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प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा दांव : महिलाओं को 33% आरक्षण - क्या महिला आरक्षण से बदल जाएगा राजनीति का पूरा खेल?

देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के मसौदे को मंजूरी दे दी गई है। इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ महिलाओं क

प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा दांव : महिलाओं को 33% आरक्षण - क्या महिला आरक्षण से बदल जाएगा राजनीति का पूरा खेल?

देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के मसौदे को मंजूरी दे दी गई है। इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ महिलाओं के लिए आरक्षण को भी लागू करने की योजना बनाई गई है। सरकार का मानना है कि यह फैसला न सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था को संतुलित बनाएगा, बल्कि महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में मजबूत स्थान भी देगा।


लोकसभा सीटों में बड़ा बदलाव
इस प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा की कुल सीटों को मौजूदा 543 से बढ़ाकर 816 किया जाएगा। इन 816 सीटों में से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसका मतलब यह है कि संसद में महिलाओं की भागीदारी सीधे तौर पर काफी बढ़ जाएगी।
वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी करीब 14% के आसपास है, जबकि राज्यसभा में यह लगभग 17% है। ऐसे में यह नया प्रस्ताव संसद में लैंगिक संतुलन लाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।


कब लागू होगा नया कानून?
सरकार ने बजट सत्र को आगे बढ़ाते हुए 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद का एक विशेष सत्र बुलाने का फैसला किया है। इसी सत्र में इस संशोधन बिल को पेश कर पारित कराने की तैयारी है।
अगर संसद से यह बिल मंजूर हो जाता है, तो यह कानून 31 मार्च 2029 से लागू होगा। इसका मतलब है कि 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव में पहली बार महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का प्रभाव दिखाई देगा।

आरक्षण का तरीका क्या होगा?

इस प्रस्ताव में आरक्षण को ‘वर्टिकल’ आधार पर लागू करने की बात कही गई है। इसका मतलब यह है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए जो सीटें पहले से आरक्षित हैं, उनमें भी महिलाओं के लिए अलग से हिस्सेदारी तय की जाएगी। यानी हर वर्ग की महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिलेगा।

 

प्रधानमंत्री का संदेश

प्रधानमंत्री Narendra Modi ने इस प्रस्ताव को लेकर अपनी वेबसाइट पर एक लेख भी साझा किया है। उन्होंने इसमें कहा कि यह सिर्फ एक कानून में बदलाव नहीं है, बल्कि यह देश की करोड़ों महिलाओं की उम्मीदों और सपनों का प्रतिबिंब है।

उन्होंने सभी राजनीतिक दलों और सांसदों से अपील की कि वे इस मुद्दे पर राजनीति से ऊपर उठकर एकजुट हों और महिलाओं के सशक्तिकरण के इस प्रयास का समर्थन करें।

 

संसद में महिलाओं की मौजूदा स्थिति

देश की संसद में महिलाओं की मौजूदगी अभी भी सीमित है।

  • लोकसभा में कुल 541 सदस्यों में से 74 महिलाएं हैं।
  • राज्यसभा में 242 सदस्यों में से 41 महिलाएं हैं।

यह आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं की भागीदारी अभी भी अपेक्षाकृत कम है। ऐसे में यह नया प्रस्ताव इस असंतुलन को दूर करने का प्रयास है।

 

सीटों के पुनर्निर्धारण की तैयारी

सरकार इस संशोधन के साथ-साथ परिसीमन (डिलिमिटेशन) कानून में भी बदलाव करने की योजना बना रही है। इसके लिए एक अलग बिल लाया जाएगा। नए परिसीमन के आधार पर राज्यों में सीटों का बंटवारा किया जाएगा।

संभावना है कि सीटों का निर्धारण 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाए, न कि 2027 की जनगणना के आधार पर। यह कानून न सिर्फ लोकसभा बल्कि राज्यों की विधानसभाओं और दिल्ली, जम्मू-कश्मीर व पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में भी लागू होगा।

 

किन राज्यों में कितना असर?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बदलाव का सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिल सकता है।

  • यूपी में लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर 120 हो सकती हैं।
  • महाराष्ट्र में सीटें 48 से बढ़कर 72 तक पहुंच सकती हैं, जिनमें 24 महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
  • बिहार में कुल सीटें 60 तक हो सकती हैं, जिनमें 20 महिलाओं के लिए होंगी।
  • मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, दिल्ली और झारखंड में भी महिला सीटों में बढ़ोतरी का अनुमान है।

 

महिला आरक्षण का लंबा इतिहास

भारत में महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है। इसकी चर्चा कई दशक पहले शुरू हो चुकी थी।

  • 1931 में पहली बार इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई थी।
  • 1970 के दशक में महिलाओं की स्थिति पर कई समितियां बनीं।
  • 1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के जरिए पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण दिया गया।
  • कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50% तक कर दिया।

 

संसद में बिल का सफर

महिला आरक्षण बिल को संसद में पास कराना हमेशा आसान नहीं रहा।

  • 1996 में पहली बार यह बिल पेश किया गया, लेकिन पास नहीं हो सका।
  • 1998 से 2003 के बीच कई बार कोशिशें हुईं, लेकिन हर बार विरोध के कारण यह अटक गया।
  • 2010 में यह राज्यसभा से पास हुआ, लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो सका।
  • आखिरकार 2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में इसे संसद से मंजूरी मिली।

अब इसमें संशोधन कर इसे और व्यापक बनाने की तैयारी है।

 

राजनीतिक रणनीति भी तेज

इस बिल को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) देशभर में समर्थन जुटाने में जुट गई है। पार्टी ने बड़े स्तर पर अभियान चलाने की योजना बनाई है।

Bharatiya Janata Party ने 11 से 13 अप्रैल के बीच देश के 100 शहरों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की योजना बनाई है। इसके अलावा 15 प्रमुख शहरों में टाउन हॉल कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

 

महिलाओं की भागीदारी पर फोकस

इस अभियान की खास बात यह है कि महिला सम्मेलनों में मंच से लेकर वक्ता तक केवल महिलाएं ही होंगी। इससे यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि यह पहल वास्तव में महिलाओं के नेतृत्व को बढ़ावा देने के लिए है।

 

जमीनी स्तर पर अभियान

15 और 16 अप्रैल को देशभर के हर लोकसभा क्षेत्र में ‘नारी शक्ति पदयात्रा’ आयोजित की जाएगी। इन पदयात्राओं में समाज की जानी-मानी महिलाएं और सरकारी योजनाओं से लाभ पाने वाली महिलाएं शामिल होंगी।

इसके साथ ही कई जगहों पर महिलाओं द्वारा बाइक रैलियां भी निकाली जाएंगी, ताकि इस मुद्दे को आम लोगों तक पहुंचाया जा सके।

 

सरकार की उपलब्धियां भी गिनाई जाएंगी

पार्टी इस अभियान के दौरान पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के लिए शुरू की गई योजनाओं को भी उजागर करेगी।

इनमें शौचालय निर्माण अभियान, उज्ज्वला योजना और हर घर जल जैसी योजनाएं शामिल हैं, जिनका सीधा असर महिलाओं के जीवन पर पड़ा है।

 

विपक्ष का नजरिया

हालांकि इस पूरे मुद्दे को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो सकती है। कुछ विपक्षी दल इसे चुनावी रणनीति के तौर पर देख रहे हैं, खासकर उन राज्यों में जहां आने वाले समय में चुनाव होने हैं।

 

आगे की राह

अगर यह बिल संसद से पास हो जाता है, तो भारत की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से नीतियों और फैसलों में भी नए दृष्टिकोण शामिल हो सकते हैं।

हालांकि असली परीक्षा 2029 के चुनाव में होगी, जब यह व्यवस्था जमीन पर लागू होगी।

 

निष्कर्ष:

नारी शक्ति वंदन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अहम मोड़ साबित हो सकता है। यह न सिर्फ महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाएगा, बल्कि समाज में समानता की दिशा में भी एक मजबूत कदम होगा।

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