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Supreme Court Death Penalty Hanging – फांसी को खत्म करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, क्या भविष्य में बदल सकता है मौत का तरीका?

Supreme Court Death Penalty Hanging: भारत में मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था फिलहाल जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 18 अगस्त 2026 को फांसी को खत्म कर इसकी जगह कम पीड़ादायक तरीका अपनाने की म

Supreme Court Death Penalty Hanging – फांसी को खत्म करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, क्या भविष्य में बदल सकता है मौत का तरीका?

Supreme Court Death Penalty Hanging: भारत में मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था फिलहाल जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 18 अगस्त 2026 को फांसी को खत्म कर इसकी जगह कम पीड़ादायक तरीका अपनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि फिलहाल ऐसा ठोस आधार नहीं है, जिससे फांसी को असंवैधानिक घोषित किया जा सके। हालांकि, कोर्ट ने भविष्य के लिए रास्ता खुला रखा है। अगर नए वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभवजन्य सबूत यह साबित करते हैं कि कोई दूसरा तरीका कम पीड़ादायक और मानव गरिमा के लिहाज से बेहतर है, तो इस मुद्दे की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।

 

इस मामले में वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने 2017 में याचिका दायर की थी। उन्होंने मौत की सजा लागू करने के लिए फांसी की जगह जहरीले इंजेक्शन, गोली मारने, बिजली से करंट देने और गैस चैंबर जैसे विकल्पों पर विचार करने की मांग की थी। याचिका में फांसी को क्रूर, अमानवीय और गरिमा के खिलाफ बताया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने फांसी को असंवैधानिक क्यों नहीं माना?

कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या मौत की सजा लागू करने के लिए फांसी का इस्तेमाल संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले जीवन और मानवीय गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करता है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल फांसी को असंवैधानिक घोषित करने से इनकार कर दिया। इसका एक अहम कारण यह है कि अदालत पहले भी फांसी की संवैधानिक वैधता पर फैसला दे चुकी है। Deena v. Union of India मामले में 1983 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने फांसी के तरीके को अनुच्छेद 21 के खिलाफ नहीं माना था। उस फैसले में उपलब्ध मेडिकल और विशेषज्ञ सामग्री के आधार पर फांसी को उस समय मौत की सजा लागू करने का कम पीड़ादायक तरीका माना गया था।

 

हालांकि, मौजूदा सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुराना फैसला हमेशा के लिए अंतिम नहीं माना जा सकता। विज्ञान और मेडिकल रिसर्च में बदलाव होने पर किसी संवैधानिक सवाल की दोबारा समीक्षा संभव है। इसलिए अगर भविष्य में मजबूत वैज्ञानिक या मेडिकल प्रमाण सामने आते हैं, तो फांसी के तरीके पर फिर से विचार किया जा सकता है।

केंद्र चाहे तो फांसी के तरीके की समीक्षा करा सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए केंद्र सरकार के लिए एक रास्ता खुला रखा है। सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की समिति बनाकर मौत की सजा लागू करने के मौजूदा तरीके की व्यापक समीक्षा करा सकती है। ऐसी समिति यह देख सकती है कि आज की वैज्ञानिक और मेडिकल जानकारी के आधार पर फांसी की तुलना में कोई दूसरा तरीका कम पीड़ादायक है या नहीं और क्या वह दोषी की मानवीय गरिमा को बेहतर तरीके से बनाए रख सकता है।

 

इसका मतलब यह नहीं है कि केंद्र को तुरंत फांसी की जगह कोई दूसरा तरीका लागू करने का आदेश दिया गया है। फिलहाल कानूनी व्यवस्था में फांसी ही सामान्य तरीका बनी हुई है।

 

याचिका में 4 दूसरे तरीकों की मांग की गई थी

ऋषि मल्होत्रा की याचिका में कहा गया था कि मौत की सजा को ऐसे तरीके से लागू किया जाना चाहिए, जिससे अनावश्यक दर्द और पीड़ा कम से कम हो। इसमें इंट्रावीनस लीथल इंजेक्शन, गोली मारना, इलेक्ट्रोक्यूशन और गैस चैंबर को संभावित विकल्पों के रूप में रखा गया था।

 

याचिका में यह भी दावा किया गया था कि फांसी की पूरी प्रक्रिया में 40 मिनट से ज्यादा समय लग सकता है, जबकि गोली मारने में कुछ मिनट और इंट्रावीनस लीथल इंजेक्शन में करीब 5 मिनट लग सकते हैं। ये समय संबंधी आंकड़े याचिकाकर्ता की दलीलों का हिस्सा थे, सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष नहीं। याचिकाकर्ता ने यह तर्क भी दिया था कि मौत की सजा पाए व्यक्ति को कम पीड़ादायक और सम्मानजनक तरीके से मृत्यु पाने का अधिकार अनुच्छेद 21 में मिले जीवन और गरिमा के अधिकार से जुड़ा है।

 

2023 में सुप्रीम कोर्ट ने खुद मांगा था फांसी पर डेटा

इस मामले ने 2023 में भी काफी ध्यान खींचा था। मार्च 2023 में तत्कालीन चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र से फांसी के तरीके से जुड़े बेहतर वैज्ञानिक और अनुभवजन्य डेटा मांगे थे।

कोर्ट जानना चाहता था कि फांसी से कितनी पीड़ा होती है, मौत में कितना समय लगता है, इसके लिए किस तरह की व्यवस्था और संसाधनों की जरूरत होती है और क्या आज की तकनीक में इससे बेहतर कोई तरीका मौजूद है।

 

कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति बनाने की संभावना भी जताई थी, जिसमें नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज के विशेषज्ञ, AIIMS के डॉक्टर और वैज्ञानिक शामिल किए जा सकते थे। मई 2023 में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि केंद्र सरकार मौत की सजा लागू करने के वैकल्पिक तरीकों की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने पर विचार कर रही है।

 

केंद्र ने पहले फांसी को ही बेहतर तरीका बताया था

2018 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में फांसी की मौजूदा व्यवस्था का बचाव किया था। सरकार ने कहा था कि लीथल इंजेक्शन व्यावहारिक तरीका नहीं है, क्योंकि इसके इस्तेमाल में विफलता के मामले सामने आए हैं।


उस समय केंद्र की ओर से यह भी कहा गया था कि फांसी एक व्यावहारिक तरीका है और इसे बदलने के लिए दूसरे विकल्पों की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर पर्याप्त जानकारी जरूरी है। इसलिए मौजूदा मामले में भी सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं था कि कोई दूसरा तरीका कम दर्दनाक हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने वैज्ञानिक, मेडिकल और अनुभवजन्य आधार पर ठोस प्रमाण की जरूरत पर जोर दिया है।


भारत में फांसी का कानून कब से है?

भारत में मौत की सजा और फांसी की व्यवस्था आजादी के बाद भी जारी रही। ब्रिटिश काल में 1860 की भारतीय दंड संहिता (IPC) में गंभीर अपराधों के लिए मौत की सजा का प्रावधान था और फांसी इसका प्रमुख तरीका रही।

 

1967 में विधि आयोग की 35वीं रिपोर्ट में मौत की सजा और उसके इस्तेमाल की व्यापक समीक्षा की गई। इसके बाद 1973 के CrPC में फांसी को कानून में स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया।

 

CrPC की धारा 354(5) में कहा गया था कि मौत की सजा पाए व्यक्ति को गर्दन से तब तक लटकाया जाएगा, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।

 

अब आपराधिक कानूनों में बदलाव के बाद CrPC की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 लागू है। इसमें यही व्यवस्था धारा 393(5) में बरकरार रखी गई है। यानी मौजूदा कानून के तहत मौत की सजा पाए व्यक्ति को फांसी देकर मृत्यु तक लटकाने का प्रावधान है।

 

1980 में तय हुआ था ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ नियम

यह समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ फांसी के तरीके को ही नहीं, बल्कि मौत की सजा दिए जाने की सीमा को भी सख्त किया है।

 

Bachan Singh v. State of Punjab मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1980 में कहा था कि मौत की सजा केवल “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मामलों में दी जानी चाहिए। यानी ऐसे मामलों में जहां उम्रकैद का विकल्प पर्याप्त न हो।

 

इस सिद्धांत के बाद अदालतों के लिए मौत की सजा सुनाते समय अपराध की गंभीरता के साथ दोषी की परिस्थितियों और सुधार की संभावना जैसे पहलुओं पर भी विचार करना जरूरी हो गया।

 

2003 और 2015 में विधि आयोग ने क्या कहा?

विधि आयोग की 187वीं रिपोर्ट (2003) में मौत की सजा लागू करने के तरीकों की समीक्षा की गई और फांसी के विकल्पों पर चर्चा हुई। इसमें लीथल इंजेक्शन सहित दूसरे तरीकों पर विचार किया गया था। इसके बाद 262वीं रिपोर्ट (2015) में विधि आयोग ने सामान्य परिस्थितियों में मौत की सजा खत्म करने की सिफारिश की थी। हालांकि आतंकवाद और देश के खिलाफ युद्ध जैसे मामलों में इसे बनाए रखने की बात कही गई थी। लेकिन भारत में मौत की सजा खत्म नहीं हुई और फांसी भी इसका सामान्य कानूनी तरीका बनी रही।

 

3 मामले, जिनसे फांसी पर देशभर में बहस हुई

भारत में फांसी और मौत की सजा को लेकर कई बड़े मामलों में बहस हुई है। धनंजय चटर्जी को 2004 में पश्चिम बंगाल के अलीपुर जेल में हेतल पारेख की हत्या और बलात्कार के मामले में फांसी दी गई थी। इस मामले में मानवाधिकार संगठनों ने मौत की सजा और फांसी के तरीके पर सवाल उठाए।

 

अजमल कसाब, 26/11 मुंबई आतंकी हमले के दोषी, को 21 नवंबर 2012 को पुणे की यरवदा जेल में फांसी दी गई। इस मामले में आतंकवाद के लिए मौत की सजा और उसकी कानूनी प्रक्रिया चर्चा में रही।

 

निर्भया मामले में चार दोषियों को 20 मार्च 2020 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई। दया याचिकाओं और दूसरे कानूनी विकल्पों के कारण फांसी लंबे समय तक टलती रही, जिससे भारत में मौत की सजा की पूरी प्रक्रिया को लेकर बहस तेज हुई।

 

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद भारत में मौत की सजा लागू करने का मौजूदा तरीका नहीं बदलेगा। BNSS की धारा 393(5) के तहत फांसी ही सामान्य कानूनी तरीका है।

 

लेकिन इस फैसले ने भविष्य में बदलाव की संभावना पूरी तरह बंद नहीं की है। अगर केंद्र सरकार विशेषज्ञों के जरिए कोई नई वैज्ञानिक या मेडिकल समीक्षा कराती है और ठोस सबूत सामने आते हैं कि कोई वैकल्पिक तरीका कम पीड़ादायक और अधिक मानवीय है, तो इस मुद्दे पर फिर संवैधानिक समीक्षा हो सकती है।

 

यानी Supreme Court Death Penalty Hanging मामले में फिलहाल फांसी कायम है, लेकिन बहस खत्म नहीं हुई है। अदालत ने सिर्फ इतना तय किया है कि मौजूदा वैज्ञानिक और कानूनी स्थिति के आधार पर अभी फांसी को असंवैधानिक घोषित करने का पर्याप्त आधार नहीं है।

 

FAQs

सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा लागू करने के लिए फांसी को खत्म करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। फिलहाल फांसी भारत में मौत की सजा लागू करने का कानूनी तरीका बनी रहेगी।

कोर्ट को मौजूदा समय में ऐसा पर्याप्त वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभवजन्य आधार नहीं मिला, जिससे फांसी को असंवैधानिक घोषित किया जा सके। हालांकि भविष्य में नए ठोस सबूत मिलने पर इसकी समीक्षा की संभावना खुली रखी गई है।

हां। BNSS की धारा 393(5) के तहत मौत की सजा पाए व्यक्ति को गर्दन से तब तक लटकाने का प्रावधान है, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।

भारत में सामान्य कानूनी व्यवस्था के तहत मौत की सजा फांसी से लागू की जाती है। हालांकि सशस्त्र बलों से जुड़े कुछ मामलों में अलग कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।

फिलहाल भारत में सामान्य मौत की सजा के लिए लीथल इंजेक्शन कानूनी रूप से निर्धारित तरीका नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने वैकल्पिक तरीकों पर भविष्य में वैज्ञानिक और मेडिकल प्रमाण के आधार पर विचार की संभावना खुली रखी है।

कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की समिति बनाकर वैकल्पिक तरीकों की वैज्ञानिक और मेडिकल समीक्षा करा सकती है। अगर भविष्य में ठोस सबूत किसी दूसरे तरीके को कम पीड़ादायक और अधिक मानवीय साबित करते हैं, तो इस मुद्दे की दोबारा समीक्षा हो सकती है।

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