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पश्चिम बंगाल में SIR पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद कोर्ट में हुईं पेश, जानिए पूरा मामला

पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में अहम सुनवाई हुई। इस सुनवाई की खास बात यह रही कि राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद

पश्चिम बंगाल में SIR पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद कोर्ट में हुईं पेश, जानिए पूरा मामला

पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में अहम सुनवाई हुई। इस सुनवाई की खास बात यह रही कि राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद अदालत में मौजूद रहीं और उन्होंने अपने पक्ष में दलीलें भी रखीं। आम तौर पर किसी भी मुकदमे में मुख्यमंत्री स्वयं उपस्थित नहीं होते, बल्कि उनके वकील या कानूनी सलाहकार ही अदालत में बहस करते हैं। इसलिए यह मामला ऐतिहासिक माना जा रहा है।

 

सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि चुनावी सूची में केवल वास्तविक और पात्र मतदाताओं के नाम ही बने रहने चाहिए। अदालत ने ममता बनर्जी की याचिका पर चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से 9 फरवरी तक जवाब देने को कहा है।

 

ममता बनर्जी की मुख्य दलीलें

अदालत में ममता बनर्जी ने SIR प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना था कि जो काम सामान्य तौर पर दो साल में पूरा होता है, उसे तीन महीने में जल्दबाज़ी में कराया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह समय खेती-बाड़ी का है और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान किया जा रहा है।

 

ममता ने यह भी दावा किया कि 24 साल बाद अचानक इस प्रक्रिया को इतनी तेजी से करने की क्या जरूरत पड़ गई। उनके अनुसार इस प्रक्रिया के कारण 100 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) भी दबाव और प्रताड़ना झेल रहे हैं।

 

उन्होंने अदालत में यह आरोप भी लगाया कि पश्चिम बंगाल को खास तौर पर निशाना बनाया जा रहा है। उनके मुताबिक असम और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में इसी तरह की सख्ती नहीं दिखाई जा रही। ममता का कहना था कि यह प्रक्रिया मतदाताओं को जोड़ने के बजाय हटाने का माध्यम बन गई है और अब तक लाखों लोगों के नाम सूची से हटाए जा चुके हैं।

 

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई महिलाओं के नाम सिर्फ इसलिए हटाए जा रहे हैं क्योंकि शादी के बाद उनका सरनेम बदल गया है। कुछ बेटियाँ जो विवाह के बाद ससुराल चली गईं, उनके नाम भी सूची से हटा दिए गए। ममता ने कहा कि यह तकनीकी त्रुटियों के आधार पर लोगों को मताधिकार से वंचित करने जैसा है।

Supreme Court hearing on SIR in West Bengal

चुनाव आयोग का पक्ष

चुनाव आयोग ने इन आरोपों को नकारते हुए कहा कि राज्य सरकार ने पर्याप्त संख्या में ग्रुप बी अधिकारी उपलब्ध नहीं कराए, जिसके कारण उन्हें माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े। आयोग का कहना था कि सभी नोटिस उचित कारणों के साथ जारी किए गए हैं और जिन लोगों के नाम हटे हैं, उन्हें अधिकृत प्रतिनिधि के साथ अपनी बात रखने का अवसर भी दिया गया।

 

आयोग ने यह भी कहा कि उन्होंने राज्य सरकार को कई बार पत्र लिखकर क्लास-2 अधिकारियों की मांग की थी ताकि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) की नियुक्ति हो सके। लेकिन पर्याप्त संख्या में अधिकारी नहीं मिले। इसलिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ी। आयोग का तर्क था कि माइक्रो ऑब्जर्वर की नियुक्ति नियमों के तहत हुई है और समय की कोई कमी नहीं है, बल्कि राज्य सरकार का सहयोग पर्याप्त नहीं मिल रहा।

 

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और निर्देश

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि सभी नोटिस एक साथ वापस लेना व्यावहारिक नहीं है। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि केवल नाम की स्पेलिंग में मामूली गलती होने पर नोटिस जारी नहीं किए जाने चाहिए। अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि अधिकारी संवेदनशीलता के साथ काम करें।

 

पीठ ने यह सुझाव भी दिया कि राज्य सरकार स्थानीय भाषा और बोलियों को समझने वाले लोगों की टीम उपलब्ध कराए ताकि जांच सही ढंग से हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि अगर स्थानीय भाषा के अनुवाद में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के इस्तेमाल के कारण गलतियाँ हो रही हैं तो उसका समाधान निकाला जाएगा, लेकिन किसी असली मतदाता को बाहर नहीं किया जाना चाहिए।

 

ममता बनर्जी की कानूनी पृष्ठभूमि

ममता बनर्जी ने अदालत में अपनी व्यक्तिगत उपस्थिति के लिए अंतरिम आवेदन भी दिया था। उन्होंने अपने आवेदन में बताया कि उनके पास कानून की डिग्री है और वे न्यायालय की प्रक्रिया को समझती हैं। उनके चुनावी हलफनामे के अनुसार उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से 1979 में एमए किया और बाद में एलएलबी की पढ़ाई पूरी की थी।

 

उन्होंने अदालत से कहा कि वह याचिकाकर्ता होने के नाते मामले से पूरी तरह परिचित हैं और सर्वोच्च न्यायालय की मर्यादा और नियमों का पालन करेंगी।

 

प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी उठाया मुद्दा

सुनवाई से एक दिन पहले दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता बनर्जी ने SIR का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। उन्होंने दावा किया था कि चुनाव से ठीक पहले यह प्रक्रिया शुरू करना राजनीतिक रूप से प्रेरित लगता है। उनका कहना था कि जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, उनमें से कुछ में ही यह सख्ती दिखाई जा रही है।

 

उन्होंने यह भी कहा कि घुसपैठ का मुद्दा उठाने वाले लोग खुद जिम्मेदार हैं क्योंकि सीमाओं की सुरक्षा केंद्र सरकार की जिम्मेदारी होती है। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि उनके पीछे बैठे लोग SIR से प्रभावित परिवारों के सदस्य हैं।

 

विरोध का अनोखा तरीका - कविता की किताब

SIR के विरोध में ममता बनर्जी ने एक अलग रास्ता अपनाया। उन्होंने इस विषय पर 26 कविताओं की एक पुस्तक लिखी। उन्होंने बताया कि यह पुस्तक उन्होंने सिर्फ तीन दिनों की यात्रा के दौरान लिखी। ममता का कहना है कि अब तक उनकी 160 से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।

 

उन्होंने यह भी कहा कि वे मुख्यमंत्री के रूप में वेतन या सांसद पेंशन नहीं लेतीं, बल्कि अपनी किताबों और रचनात्मक कार्यों से मिलने वाली रॉयल्टी से निजी खर्च चलाती हैं। साहित्य, चित्रकला और गीत लेखन में उनकी रुचि पहले से ही जानी जाती रही है।

 

मुख्य चुनाव आयुक्त से मुलाकात

सुनवाई से पहले ममता बनर्जी ने दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से भी मुलाकात की थी। वह काला शॉल ओढ़कर पहुंची थीं और उनके साथ कई प्रभावित परिवार भी मौजूद थे। हालांकि चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना था कि ममता अपनी बात रखकर जवाब सुने बिना ही नाराज़ होकर चली गईं।

 

मुलाकात के बाद ममता ने चुनाव आयुक्त के व्यवहार पर नाराजगी जताई और कहा कि उन्होंने इतना अहंकारी रवैया पहले कभी नहीं देखा।

 

याचिका और पहले के निर्देश

ममता बनर्जी ने जनवरी के अंत में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इससे पहले भी उन्होंने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर इस प्रक्रिया को मनमाना और त्रुटिपूर्ण बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी निर्देश दिया था कि यह प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और आम लोगों को किसी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए।

 

अदालत ने यह भी कहा था कि जिन मतदाताओं के नामों में तार्किक विसंगतियाँ हैं, उनकी सूची सार्वजनिक स्थानों पर लगाई जाए ताकि लोग अपनी जानकारी ठीक कर सकें।

 

SIR क्या है और क्यों होती है?

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन चुनाव आयोग की एक विशेष प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना होता है। इसमें नए 18 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों को जोड़ा जाता है, मृत या स्थानांतरित हो चुके लोगों के नाम हटाए जाते हैं और नाम, पते या उम्र में हुई गलतियों को सुधारा जाता है।

 

इस प्रक्रिया में बूथ लेवल ऑफिसर घर-घर जाकर फॉर्म भरवाते हैं और दस्तावेजों की जांच करते हैं। इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र नागरिक वोट देने से वंचित न रहे और कोई भी अपात्र व्यक्ति सूची में शामिल न हो।

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