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TMC Rebel MPs Disqualification : TMC के 20 बागी सांसदों पर SC का बड़ा रुख, स्पीकर को डेडलाइन नहीं - अब क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने TMC के 20 बागी लोकसभा सांसदों की अयोग्यता मामले में स्पीकर ओम बिरला से जल्द फैसला लेने की उम्मीद जताई, लेकिन कोई डेडलाइन नहीं दी। सांसद चार सप्ताह में जवाब दाखिल करेंगे। अंतिम निर्णय अभी लंबित है।

TMC Rebel MPs Disqualification : TMC के 20 बागी सांसदों पर SC का बड़ा रुख, स्पीकर को डेडलाइन नहीं - अब क्या होगा?

TMC Rebel MPs Disqualification : सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 23 सितंबर 2026 को तृणमूल कांग्रेस यानी TMC के 20 बागी लोकसभा सांसदों की अयोग्यता से जुड़े मामले में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से कार्यवाही पर जल्द फैसला लेने की उम्मीद जताई, लेकिन उनके लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने कहा कि 10वीं अनुसूची के तहत चल रही ऐसी कार्यवाही का जल्द निपटारा होना चाहिए। हालांकि, लोकसभा अध्यक्ष की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से स्पीकर के लिए कोई शेड्यूल तय नहीं करने का आग्रह किया। सुनवाई के दौरान बागी सांसदों की ओर से बताया गया कि वे चार सप्ताह में अपनी जवाबी दलीलें दाखिल करेंगे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए पोस्ट कर दिया।

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर को डेडलाइन देने से क्यों परहेज किया?

मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने की। TMC नेता और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कहा कि बागी सांसदों को पहले ही जवाब देने के लिए छह सप्ताह का समय मिल चुका है और अब उन्होंने चार सप्ताह और मांगे हैं।बागी सांसदों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल और मनिंदर सिंह पेश हुए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से निगरानी या तीन महीने की समय-सीमा का संदर्भ उन मामलों में लागू माना गया है जहां स्पीकर की ओर से पूरी तरह निष्क्रियता हो। दूसरी ओर, TMC की ओर से दलील थी कि कार्यवाही में पहले ही पर्याप्त समय बीत चुका है और अब इसे समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाना चाहिए।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने लोकसभा अध्यक्ष की ओर से कहा कि अदालत को स्पीकर का कार्यक्रम तय नहीं करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि संवैधानिक पदाधिकारी को मामले में दोनों पक्षों को उचित अवसर देना होता है और हर मामले की परिस्थितियों के आधार पर प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने इस दौरान स्पीकर की भूमिका को “एम्फीबियस” बताया। इसका संदर्भ इस बात से था कि स्पीकर एक तरफ सदन के संचालन से जुड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाते हैं और दूसरी तरफ संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने वाली प्राधिकरण की भूमिका में होते हैं।
अदालत ने आखिरकार स्पीकर के लिए कोई अनिवार्य डेडलाइन तय नहीं की। उसने मामले की प्रगति पर अपडेट लेने का रास्ता चुना और बागी सांसदों के चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने की बात को रिकॉर्ड किया।

20 सांसदों की सदस्यता पर विवाद क्या है?

यह विवाद TMC के लोकसभा संसदीय दल में हुए विभाजन से जुड़ा है। जून 2026 में TMC के 20 लोकसभा सांसदों ने Nationalist Citizens Party of India यानी NCPI के साथ जुड़ने या विलय का ऐलान किया था। इन सांसदों ने लोकसभा में खुद को अलग समूह के रूप में मान्यता देने की मांग की थी। बाद में उन्हें संसद में NCPI समूह के रूप में माना गया और उन्होंने NDA की संसदीय गतिविधियों में भी हिस्सा लिया।TMC का कहना है कि ये सभी सांसद उसके चुनाव चिह्न पर लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। पार्टी के मुताबिक, किसी दूसरे राजनीतिक संगठन के साथ उनका जाना स्वेच्छा से TMC की सदस्यता छोड़ने के बराबर है और इस आधार पर संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत उनकी सदस्यता खत्म की जा सकती है।
इसके विपरीत, बागी सांसदों का पक्ष है कि उनका कदम एक वैध विलय के दायरे में आता है। इसी कानूनी सवाल पर अब लोकसभा अध्यक्ष के सामने अयोग्यता की कार्यवाही चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह तय नहीं किया है कि इन सांसदों ने दल-बदल कानून का उल्लंघन किया है या उनका दावा वैध विलय के तहत सुरक्षित है।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?

TMC नेता अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष के सामने 20 सांसदों की अयोग्यता की मांग वाली याचिकाएं दाखिल की थीं। उनका आरोप था कि इन याचिकाओं पर फैसला लेने में देरी हो रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से स्पीकर को इन कार्यवाहियों का जल्द निपटारा करने का निर्देश देने की मांग की।25 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने अभिषेक बनर्जी की याचिका पर 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी किया था। उस समय कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष को औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया था, हालांकि स्पीकर की ओर से सॉलिसिटर जनरल अदालत में मौजूद थे।
इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने 5 अगस्त को जारी नोटिस के तहत सांसदों से जवाब मांगा था। उन्हें शुरुआत में 14 दिन का समय दिया गया था। बाद में सांसदों के अनुरोध पर जवाब दाखिल करने की समय-सीमा 22 सितंबर तक बढ़ाई गई। 22 सितंबर को फिर अतिरिक्त समय मांगा गया और 23 सितंबर की सुनवाई में सांसदों की ओर से चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने की बात कही गई।

तीन महीने वाली समय-सीमा का मामला क्या है?

सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के 2020 के Keisham Meghachandra Singh बनाम Speaker, Manipur Legislative Assembly फैसले का भी उल्लेख हुआ। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दल-बदल से जुड़ी अयोग्यता याचिकाओं पर स्पीकर को उचित समय के भीतर फैसला करना चाहिए और सामान्य परिस्थितियों में तीन महीने की अवधि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।23 सितंबर की सुनवाई में इसी फैसले के संदर्भ में अदालत ने कार्यवाही को जल्द पूरा करने की जरूरत बताई। कुछ रिपोर्टों में जस्टिस बागची की टिप्पणी के आधार पर तीन महीने बीतने को गंभीर चिंता के संकेत के रूप में बताया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तीन महीने को एक कठोर और अनिवार्य डेडलाइन के रूप में लागू नहीं किया और ओम बिरला को कोई निश्चित अंतिम तारीख नहीं दी।

किन 20 सांसदों के खिलाफ कार्यवाही चल रही है?

अयोग्यता की याचिकाओं में काकोलि घोष दस्तीदार, सुदीप बंद्योपाध्याय, शताब्दी रॉय, प्रसून बनर्जी, रचना बनर्जी, जगदीश चंद्र बरमा बसुनिया, पार्थ भौमिक, अरूप चक्रवर्ती, अधिकारी दीपक देव, सायनी घोष, बापी हलदार, मोहम्मद अबू ताहेर खान, कालीपद सरेन खेरवाल, असीत कुमार माल, जून मालिया, मिताली बाग, खलीलुर रहमान, माला रॉय, शर्मिला सरकार और यूसुफ पठान शामिल हैं।इन सभी के खिलाफ कार्रवाई की मांग इस आधार पर की गई है कि उन्होंने TMC से अलग होकर NCPI के साथ जाने का फैसला किया। हालांकि, इस मामले में अंतिम फैसला अभी बाकी है।

Tenth Schedule यानी दल-बदल कानून क्या है?

संविधान की 10वीं अनुसूची, जिसे आम तौर पर दल-बदल कानून कहा जाता है, संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों की कुछ परिस्थितियों में अयोग्यता से संबंधित है। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के राजनीतिक दल बदलने की स्थिति में सदस्यता से जुड़े नियम तय करना है।मौजूदा विवाद में मुख्य कानूनी सवाल यह है कि 20 सांसदों का NCPI के साथ जाना TMC की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ने के बराबर है या फिर इसे संविधान में मान्य विलय के रूप में देखा जा सकता है। इस सवाल पर दोनों पक्षों की अलग-अलग दलीलें हैं और अंतिम निर्णय संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया में होना है।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर की सुनवाई में बागी सांसदों के चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने की बात रिकॉर्ड की है। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई होगी। इस दौरान लोकसभा अध्यक्ष के सामने चल रही अयोग्यता की कार्यवाही भी जारी रहेगी।अभी अदालत ने ओम बिरला के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की है। उसने केवल जल्द फैसला लेने की अपेक्षा जताई है। इसलिए फिलहाल 20 सांसदों की लोकसभा सदस्यता को लेकर अंतिम स्थिति तय नहीं हुई है। यह भी स्पष्ट नहीं हुआ है कि उनके NCPI में जाने को संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता माना जाएगा या वैध विलय के दावे को स्वीकार किया जाएगा।

FAQ (Frequently Asked Questions):

सुप्रीम कोर्ट ने TMC rebel MPs disqualification case में क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से 20 बागी TMC सांसदों की अयोग्यता से जुड़ी कार्यवाही पर जल्द फैसला लेने की उम्मीद जताई। हालांकि, कोर्ट ने कोई निश्चित डेडलाइन तय नहीं की।

Om Birla को Supreme Court ने कोई time limit क्यों नहीं दी?

स्पीकर की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत को स्पीकर का शेड्यूल तय नहीं करना चाहिए और सांसदों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए। कोर्ट ने इस दलील के बीच कोई अनिवार्य समय-सीमा तय नहीं की।

TMC rebel MPs के खिलाफ disqualification proceedings क्यों चल रही हैं?

TMC का आरोप है कि 20 सांसदों का NCPI के साथ जाना स्वेच्छा से TMC की सदस्यता छोड़ने के बराबर है और इससे 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता लागू हो सकती है। बागी सांसदों का कहना है कि उनका कदम वैध विलय के दायरे में आता है।

इस मामले में कितने TMC MPs शामिल हैं?

अयोग्यता की कार्यवाही 20 लोकसभा सांसदों के खिलाफ चल रही है।

Abhishek Banerjee ने Supreme Court का रुख क्यों किया?

अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया कि लोकसभा अध्यक्ष के सामने लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने में देरी हो रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कार्यवाही का जल्द निपटारा कराने की मांग की।

Tenth Schedule defection law क्या है?

संविधान की 10वीं अनुसूची दल-बदल के आधार पर संसद और विधानसभाओं के सदस्यों की अयोग्यता से जुड़े प्रावधान तय करती है। मौजूदा मामले में इसी के तहत यह तय होना है कि 20 सांसदों का TMC से अलग होकर NCPI के साथ जाना अयोग्यता का आधार बनता है या वैध विलय के दायरे में आता है।

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