PoK Protest: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में विधानसभा चुनावों के बीच विरोध प्रदर्शन, गोलीबारी और चुनावी धांधली के आरोपों ने पूरे क्षेत्र को हिंसा की चपेट में ले लिया है। पहले चरण की वोटिंग 27 जुलाई 2026 को मीरपुर डिवीजन की 13 सीटों पर हुई, लेकिन चुनाव से पहले शुरू हुआ राजनीतिक आंदोलन मतदान के दौरान भी शांत नहीं हुआ। अलग-अलग घटनाओं में कम से कम 30 से अधिक लोगों के मारे जाने के दावे सामने आए हैं, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं।
जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) का आरोप है कि रावलाकोट और मीरपुर समेत कई इलाकों में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलीबारी की। दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार का कहना है कि प्रदर्शनकारियों में हथियारबंद लोग शामिल थे और सुरक्षाबलों ने आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई की। चुनावी धांधली के आरोप, 12 विवादित शरणार्थी सीटों को लेकर छिड़ा आंदोलन और लगातार बढ़ती हिंसा ने इस चुनाव को पिछले कई वर्षों का सबसे विवादित चुनाव बना दिया है। मौतों के आंकड़ों को लेकर अलग-अलग दावे हैं और संचार सेवाएं बंद होने के कारण उनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी भी संभव नहीं हो सकी है।

PoK Protest: वोटिंग शुरू हुई, लेकिन सड़कों से नहीं हटा तनाव
विधानसभा के सभी निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव मूल रूप से 27 जुलाई को एक साथ कराए जाने थे। कई सप्ताह तक चले आंदोलन, हिंसक झड़पों और प्रशासनिक बाधाओं के बाद चुनाव आयोग ने मतदान को तीन चरणों में कराने का फैसला किया। पहले चरण में 27 जुलाई को मीरपुर डिवीजन, दूसरे चरण में 2 अगस्त को मुजफ्फराबाद डिवीजन और पाकिस्तान में रहने वाले कथित कश्मीरी शरणार्थियों की सीटों पर मतदान तय किया गया। अंतिम चरण 10 अगस्त को पुंछ डिवीजन में होना है, जहां आंदोलन और हिंसा का असर सबसे अधिक रहा है।
पहले चरण की वोटिंग भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच सुबह शुरू हुई। चुनाव अधिकारियों ने मतदान केंद्रों पर प्रक्रिया सामान्य रहने का दावा किया, लेकिन क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों से झड़पों और मौतों की खबरें आती रहीं। कई रिपोर्टों के अनुसार जून से चुनाव शुरू होने तक प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच संघर्ष में दर्जनों लोग मारे जा चुके थे।
जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी का दावा है कि रावलाकोट और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर सीधी गोलीबारी की। संगठन से जुड़े सोशल मीडिया खातों पर सड़कों पर पड़े शवों, क्षतिग्रस्त मोटरसाइकिलों और भागते लोगों के वीडियो साझा किए गए। हालांकि संचार बंदी और स्वतंत्र पत्रकारों की सीमित मौजूदगी के कारण सोशल मीडिया पर जारी सभी वीडियो, नामों और मृतकों की संख्या का स्वतंत्र सत्यापन संभव नहीं हो पाया है।
PoK को ‘आजाद कश्मीर’ बताता है पाकिस्तान
भारत इस क्षेत्र को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी PoK कहता है। पाकिस्तान इसे आधिकारिक रूप से ‘आजाद जम्मू और कश्मीर’ या AJK बताता है और दावा करता है कि यहां अपनी विधानसभा, संविधान, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री वाली अलग शासन व्यवस्था है।

भारत इस दावे को स्वीकार नहीं करता। भारत का आधिकारिक रुख है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा क्षेत्र, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से भी शामिल हैं, भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। भारत पाकिस्तान द्वारा यहां कराए जाने वाले चुनावों को वैधता प्रदान करने वाली लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं मानता।
व्यवहार में PoK की स्थानीय सरकार के अधिकार सीमित हैं। रक्षा, विदेश नीति और मुद्रा जैसे महत्वपूर्ण विषय पाकिस्तान के नियंत्रण में रहते हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली AJK काउंसिल भी इस व्यवस्था का हिस्सा रही है। संवैधानिक बदलावों के बाद काउंसिल के कुछ अधिकार स्थानीय सरकार को दिए गए, लेकिन सुरक्षा, विदेश नीति और क्षेत्र की समग्र राजनीतिक दिशा पर इस्लामाबाद का प्रभाव बना हुआ है।
कब्जे वाले क्षेत्र को दो अलग व्यवस्थाओं में बांटा
ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान के कब्जे वाला यह पूरा इलाका 1947 से पहले जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा था। भारत का कहना है कि महाराजा हरि सिंह द्वारा 26 अक्टूबर 1947 को हस्ताक्षरित विलय पत्र के बाद संपूर्ण रियासत कानूनी रूप से भारत में शामिल हो गई थी।
पाकिस्तान ने अपने कब्जे वाले हिस्से को दो अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं में बांट रखा है। पहला क्षेत्र वह है जिसे पाकिस्तान ‘आजाद जम्मू और कश्मीर’ कहता है। इसमें मुजफ्फराबाद, मीरपुर, कोटली, बाग और पुंछ जैसे इलाके शामिल हैं। इसकी सीमा भारत के जम्मू-कश्मीर से लगती है।

दूसरा हिस्सा गिलगित-बाल्टिस्तान है, जिसे पहले ‘नॉर्दर्न एरियाज’ कहा जाता था। यह भौगोलिक रूप से बड़ा और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा इसी इलाके से होकर गुजरता है। पाकिस्तान की प्रशासनिक व्यवस्था में गिलगित-बाल्टिस्तान को AJK से पूरी तरह अलग रखा गया है। दोनों की अपनी विधानसभाएं, सरकारें और चुनावी प्रक्रियाएं हैं।
इसलिए PoK शब्द व्यापक रूप से पाकिस्तान के कब्जे वाले पूरे क्षेत्र के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन पाकिस्तान की प्रशासनिक व्यवस्था में AJK और गिलगित-बाल्टिस्तान एक इकाई नहीं हैं।

53 सदस्यीय विधानसभा का गणित समझिए
AJK विधानसभा एक सदनीय विधानमंडल है और इसका मुख्यालय मुजफ्फराबाद में है। विधानसभा में कुल 53 सदस्य होते हैं और इसका कार्यकाल पांच वर्ष का रहता है। इन 53 में से 45 सदस्य जनता के प्रत्यक्ष मतदान से चुने जाते हैं।
प्रत्यक्ष चुनाव वाली 45 सीटों में 33 निर्वाचन क्षेत्र AJK की भौगोलिक सीमा के भीतर हैं। बाकी 12 सीटें उन लोगों के लिए निर्धारित हैं, जिन्हें पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर से आए शरणार्थी बताता है और जो अब पाकिस्तान के पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा तथा अन्य क्षेत्रों में रहते हैं। इनमें छह सीटें जम्मू क्षेत्र से आए लोगों और छह सीटें कश्मीर घाटी से आए लोगों से जोड़ी गई हैं।
प्रत्यक्ष चुनाव के बाद विधानसभा में आठ अतिरिक्त आरक्षित सदस्य चुने जाते हैं। इनमें पांच सीटें महिलाओं के लिए, एक धार्मिक विद्वान, एक तकनीकी विशेषज्ञ और एक विदेश में रहने वाले जम्मू-कश्मीर मूल के व्यक्ति के लिए होती है। इन सदस्यों को आम मतदाता सीधे नहीं चुनते, बल्कि विधानसभा के निर्वाचित सदस्य आनुपातिक प्रक्रिया से उनका चयन करते हैं। इस तरह 45 प्रत्यक्ष निर्वाचित और आठ आरक्षित सदस्यों को मिलाकर सदन की कुल संख्या 53 होती है।
विधानसभा के सदस्य स्थानीय प्रधानमंत्री का चुनाव करते हैं, जो सरकार का मुख्य कार्यकारी होता है। राष्ट्रपति औपचारिक संवैधानिक प्रमुख की भूमिका निभाता है।

स्थानीय आबादी के बाहर हैं 12 निर्वाचन क्षेत्र
विवादित 12 सीटों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके मतदाता AJK की सीमा के भीतर नहीं रहते। वे पाकिस्तान के अलग-अलग शहरों और प्रांतों में बसे हुए हैं। पाकिस्तान उन्हें 1947, 1965, 1971 और बाद के संघर्षों के दौरान भारतीय प्रशासन वाले जम्मू-कश्मीर से आए शरणार्थियों के रूप में मान्यता देता है।
इन सीटों की चुनावी गतिविधियां पाकिस्तान के भीतर होती हैं, लेकिन इनसे चुने गए विधायक AJK की सरकार बनाने में उतनी ही भूमिका निभाते हैं जितनी मुजफ्फराबाद, मीरपुर या रावलाकोट से चुने गए प्रतिनिधि निभाते हैं।
यही व्यवस्था मौजूदा PoK Protest की सबसे बड़ी राजनीतिक वजह बन गई है। JAAC और कई स्थानीय संगठनों का कहना है कि जो मतदाता क्षेत्र में रहते ही नहीं हैं, उनके प्रतिनिधियों को स्थानीय सरकार बनाने या गिराने में निर्णायक भूमिका नहीं मिलनी चाहिए।
JAAC को इन सीटों से सबसे बड़ी आपत्ति
जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी अलग-अलग कारोबारी संगठनों, नागरिक समूहों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का साझा मंच है। संगठन ने पहले बिजली दरों, गेहूं और आटे की कीमतों, सरकारी विशेषाधिकारों तथा स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलन चलाया था। मौजूदा आंदोलन में उसने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रमुख मुद्दा बना दिया है।
JAAC का आरोप है कि 12 शरणार्थी सीटों के कारण क्षेत्र में रहने वाले लोगों की राजनीतिक ताकत कम हो जाती है। संगठन का कहना है कि इन सीटों पर चुनाव पाकिस्तान के भीतर होता है, जहां संघीय सरकार, प्रशासन और पाकिस्तान की बड़ी पार्टियों का प्रभाव अधिक रहता है। ऐसे में इन सीटों का इस्तेमाल AJK में इस्लामाबाद समर्थक सरकार बनवाने के लिए किया जा सकता है।

संगठन विशेष रूप से पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी जैसी पार्टियों पर इस व्यवस्था से लाभ उठाने का आरोप लगाता है। हालांकि दोनों पार्टियां इन आरोपों को स्वीकार नहीं करतीं और उनका कहना है कि शरणार्थी सीटों को संवैधानिक तथा ऐतिहासिक आधार पर प्रतिनिधित्व मिला हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से और भड़का गुस्सा
विवाद तब और बढ़ गया जब AJK की शीर्ष अदालत ने जून 2026 में फैसला दिया कि शरणार्थियों के लिए निर्धारित 12 सीटें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन्हें किसी प्रशासनिक आदेश या सामान्य कानून से समाप्त नहीं किया जा सकता और इसके लिए अंतरिम संविधान में संशोधन आवश्यक होगा।
प्रदर्शनकारी इन सीटों को चुनाव से पहले हटाने की मांग कर रहे थे, जबकि सरकार का कहना था कि अदालत के निर्णय और संवैधानिक व्यवस्था के कारण ऐसा तत्काल संभव नहीं है। इसी टकराव ने आंदोलन को तेज कर दिया।
JAAC के समर्थकों का मानना था कि विवादित सीटों के रहते कराए गए चुनाव स्थानीय लोगों की वास्तविक इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे। दूसरी ओर सरकार ने चुनाव टालने या संवैधानिक बदलाव करने से इनकार कर दिया।
1960 के दशक से बनती गई शरणार्थी सीटों की व्यवस्था
शरणार्थियों को अलग प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था अचानक शुरू नहीं हुई। इसकी जड़ें 1960 के दशक में लागू चुनावी कानूनों में मिलती हैं। शुरुआती चुनावी व्यवस्था में पाकिस्तान में बसे जम्मू-कश्मीर मूल के लोगों को प्रतिनिधित्व दिया गया। बाद के कानूनों में इस व्यवस्था को जारी रखा गया और 1974 के अंतरिम संविधान के तहत इसे औपचारिक संवैधानिक आधार मिला।
इसके बाद हुए संवैधानिक संशोधनों में भी इन सीटों को समाप्त नहीं किया गया। 2018 के 13वें संशोधन के बाद स्थानीय सरकार और काउंसिल के अधिकारों में बदलाव हुआ, लेकिन शरणार्थी निर्वाचन क्षेत्रों की मूल व्यवस्था बरकरार रही।
समर्थकों का तर्क है कि इन लोगों को जम्मू-कश्मीर विवाद के अंतिम राजनीतिक समाधान तक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। विरोधियों का कहना है कि दशकों से पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रह रही आबादी को AJK की स्थानीय सरकार तय करने का अधिकार देना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के खिलाफ है।
आंदोलन पर प्रतिबंध ने टकराव को बनाया हिंसक
JAAC ने जून 2026 में बड़े विरोध मार्च की घोषणा की थी। प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले प्रशासन ने संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया और उसके कई नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। कुछ नेता भूमिगत हो गए, जबकि कई समर्थक रावलाकोट और पुंछ डिवीजन में धरने जारी रखते रहे।
प्रतिबंध के बाद आंदोलन खत्म होने के बजाय और फैल गया। प्रमुख सड़कों पर अवरोध लगाए गए, बाजार बंद हुए और प्रशासन ने कई क्षेत्रों में मोबाइल तथा इंटरनेट सेवाओं को रोक दिया। पुंछ डिवीजन में आवाजाही पर कड़ी पाबंदी के कारण खाद्य सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी प्रभावित हुई।
14 जुलाई को पुंछ और रावलाकोट क्षेत्र में हुई झड़पों में अधिकारियों और प्रदर्शनकारियों समेत नौ लोगों की मौत की पुष्टि रॉयटर्स की रिपोर्ट में की गई थी। स्थानीय सूत्रों ने उस समय जून से जारी अशांति में करीब 30 मौतों का दावा किया था।
चुनाव तक पहुंचते-पहुंचते अलग-अलग संगठनों और समाचार रिपोर्टों में मृतकों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। यही कारण है कि किसी एक आंकड़े को अंतिम और निर्विवाद संख्या नहीं माना जा सकता।
पुराने आर्थिक आंदोलन से अलग है इस बार की लड़ाई
मई 2024 में भी JAAC के नेतृत्व में PoK में व्यापक प्रदर्शन हुए थे। उस समय आंदोलन की मुख्य वजह महंगी बिजली, गेहूं और आटे की कीमतें तथा सरकारी सुविधाओं पर खर्च था। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि बड़े जलविद्युत संयंत्रों वाले क्षेत्र के लोगों को सस्ती बिजली मिलनी चाहिए।
आंदोलन के दौरान हिंसक झड़पें हुईं और नागरिकों तथा सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई। बढ़ते दबाव के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने क्षेत्र के लिए 23 अरब पाकिस्तानी रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की। इसके तहत बिजली दरों में कमी और आटे पर सब्सिडी जैसे कदम उठाए गए।
सितंबर और अक्टूबर 2025 में भी हड़ताल, चक्का जाम और बड़े प्रदर्शन हुए। मुजफ्फराबाद, रावलाकोट, कोटली तथा मीरपुर में आंदोलन का व्यापक असर दिखाई दिया। सरकार और JAAC के बीच बातचीत के बाद कई मांगों पर समझौता हुआ, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व और 12 शरणार्थी सीटों का विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
इस बार आंदोलन आर्थिक मांगों से आगे बढ़कर स्थानीय शासन, मतदान के अधिकार और इस्लामाबाद के प्रभाव के सवाल तक पहुंच गया है। यही वजह है कि 2026 का आंदोलन पिछले प्रदर्शनों की तुलना में कहीं अधिक राजनीतिक और संवेदनशील बन गया।
रावलाकोट में मार्च के दौरान भड़की हिंसा
चुनाव से ठीक पहले सबसे बड़ा टकराव पुंछ डिवीजन के रावलाकोट क्षेत्र में देखने को मिला। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के अनुसार हजारों लोग रावलाकोट से मुजफ्फराबाद की ओर मार्च कर रहे थे। संगठन का दावा है कि यह मार्च शांतिपूर्ण था और प्रदर्शनकारी केवल अपनी राजनीतिक मांगों तथा 12 शरणार्थी सीटों को समाप्त करने की मांग उठा रहे थे।

JAAC का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने बिना किसी चेतावनी के प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी कर दी। संगठन ने दावा किया कि इस कार्रवाई में 30 से अधिक लोगों की मौत हुई और 50 से ज्यादा लोग घायल हुए। सोशल मीडिया मंच X पर संगठन ने मृतकों के नाम भी साझा किए और कई वीडियो पोस्ट किए, जिनमें सड़क पर पड़े शव, क्षतिग्रस्त मोटरसाइकिलें और भागते हुए लोग दिखाई दे रहे थे।
हालांकि इन दावों की किसी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय एजेंसी या मीडिया संगठन द्वारा पूरी तरह पुष्टि नहीं हो सकी है। संचार सेवाओं पर प्रतिबंध और प्रभावित क्षेत्रों तक सीमित पहुंच के कारण वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।
सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर ही लगाया हिंसा का आरोप
जहां JAAC सुरक्षा बलों पर निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का आरोप लगा रही है, वहीं पाकिस्तान सरकार की कहानी इससे बिल्कुल अलग है।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि प्रदर्शनकारियों के बीच हथियारबंद लोग मौजूद थे और उन्होंने पहले पुलिस तथा सुरक्षा बलों पर हमला किया। सरकार का दावा है कि सुरक्षाकर्मियों ने आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई की। अधिकारियों के अनुसार कई सुरक्षाकर्मी भी इन झड़पों में घायल हुए।
सरकार का यह भी कहना है कि हालात लगातार बिगड़ रहे थे और सार्वजनिक संपत्ति तथा सरकारी संस्थानों को नुकसान पहुंचाया जा रहा था। इसी कारण अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए और कई क्षेत्रों में आवाजाही पर रोक लगानी पड़ी।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो बने नई बहस का कारण
रावलाकोट, मीरपुर और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए। इनमें लोगों को गोलियों से बचने के लिए भागते हुए, घायलों को उठाकर ले जाते हुए और सड़कों पर अफरा-तफरी का माहौल दिखाई देता है।

JAAC ने दावा किया कि पाकिस्तानी सुरक्षा बल शांतिपूर्ण और निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चला रहे हैं। संगठन ने कई पोस्ट में कहा कि लोग केवल अपने अधिकारों और मानवाधिकारों की रक्षा की मांग कर रहे थे।

दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार ने इन वीडियो की प्रामाणिकता और संदर्भ पर सवाल उठाए तथा कहा कि कई वीडियो अधूरी जानकारी के साथ साझा किए जा रहे हैं।
इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद होने के कारण घटनास्थल से स्वतंत्र रिपोर्टिंग सीमित रही, जिससे दोनों पक्षों के दावों की पूरी तरह पुष्टि करना कठिन हो गया।
मीरपुर और दूसरे शहरों में भी फैला आंदोलन
रावलाकोट तक ही विरोध सीमित नहीं रहा। मीरपुर, कोटली, मुजफ्फराबाद, चुरहोई और पुंछ डिवीजन के कई हिस्सों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए।
JAAC ने आरोप लगाया कि मीरपुर में भी प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी हुई और कई लोगों की मौत हुई। संगठन ने दावा किया कि अलग-अलग शहरों में सुरक्षा बलों ने एक जैसी कार्रवाई की।

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे केवल राजनीतिक अधिकार, निष्पक्ष चुनाव और स्थानीय लोगों को वास्तविक प्रतिनिधित्व देने की मांग कर रहे हैं।
दो सप्ताह तक बंद रहे बैंक, इंटरनेट भी रहा ठप
बढ़ते तनाव का असर पूरे क्षेत्र की सामान्य जिंदगी पर पड़ा। कई शहरों में लगातार धरने और सड़क जाम लगाए गए। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मोबाइल इंटरनेट और कई स्थानों पर ब्रॉडबैंड सेवाएं भी बंद कर दीं।
पुंछ डिवीजन के कई हिस्से कई सप्ताह तक लगभग पूरी तरह सील रहे। इससे जरूरी सामान की आपूर्ति प्रभावित हुई और स्थानीय कारोबार पर भी बड़ा असर पड़ा।
बैंकों के लगातार दो सप्ताह तक बंद रहने से व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुईं। लोगों को नकदी निकालने और दैनिक जरूरतों की पूर्ति में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
मुख्य विपक्ष के मैदान से बाहर रहने से बदला चुनावी समीकरण
मौजूदा चुनाव की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषता पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) का चुनावी मैदान से बाहर रहना है।
PTI ने चुनाव का बहिष्कार किया। इसके बाद मुकाबला मुख्य रूप से पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के बीच सिमट गया। दिलचस्प बात यह है कि दोनों दल इस्लामाबाद में केंद्र सरकार के सहयोगी हैं, लेकिन PoK चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि PTI के बहिष्कार के कारण मतदाताओं के पास विकल्प सीमित हो गए, जिससे चुनाव की प्रतिस्पर्धा को लेकर भी सवाल उठे।
नवाज शरीफ और बिलावल ने चुनाव प्रचार में झोंकी पूरी ताकत
इस चुनाव को पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही कारण है कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ लंबे समय बाद PoK में सक्रिय चुनाव प्रचार करते दिखाई दिए।

उन्होंने मुजफ्फराबाद की रैली में कहा कि PoK उनके लिए दूसरा घर है क्योंकि उनके पूर्वज कश्मीर से थे। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वह प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से आग्रह करेंगे कि उन्हें PoK का प्रधानमंत्री बनाया जाए ताकि वे खुद यहां के विकास कार्यों की निगरानी कर सकें।
चुनावी सभाओं में उन्होंने सड़क, मेट्रो, मोटरवे और विकास परियोजनाओं का वादा किया। उनके साथ पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज भी कई सभाओं में मौजूद रहीं।
दूसरी ओर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने भी पूरे चुनाव अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई। गिलगित-बाल्टिस्तान चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के बाद PPP को उम्मीद है कि उसे PoK में भी फायदा मिलेगा।
पहले चरण के नतीजों के साथ शुरू हुआ नया विवाद
पहले चरण की 13 सीटों के शुरुआती परिणाम सामने आने के बाद पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज ने नौ सीटों पर जीत दर्ज करने का दावा किया, जबकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को चार सीटें मिलीं।
परिणाम सामने आते ही PPP ने चुनावी धांधली के आरोप लगाने शुरू कर दिए।
बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा कि पहले चरण का मतदान न तो स्वतंत्र था और न ही निष्पक्ष। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल परिणाम प्रभावित करने के लिए किया गया।
PPP के वरिष्ठ नेता नैयर बुखारी ने दावा किया कि कम से कम सात निर्वाचन क्षेत्रों में परिणामों को प्रभावित किया गया और जिन सीटों पर उनकी पार्टी आगे थी, वहां जीत PML-N के पक्ष में चली गई। उन्होंने मांग की कि जांच पूरी होने तक अंतिम परिणाम घोषित नहीं किए जाएं।
PML-N ने आरोपों को किया खारिज
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सलाहकार राणा सनाउल्लाह ने PPP के सभी आरोपों को खारिज कर दिया।
उन्होंने कहा कि चुनाव शांतिपूर्ण और काफी हद तक निष्पक्ष तरीके से कराए गए। उनके अनुसार विपक्ष हार के बाद राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि विपक्ष के आरोपों के बाद चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर नई बहस शुरू हो गई और कई स्थानीय संगठनों ने भी पारदर्शी जांच की मांग उठाई।
ख्वाजा आसिफ के बयान से बढ़ा विवाद
चुनावी हिंसा के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का एक बयान भी विवाद का कारण बन गया। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में वह कहते दिखाई दिए कि वह PoK के प्रदर्शनकारियों को भारत की तरह दुश्मन मानते हैं। इस बयान के बाद विपक्षी दलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने उनकी कड़ी आलोचना की।
JAAC ने कहा कि यदि सरकार अपने ही नागरिकों को दुश्मन मानने लगेगी तो बातचीत और लोकतांत्रिक समाधान की संभावना और कमजोर हो जाएगी।
पाकिस्तान सरकार की ओर से बाद में इस बयान को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया।
2024 और 2025 के आंदोलन से कैसे अलग है यह विरोध
मई 2024 में हुए आंदोलन की मुख्य वजह महंगी बिजली, आटे की कीमतें और आर्थिक संकट था। पाकिस्तान सरकार ने 23 अरब पाकिस्तानी रुपये के राहत पैकेज की घोषणा कर उस आंदोलन को शांत कराया था।
इसके बाद सितंबर और अक्टूबर 2025 में फिर व्यापक प्रदर्शन हुए। उस समय भी इंटरनेट बंद किया गया, कई शहरों में झड़पें हुईं और बाद में सरकार तथा JAAC के बीच बातचीत के जरिए समझौता हुआ।
लेकिन 2026 का आंदोलन पहले से अलग है। इस बार प्रदर्शन केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहे। आंदोलन की सबसे बड़ी मांग राजनीतिक प्रतिनिधित्व, 12 शरणार्थी सीटों की समाप्ति और स्थानीय लोगों के अधिकारों को लेकर है। इसी कारण इस बार टकराव पहले की तुलना में कहीं अधिक गंभीर रूप ले चुका है।
भारत ने चुनावी प्रक्रिया को बताया अवैध कब्जे पर पर्दा डालने की कोशिश
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में विधानसभा चुनाव और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा के बीच भारत ने पाकिस्तान की पूरी चुनावी प्रक्रिया को खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र में कराए जा रहे चुनावों की कोई कानूनी वैधता नहीं है।

भारत ने मौजूदा चुनावी प्रक्रिया को एक दिखावटी राजनीतिक अभ्यास बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य पाकिस्तान के अवैध कब्जे और क्षेत्र में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों को छिपाना है। नई दिल्ली का आधिकारिक रुख है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा क्षेत्र भारत का अभिन्न तथा अविभाज्य हिस्सा है और पाकिस्तान को कब्जे वाले इलाकों पर कोई अधिकार नहीं है।
भारत इससे पहले भी PoK में कराए गए चुनावों, संवैधानिक बदलावों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को खारिज करता रहा है। भारतीय पक्ष का कहना है कि स्थानीय विधानसभा, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसी संस्थाएं बनाकर पाकिस्तान अपने नियंत्रण को लोकतांत्रिक स्वरूप देने की कोशिश करता है, जबकि सुरक्षा, विदेश नीति और महत्वपूर्ण प्रशासनिक मामलों पर वास्तविक प्रभाव इस्लामाबाद का ही रहता है।
मौतों के आंकड़ों पर नहीं बनी एक राय
PoK Violence में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। जून के मध्य तक रॉयटर्स ने दो सप्ताह के विरोध प्रदर्शनों में कम से कम 24 लोगों की मौत की सूचना दी थी। इनमें 20 नागरिक और चार पुलिसकर्मी शामिल बताए गए, जबकि 97 पुलिसकर्मियों के घायल होने और 500 से अधिक लोगों को हिरासत में लेने की जानकारी सामने आई थी।

इसके बाद चुनाव के आसपास हुई नई हिंसा को लेकर JAAC और स्थानीय नागरिक संगठनों ने मृतकों की संख्या 30 से अधिक बताई। द गार्जियन की रिपोर्ट में नागरिक समूहों और प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से दो दिनों के दौरान कम से कम 30 निहत्थे प्रदर्शनकारियों की मौत का आरोप लगाया गया। रिपोर्ट के अनुसार 25 मौतें सोमवार और पांच मंगलवार को हुईं, लेकिन संचार बंदी के कारण इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि बाधित हुई।
कुछ भारतीय मीडिया रिपोर्टों में चुनावी हिंसा में 14 प्रदर्शनकारियों की मौत बताई गई, जबकि अन्य रिपोर्टों में कुल संख्या 34 या उससे अधिक कही गई। इसलिए किसी एक आंकड़े को अंतिम संख्या के रूप में लिखना फिलहाल उचित नहीं होगा। उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों से इतना स्पष्ट है कि जून से जुलाई के बीच हुए अलग-अलग टकरावों में नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों समेत कई दर्जन लोगों की जान गई है।
इंटरनेट बंदी ने बढ़ाए मानवाधिकारों से जुड़े सवाल
हिंसा प्रभावित इलाकों में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद किए जाने से घटनाओं की स्वतंत्र जांच और रिपोर्टिंग गंभीर रूप से प्रभावित हुई। कई क्षेत्रों में पत्रकारों की पहुंच सीमित रही और सोशल मीडिया पर मौजूद वीडियो ही जानकारी का प्रमुख माध्यम बन गए।
JAAC तथा स्थानीय नागरिक समूहों ने आरोप लगाया कि अस्पतालों और शवों तक पहुंच नियंत्रित की गई और सुरक्षा बलों की कार्रवाई से जुड़े सबूत छिपाने की कोशिश हुई। पाकिस्तान सरकार ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। सरकार का कहना है कि संचार पाबंदियां अफवाहों, हिंसा और चुनावी व्यवधान को रोकने के लिए लगाई गईं।
मानवाधिकार मानकों के अनुसार प्रदर्शन के दौरान घातक बल का इस्तेमाल केवल उस स्थिति में किया जाना चाहिए, जब जीवन को तत्काल गंभीर खतरा हो और उससे कम कठोर कोई उपाय उपलब्ध न हो। इसी कारण रावलाकोट में गोलीबारी की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही की मांग तेज कर दी।
एमनेस्टी ने निष्पक्ष और पारदर्शी जांच पर दिया जोर
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने रावलाकोट में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित घातक कार्रवाई की खबरों पर चिंता जताई। संगठन ने पाकिस्तानी अधिकारियों से हिंसा की निष्पक्ष, प्रभावी और पारदर्शी जांच कराने तथा जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने की मांग की।
एमनेस्टी ने कहा कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार नियमों के भीतर रहकर काम करना चाहिए। संगठन ने चुनाव के पहले दिन कथित रूप से घातक बल इस्तेमाल किए जाने की परिस्थितियों की जांच की जरूरत बताई।
द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राष्ट्र से जुड़े मानवाधिकार पक्ष ने भी स्वतंत्र जांच और संचार प्रतिबंध हटाने की मांग उठाई, ताकि हिंसा से जुड़े आरोपों का पारदर्शी सत्यापन हो सके।
इस जांच का दायरा केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रह सकता कि गोली पहले किसने चलाई। इसमें सुरक्षाबलों की तैनाती, बल प्रयोग के आदेश, हथियारों का इस्तेमाल, नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की मौत, गिरफ्तारियां, अस्पतालों तक पहुंच तथा इंटरनेट बंद करने के निर्णय की भी समीक्षा आवश्यक होगी।
PTI के बहिष्कार ने चुनाव की प्रतिस्पर्धा पर खड़े किए सवाल
2021 के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी रही PTI का इस बार मैदान से बाहर रहना चुनाव की राजनीतिक वैधता पर महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है। पिछले चुनाव में PTI ने प्रत्यक्ष चुनाव वाली 45 सीटों में से 25 पर जीत दर्ज कर सरकार बनाई थी।
इमरान खान की केंद्र सरकार गिरने के बाद PoK में PTI की सरकार लगातार राजनीतिक अस्थिरता से गुजरी। पहले सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी ने पद छोड़ा, फिर सरदार तनवीर इलियास अदालत की अवमानना के मामले में अयोग्य हुए। इसके बाद चौधरी अनवरुल हक सत्ता में आए, लेकिन उन्होंने PTI से दूरी बना ली। नवंबर 2025 में अविश्वास प्रस्ताव के बाद उन्हें भी पद से हटा दिया गया और PPP के फैसल मुमताज राठौर प्रधानमंत्री बने।
PTI के चुनाव बहिष्कार के कारण PML-N और PPP को मुख्य मुकाबले में बड़ा लाभ मिला। आलोचकों का कहना है कि प्रमुख विपक्षी दल की अनुपस्थिति, JAAC पर प्रतिबंध और संचार पाबंदियों के बीच हुए चुनावों को पूरी तरह प्रतिस्पर्धी लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं माना जा सकता।
12 सीटों का विवाद चुनाव के बाद भी खत्म होने की उम्मीद कम
मौजूदा चुनाव पूरे हो जाने के बाद भी 12 शरणार्थी सीटों से जुड़ा विवाद समाप्त होने की संभावना कम है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि इन्हें संवैधानिक संशोधन के बिना खत्म नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर JAAC इसे स्थानीय राजनीतिक अधिकारों से जुड़ा मूल प्रश्न मानती है।
यदि आने वाली सरकार इस मुद्दे पर संवैधानिक वार्ता शुरू नहीं करती तो आंदोलन दोबारा तेज हो सकता है। केवल आर्थिक राहत पैकेज या बिजली और आटे की कीमतों में कमी से इस बार का विवाद सुलझना कठिन है, क्योंकि प्रदर्शनकारियों की मांग अब शासन की संरचना और स्थानीय जनादेश से जुड़ी है।
संभावित समाधान के लिए पाकिस्तान सरकार, AJK प्रशासन, प्रमुख राजनीतिक पार्टियों, शरणार्थी प्रतिनिधियों और JAAC के बीच राजनीतिक संवाद जरूरी होगा। ऐसा कोई भी बदलाव इस प्रश्न का जवाब दिए बिना संभव नहीं होगा कि पाकिस्तान में रह रहे जम्मू-कश्मीर मूल के लोगों के प्रतिनिधित्व और PoK के स्थानीय मतदाताओं के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
हिंसा ने पाकिस्तान के दोहरे रुख पर भी उठाए सवाल
पाकिस्तान लंबे समय से भारतीय जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है। लेकिन अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र में इंटरनेट बंद करने, प्रदर्शनकारी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने और कथित घातक बल प्रयोग की खबरों ने उसके रुख पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान जिस लोकतांत्रिक अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता की मांग भारत से करता है, उन्हीं सिद्धांतों को PoK में लागू करने में विफल दिखाई देता है। पाकिस्तान सरकार इस आलोचना को खारिज करते हुए हिंसा के लिए हथियारबंद प्रदर्शनकारियों, आतंकी घुसपैठ और कथित बाहरी हस्तक्षेप को जिम्मेदार बता रही है।
स्वतंत्र जांच के अभाव में दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी रहने की संभावना है। लेकिन नागरिकों की मौत, विरोध पर प्रतिबंध और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का विवाद पाकिस्तान की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए लंबे समय तक चुनौती बना रह सकता है।
FAQs
1. ख्वाजा आसिफ ने PoK प्रदर्शनकारियों को लेकर क्या बयान दिया?
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि वह PoK के प्रदर्शनकारियों को भारत की तरह दुश्मन मानते हैं। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की संभावना भी खारिज कर दी। इस बयान की मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सरकार विरोधी समूहों ने आलोचना की।
2. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में प्रदर्शन क्यों हो रहे थे?
प्रदर्शन का प्रमुख कारण विधानसभा की 12 सीटें हैं, जो पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले कथित कश्मीरी शरणार्थियों के लिए निर्धारित हैं। JAAC का कहना है कि इन सीटों के कारण स्थानीय लोगों का जनादेश कमजोर होता है और पाकिस्तान की बड़ी पार्टियों को सरकार गठन में अनुचित प्रभाव मिलता है।
3. प्रदर्शनकारियों की मौत कैसे हुई?
JAAC और स्थानीय नागरिक संगठनों का आरोप है कि रावलाकोट, मीरपुर तथा अन्य इलाकों में सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई। पाकिस्तान सरकार का कहना है कि हथियारबंद लोगों ने पहले सुरक्षाबलों पर हमला किया और जवाबी कार्रवाई में मौतें हुईं। स्वतंत्र जांच नहीं होने के कारण घटनाओं का सटीक क्रम विवादित है।
4. इस मामले पर पाकिस्तान सरकार की क्या प्रतिक्रिया है?
पाकिस्तान सरकार और AJK प्रशासन ने प्रदर्शन को हिंसक बताते हुए आरोप लगाया कि इसमें हथियारबंद और आतंकी तत्व शामिल हो गए थे। सरकार का कहना है कि सुरक्षा बलों ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और चुनावों को सुरक्षित ढंग से कराने के लिए कार्रवाई की।
5. विपक्ष ने इस घटना पर क्या कहा?
PTI और सरकार विरोधी समूहों ने प्रशासन पर नागरिकों की मांगें दबाने का आरोप लगाया। दूसरी ओर PPP ने पहले चरण में चुनावी धांधली का आरोप लगाते हुए कहा कि मतदान स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं था। PPP ने कई सीटों पर PML-N को अनुचित लाभ पहुंचाए जाने की जांच की मांग की।
6. क्या इस मामले की जांच की मांग उठी है?
हां। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने रावलाकोट में कथित घातक बल प्रयोग की निष्पक्ष, प्रभावी और पारदर्शी जांच की मांग की है। संगठन ने जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और कानून लागू करने वाली एजेंसियों से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का पालन करने को कहा है।

