पहले कार्रवाई की जाती है और बाद में सवाल पूछे जाते हैं। कोर्ट के मुताबिक इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ।
कोर्ट की टिप्पणी का मूल सवाल यह था कि किसी नियामक के पास कार्रवाई करने की शक्ति है या नहीं, यह अलग बात है; लेकिन उस शक्ति का इस्तेमाल किस तरीके से और कितनी सावधानी से किया जाता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
कोर्ट ने FDA से कहा- आपके पास तलवार है, लेकिन मच्छर मारने में इस्तेमाल कर रहे
हाईकोर्ट ने FDA की वैधानिक शक्तियों पर कोई संदेह नहीं जताया। पीठ ने साफ कहा कि उसे यह नहीं लगता कि FDA के पास कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है।
लेकिन कोर्ट ने FDA की कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठाया। एक्टिंग चीफ जस्टिस घुगे ने FDA की वकील नेहा भिड़े से कहा कि समस्या यह नहीं है कि आपके पास शक्ति है, बल्कि यह है कि आप उस शक्ति का इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि “आपके पास तलवार चलाने की शक्ति है, लेकिन आप उसका इस्तेमाल मच्छर मारने के लिए कर रहे हैं।”
इस टिप्पणी के जरिए पीठ ने यह संकेत दिया कि नियामक कार्रवाई का उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करना जरूर है, लेकिन कार्रवाई परिस्थिति के अनुपात में और उचित तरीके से होनी चाहिए।
FDA की कार्रवाई पर कोर्ट ने पूरी तरह सवाल नहीं उठाया
यहां एक बात समझना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने FDA की दवाओं की निगरानी करने की कानूनी शक्ति को खारिज नहीं किया।
FDA का काम ही दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और बिक्री से जुड़े नियमों को लागू करना है। अगर किसी दवा की पैकेजिंग या ब्रांड नाम में ऐसी समानता है जिससे मरीजों या स्वास्थ्यकर्मियों के बीच भ्रम पैदा होने की वास्तविक आशंका हो, तो नियामक उस मामले की जांच कर सकता है और कानून के तहत कार्रवाई भी कर सकता है।
कोर्ट की आपत्ति मुख्य रूप से कार्रवाई की प्रक्रिया और तरीके को लेकर थी।
पीठ ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि FDA के पास कार्रवाई करने का अधिकार है या नहीं। सवाल यह है कि उस अधिकार का इस्तेमाल उचित प्रक्रिया और पर्याप्त विवेक के साथ किया गया या नहीं।
अब कैडिला के खिलाफ FDA क्या करेगा?
कोर्ट की टिप्पणियों के बाद महाराष्ट्र FDA ने मौजूदा स्टॉप-सेल आदेश वापस लेने पर सहमति जताई है।
इसके बाद अगर FDA कैडिला के खिलाफ फिर से कार्रवाई करना चाहता है तो उसे निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। इसमें कंपनी को Show-Cause Notice यानी कारण बताओ नोटिस देना, आरोपों पर लिखित जवाब देने के लिए पर्याप्त समय देना और कंपनी का पक्ष सुनना शामिल होगा।
इसके बाद ही FDA को आगे कोई अंतिम आदेश पारित करना होगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि कैडिला को हमेशा के लिए आरोपों से मुक्त कर दिया गया है। कंपनी को अब अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा और FDA कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद मामले पर नया फैसला ले सकता है।
FDA कमिश्नर तुकाराम मुंडे के लिए भी यह मामला अहम
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र FDA की पिछले कुछ हफ्तों से चल रही सख्त कार्रवाई भी है। FDA ने मुंबई और महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों में कई खाद्य प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया है और स्वच्छता तथा खाद्य सुरक्षा से जुड़े उल्लंघनों के मामलों में करीब 100 फूड एस्टैब्लिशमेंट के लाइसेंस निलंबित किए हैं।
इन कार्रवाइयों के कारण महाराष्ट्र FDA के कमिश्नर तुकाराम मुंडे सार्वजनिक चर्चा में रहे हैं। उपभोक्ताओं के एक वर्ग ने इस अभियान की सराहना की है, जबकि हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री के कुछ हिस्सों ने नियामक के सख्त रवैये पर सवाल भी उठाए हैं।
कैडिला मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी व्यापक नियामकीय कार्रवाई के बीच आई है। हालांकि, कोर्ट ने यह नहीं कहा कि FDA को सख्ती से कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। अदालत ने जोर दिया कि सख्ती के साथ कानूनी प्रक्रिया और विवेक भी जरूरी है।
आगे क्या होगा?
मौजूदा स्टॉप-सेल आदेश वापस लिए जाने के बाद कैडिला को संबंधित आरोपों पर अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा। FDA अगर आगे कार्रवाई करना चाहता है तो उसे नए सिरे से कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी।
हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अगर भविष्य में इसी तरह बिना उचित प्रक्रिया के आदेश जारी किए गए तो नियामक पर भारी लागत (Heavy Costs) भी लगाई जा सकती है।
इस मामले का बड़ा संदेश यही है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए नियामक कार्रवाई जरूरी है, लेकिन किसी कंपनी की दवाओं की बिक्री रोकने जैसे गंभीर कदम भी कानून में तय प्रक्रिया, सुनवाई और उचित अनुपात के साथ उठाए जाने चाहिए।
यानी बॉम्बे हाईकोर्ट ने FDA की शक्ति को चुनौती नहीं दी है, बल्कि यह याद दिलाया है कि सरकारी शक्ति जितनी बड़ी हो, उसका इस्तेमाल उतनी ही सावधानी और कानूनी प्रक्रिया के साथ होना चाहिए।
FAQ
1. बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र FDA को क्यों फटकार लगाई?
कोर्ट ने FDA की उस कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठाया, जिसमें कैडिला की कई दवाओं की बिक्री और वितरण रोक दिया गया था। कोर्ट का कहना था कि कार्रवाई से पहले तय कानूनी प्रक्रिया और उचित सुनवाई का पालन जरूरी है।
2. ‘Shoot First, Ask Questions Later’ टिप्पणी का क्या मतलब है?
कोर्ट ने इस वाक्य का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया कि किसी रेगुलेटरी अथॉरिटी को पहले कठोर कार्रवाई करके बाद में कारण या जवाब तलाशने का तरीका नहीं अपनाना चाहिए। कानून में तय प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
3. महाराष्ट्र FDA ने कैडिला के खिलाफ क्या कार्रवाई की थी?
FDA ने कैडिला की कई दवाओं के स्टॉक जब्त करने और उनकी बिक्री व वितरण रोकने के आदेश दिए थे। FDA ने दवाओं की मिलती-जुलती ब्रांडिंग को संभावित मेडिकेशन एरर का जोखिम बताया था।
4. क्या हाईकोर्ट ने FDA की दवा रेगुलेट करने की शक्ति खत्म कर दी है?
नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि FDA के वैधानिक अधिकारों पर उसे कोई संदेह नहीं है। सवाल उन अधिकारों को इस्तेमाल करने के तरीके और तय कानूनी प्रक्रिया का था।
5. अब कैडिला के खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती है?
मौजूदा स्टॉप-सेल ऑर्डर वापस लेने के बाद FDA जरूरत पड़ने पर नए शॉ-कॉज नोटिस जारी कर सकता है। कंपनी को जवाब और सुनवाई का अवसर देने के बाद ही आगे का फैसला लिया जाएगा।
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