FDI नियमों में बदलाव के बाद भी चीन को क्यों चाहिए भारत की मंजूरी? सरकार ने साफ किया नियम
केंद्र सरकार ने हाल ही में उन देशों से आने वाले निवेश से जुड़े नियमों में कुछ बदलाव को मंजूरी दी है जो भारत के साथ जमीन की सीमा साझा करते हैं। इस फैसले के बाद उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) ने साफ किया है
केंद्र सरकार ने हाल ही में उन देशों से आने वाले निवेश से जुड़े नियमों में कुछ बदलाव को मंजूरी दी है जो भारत के साथ जमीन की सीमा साझा करते हैं। इस फैसले के बाद उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) ने साफ किया है कि चीन, हांगकांग और अन्य सीमावर्ती देशों में पंजीकृत कंपनियों को भारत में निवेश के लिए अभी भी सरकार की मंजूरी लेनी होगी।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों में जो राहत दी गई है, वह केवल उन विदेशी कंपनियों के लिए है जो इन सीमावर्ती देशों में स्थित नहीं हैं, लेकिन जिनमें इन देशों के निवेशकों की छोटी हिस्सेदारी है।
किसे मिली है राहत?
नए नियमों के अनुसार अगर किसी विदेशी कंपनी में सीमावर्ती देश के निवेशकों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से कम है और उनका नियंत्रण नहीं है, तो ऐसे मामलों में निवेश को अब ऑटोमैटिक रूट के तहत अनुमति मिल सकती है।
इसका मतलब यह है कि ऐसे निवेश के लिए पहले की तरह हर बार सरकार की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि निवेश से जुड़ी जानकारी संबंधित भारतीय कंपनी को DPIIT को देनी होगी।
Press Note 3 क्या है?
यह पूरा मामला Press Note 3 (2020) से जुड़ा है।
दरअसल, अप्रैल 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार ने यह नियम लागू किया था। उस समय चिंता थी कि आर्थिक संकट का फायदा उठाकर विदेशी कंपनियां भारतीय कंपनियों में सस्ते दाम पर हिस्सेदारी खरीद सकती हैं।
इसलिए सरकार ने तय किया कि भारत के साथ जमीन की सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाला कोई भी निवेश तभी संभव होगा जब उसे पहले सरकार से मंजूरी मिले।
किन देशों पर लागू होता है यह नियम?
भारत के साथ जमीन की सीमा साझा करने वाले देशों में शामिल हैं:
- चीन
- पाकिस्तान
- नेपाल
- भूटान
- बांग्लादेश
- म्यांमार
- अफगानिस्तान
इन देशों की कंपनियों या निवेशकों को भारत में निवेश करने से पहले सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य है।
नया बदलाव क्यों किया गया?
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, पुराने नियमों के कारण कई वैश्विक निवेश फंडों को भी दिक्कत हो रही थी।
उदाहरण के लिए BlackRock और Carlyle जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेश फंडों में कई देशों के निवेशक होते हैं। इनमें कभी-कभी चीनी निवेशकों की बहुत छोटी हिस्सेदारी भी होती है।
पहले नियमों के तहत अगर किसी कंपनी में सीमावर्ती देश का सिर्फ एक शेयर भी होता, तो उसे भी Press Note 3 के तहत सरकारी मंजूरी लेनी पड़ती थी। इससे निवेश प्रक्रिया धीमी हो जाती थी।
अब क्या बदलेगा?
DPIIT सचिव अमरदीप सिंह भाटिया के अनुसार अब “बेनेफिशियल ओनरशिप” यानी असली मालिकाना हिस्सेदारी की अवधारणा लागू की गई है।
अगर किसी विदेशी निवेशक में सीमावर्ती देश की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से कम और नियंत्रण रहित है, तो वह निवेश सीधे किया जा सकेगा।
लेकिन अगर कोई कंपनी सीधे चीन या किसी अन्य सीमावर्ती देश में स्थित है, तो उसे अभी भी सरकारी मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना होगा।
कुछ क्षेत्रों में मिलेगी तेज मंजूरी
सरकार ने कुछ खास क्षेत्रों के लिए निवेश मंजूरी की प्रक्रिया को तेज करने का भी फैसला किया है।
इन क्षेत्रों में आने वाले प्रस्तावों पर 60 दिनों के भीतर फैसला लेने की व्यवस्था की जाएगी।
इनमें शामिल क्षेत्र हैं:
- पूंजीगत सामान निर्माण (Capital Goods Manufacturing)
- इलेक्ट्रॉनिक पूंजीगत सामान
- इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स
- पॉलीसिलिकॉन और वेफर निर्माण
- उन्नत बैटरी कंपोनेंट
- रेयर अर्थ मैग्नेट
- रेयर अर्थ प्रोसेसिंग
सरकार का मानना है कि इन क्षेत्रों में निवेश से भारत में विनिर्माण क्षमता बढ़ेगी।
रेयर अर्थ मैग्नेट पर विशेष ध्यान
सरकार का एक बड़ा फोकस रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) के निर्माण पर भी है।
ये मैग्नेट कई आधुनिक तकनीकों के लिए बेहद जरूरी होते हैं। उदाहरण के तौर पर:
- इलेक्ट्रिक वाहन
- नवीकरणीय ऊर्जा प्रणाली
- इलेक्ट्रॉनिक्स
- एयरोस्पेस
- रक्षा उपकरण
इसी उद्देश्य से सरकार ने दिसंबर 2025 में 7,280 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी थी ताकि भारत में इन मैग्नेट का निर्माण बढ़ाया जा सके।
निवेश को बढ़ावा देने की कोशिश
सरकार का मानना है कि नए नियमों से विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा।
DPIIT के अनुसार, इससे भारतीय कंपनियों को विदेशी पूंजी जुटाने में आसानी होगी और वे नई तकनीक तक पहुंच बना सकेंगी।
इसके साथ ही संयुक्त उद्यम (Joint Venture) और तकनीकी साझेदारी के जरिए घरेलू उत्पादन भी मजबूत हो सकता है।
लंबित आवेदनों का क्या होगा?
अभी Press Note 3 के तहत लगभग 600 निवेश प्रस्ताव लंबित हैं।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इनमें से कई प्रस्ताव नए नियमों के तहत दो श्रेणियों में आ सकते हैं:
- जिनमें सीमावर्ती देशों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से कम है
- जो तेज मंजूरी वाली प्रक्रिया में आ सकते हैं
पहले प्रकार के मामलों में कंपनियां सीधे निवेश कर सकेंगी और बाद में जानकारी जमा कर सकती हैं। जबकि दूसरे प्रकार के मामलों में कंपनियां अपने आवेदन दोबारा जमा कर सकती हैं।
नई ऑनलाइन प्रणाली भी बनेगी
सरकार निवेश प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल भी तैयार कर रही है।
इस पोर्टल के जरिए निवेशक अपनी जानकारी जमा कर सकेंगे और मंजूरी की प्रक्रिया को ट्रैक भी कर पाएंगे।
तेज मंजूरी वाली प्रक्रिया के लिए भी इसी पोर्टल पर अलग व्यवस्था की जाएगी ताकि 60 दिनों की समय सीमा का पालन हो सके।
सुरक्षा जांच पहले की तरह जारी रहेगी
हालांकि नियमों में कुछ ढील दी गई है, लेकिन सरकार ने साफ किया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सभी जरूरी जांच और मंजूरी की प्रक्रिया जारी रहेगी।
यानी निवेश से जुड़े संवेदनशील मामलों में सुरक्षा एजेंसियों की समीक्षा पहले की तरह ही होगी।
भारत में चीन का निवेश कितना है?
आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल विदेशी निवेश में चीन की हिस्सेदारी बहुत बड़ी नहीं है।
अप्रैल 2000 से दिसंबर 2025 के बीच भारत में आए कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में चीन की हिस्सेदारी करीब 0.32 प्रतिशत रही है, जो लगभग 2.51 अरब डॉलर के बराबर है।
इस आधार पर चीन निवेश के मामले में भारत में लगभग 23वें स्थान पर है।
आगे क्या होगा?
सरकार के इस फैसले को निवेश नियमों को संतुलित बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखा गया है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक निवेशकों के लिए प्रक्रिया को थोड़ा आसान बनाने की कोशिश भी की गई है।
अब इन बदलावों को आधिकारिक रूप से अधिसूचित करने के बाद ही ये पूरी तरह लागू होंगे।