Private Hospital Charges: प्राइवेट अस्पतालों की फीस पर सवाल, प्रति बेड ₹55 लाख तक सरप्लस का दावा - क्या लगेगी लगाम?
निजी अस्पतालों के बढ़ते इलाज खर्च के बीच जेएसए और डब्ल्यूजीए ने अस्पताल शुल्क, दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स पर अधिकतम कीमत व मार्जिन तय करने की मांग की है। संगठनों के अनुसार कुछ कॉरपोरेट अस्पताल प्रति बेड सालाना लाखों रुपए का सरप्लस कमा रहे हैं।
भारत में बढ़ते Private Hospital Charges को लेकर मरीजों के अधिकारों से जुड़े दो संगठनों ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। जन स्वास्थ्य अभियान (JSA) और वर्किंग ग्रुप ऑन एक्सेस टू मेडिसिन्स एंड ट्रीटमेंट (WGA) का कहना है कि निजी अस्पतालों में इलाज, दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स के लिए मनमाने और बहुत ज्यादा चार्ज लिए जा रहे हैं। संगठनों ने निजी अस्पतालों की फीस और दवाओं-मेडिकल डिवाइस पर मुनाफे की सीमा तय करने की मांग की है। उनका दावा है कि कुछ बड़े कॉरपोरेट अस्पताल समूह खर्च और टैक्स काटने के बाद भी प्रति बेड सालाना ₹22 लाख से ₹55 लाख तक का सरप्लस कमा रहे हैं।

मरीजों पर बढ़ते बिल, निजी अस्पतालों के चार्ज पर सवाल
JSA और WGA ने संयुक्त बयान में कहा कि भारत में निजी अस्पतालों की ओर से मरीजों से लिए जाने वाले इलाज, प्रक्रियाओं, सेवाओं, दवाओं और कंज्यूमेबल्स के रेट को नियंत्रित करने की प्रभावी राष्ट्रीय व्यवस्था नहीं है। उनका कहना है कि इसी वजह से मरीजों को इलाज के दौरान अलग-अलग मदों में ऐसे चार्ज का सामना करना पड़ता है, जिनकी कीमतों को लेकर पारदर्शिता कम है।संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकारों से निजी अस्पतालों में प्रक्रियाओं और सेवाओं के लिए अधिकतम चार्ज तय करने के साथ दवाओं, मेडिकल डिवाइस और मेडिकल कंज्यूमेबल्स पर ट्रेड मार्जिन सीमित करने की मांग की है।
JSA के सह-संयोजक और डॉक्टर अभय शुक्ला ने कुछ कॉरपोरेट अस्पताल समूहों की सालाना वित्तीय रिपोर्ट और EBITDA के आधार पर सरप्लस का विश्लेषण किया है। उनके मुताबिक 2024-25 में पांच अस्पताल समूहों में प्रति बेड अनुमानित सरप्लस ₹22 लाख से ₹31 लाख के बीच रहा। एक अस्पताल समूह के लिए 2025-26 में यह अनुमान ₹55 लाख प्रति बेड तक पहुंचा। ये आंकड़े JSA के विश्लेषण और दावे पर आधारित हैं, न कि सरकार की ओर से तय किए गए आंकड़े।
इस मामले में निजी अस्पतालों का प्रतिनिधित्व करने वाले एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स ऑफ इंडिया से भी प्रतिक्रिया मांगी गई थी, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक उसका जवाब नहीं मिला।
2010 का कानून है, लेकिन पूरे देश में लागू नहीं
निजी अस्पतालों के नियमन की चर्चा में क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट, 2010 का जिक्र लगातार होता रहा है। इस कानून का उद्देश्य क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स के रजिस्ट्रेशन और नियमन के साथ इलाज की न्यूनतम सुविधाओं और सेवाओं के मानक तय करना है।हालांकि इसे पूरे देश में लागू कानून मानना सही नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक यह कानून फिलहाल 19 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में अपनाया गया है। दिल्ली समेत कुछ राज्य इसके दायरे में नहीं हैं। स्वास्थ्य राज्य का विषय होने के कारण निजी अस्पतालों की फीस और ओवरचार्जिंग से जुड़े मामलों में राज्य सरकारों की भूमिका भी अहम है।
केंद्र सरकार पहले भी संसद में बता चुकी है कि जहां क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट लागू है, वहां संबंधित नियमों के तहत अस्पतालों को अपनी सेवाओं के रेट प्रदर्शित करने और तय प्रक्रिया के अनुसार चार्ज लेने का प्रावधान है। इसके अमल और निगरानी की जिम्मेदारी संबंधित राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की होती है।
यही वजह है कि JSA और WGA अब सिर्फ रेट दिखाने की व्यवस्था नहीं, बल्कि निजी अस्पतालों की प्रक्रियाओं, सेवाओं और मेडिकल उत्पादों पर अधिकतम कीमत या मार्जिन तय करने की मांग कर रहे हैं।
दवाओं पर 10 गुना तक मार्जिन का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
निजी अस्पतालों में दवाओं की कीमत को लेकर मामला हाल में सुप्रीम कोर्ट में भी उठा। कोर्ट ने अस्पतालों की ओर से दवाओं पर लगाए जा रहे भारी मार्कअप पर चिंता जताई। सुनवाई में एक जरूरी कैंसर की दवा का उदाहरण सामने आया, जिसकी रिटेल कीमत ₹2,700 थी, जबकि मरीज से उसका MRP ₹27,000 लिया जा रहा था।यहां मार्कअप का मतलब उस अंतर से है जो किसी उत्पाद की खरीद कीमत और मरीज से ली जाने वाली कीमत के बीच होता है। कोर्ट ने केंद्र से दवाओं पर ऐसे मार्जिन को नियंत्रित करने की संभावना पर विचार करने को कहा। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी माना कि इस मुद्दे पर ध्यान देने की जरूरत है और अधिकारियों के साथ इस पर चर्चा करने की बात कही।
JSA-WGA ने इसी तरह की घटनाओं को आधार बनाते हुए कहा है कि दवाओं और मेडिकल सामान पर बहुत ज्यादा मार्जिन का सीधा असर मरीजों की जेब पर पड़ता है।
मेडिकल डिवाइस पर 29 गुना तक कीमत का अंतर
दवाओं के साथ मेडिकल डिवाइस की कीमतों को लेकर भी हाल में सवाल उठे हैं। महाराष्ट्र के ड्रग रेगुलेटर की एक जांच में कुछ मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और MRP के बीच बहुत बड़ा अंतर सामने आया।रिपोर्ट के मुताबिक एक IV सेट की ट्रेड कीमत ₹11.05 थी, जबकि उस पर ₹325 का MRP दर्ज था। यानी खरीद कीमत के मुकाबले करीब 29 गुना का अंतर। इसी तरह ₹6.75 में खरीदी गई एक सिरिंज पर ₹57.20 का MRP और ₹29.41 की खरीद कीमत वाले कैथेटर पर ₹310 का MRP पाया गया।
महाराष्ट्र के ड्रग रेगुलेटर ने केंद्र से इस तरह के प्राइसिंग गैप को दूर करने की जरूरत बताई थी। इसके बाद मेडिकल डिवाइस की कीमत और मार्जिन को लेकर बहस और तेज हुई।
मरीजों के लिए बढ़ता खर्च सबसे बड़ी चिंता
JSA और WGA का कहना है कि निजी अस्पतालों में रेवेन्यू टारगेट और वित्तीय प्रोत्साहन डॉक्टरों पर महंगी जांच या इलाज के विकल्प सुझाने का दबाव बना सकते हैं। संगठनों ने इसे एक संभावित समस्या के रूप में उठाया है, न कि हर निजी अस्पताल या डॉक्टर पर लागू होने वाले आरोप के रूप में।इलाज का खर्च बढ़ने का असर खास तौर पर उन मरीजों पर पड़ता है जिनके पास पर्याप्त हेल्थ इंश्योरेंस कवर नहीं है। महंगी दवाएं, मेडिकल डिवाइस, जांच, अस्पताल की फीस और कंज्यूमेबल्स मिलकर अंतिम बिल को काफी बढ़ा सकते हैं। इससे मरीजों का आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च बढ़ता है।
इसी वजह से JSA और WGA ने केंद्र और राज्यों से दवाओं, मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स के ट्रेड मार्जिन पर सीमा तय करने के साथ निजी अस्पतालों की प्रक्रियाओं और सेवाओं के चार्ज के लिए भी कैप तय करने की मांग की है।
कांग्रेस ने भी सरकार पर साधा निशाना
निजी अस्पतालों और दवाओं की कीमतों के मुद्दे पर कांग्रेस ने भी केंद्र सरकार पर हमला बोला। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने महंगी दवाओं को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा और कहा कि मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।रमेश ने सोशल मीडिया पोस्ट में एक मीडिया रिपोर्ट साझा करते हुए आरोप लगाया कि अस्पतालों में दवाओं की कीमत मरीजों पर भारी पड़ रही है। उन्होंने उत्तर प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों और निजी अस्पतालों की फार्मेसी की जांच का भी जिक्र किया, जहां दवाओं की खरीद कीमत और पैकेज पर छपे MRP के बीच बड़े अंतर की बात सामने आई थी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर राजनीतिक तंज भी किया।
फिलहाल निजी अस्पतालों की फीस पर देशभर में एक समान कैप लागू नहीं है। क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट मौजूद है, लेकिन उसका दायरा और लागू करने की व्यवस्था राज्यों के हिसाब से अलग है। ऐसे में JSA और WGA की मांग का मुख्य जोर इलाज की कीमतों में पारदर्शिता, दवाओं और मेडिकल सामान पर उचित मार्जिन और मरीजों से लिए जाने वाले अस्पताल शुल्क की अधिकतम सीमा तय करने पर है।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Private Hospital Charges पर Cap लगाने की मांग क्यों हो रही है?
JSA और WGA का कहना है कि निजी अस्पतालों में इलाज, दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स के लिए कई बार बहुत ज्यादा और मनमाने चार्ज लिए जाते हैं। इसलिए उन्होंने अस्पतालों की फीस और मेडिकल उत्पादों के मार्जिन पर सीमा तय करने की मांग की है।
India में Healthcare Costs इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही हैं?
इलाज के खर्च में अस्पताल की फीस, जांच, दवाएं, मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स जैसे कई खर्च शामिल होते हैं। इनकी कीमतों में अंतर और पारदर्शिता की कमी मरीज का कुल बिल बढ़ा सकती है।
Private Hospitals के Charges को कौन Regulate करता है?
स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए निजी अस्पतालों की फीस को नियंत्रित करने में राज्य सरकारों की बड़ी भूमिका है। क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट, 2010 कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू है, लेकिन पूरे देश में नहीं।
Hospital Bills पर Government Cap कैसे लगाया जा सकता है?
सरकार अस्पताल की अलग-अलग प्रक्रियाओं और सेवाओं के लिए अधिकतम रेट तय कर सकती है। इसके साथ दवाओं, मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स पर ट्रेड मार्जिन की सीमा और रेट की पारदर्शी जानकारी देने के नियम लागू किए जा सकते हैं।
Rising Healthcare Costs का Patients पर क्या असर पड़ रहा है?
महंगे इलाज से मरीजों का अपनी जेब से होने वाला खर्च बढ़ता है। जिन मरीजों का हेल्थ इंश्योरेंस कवर कम है या जो पूरी तरह बीमा पर निर्भर नहीं हैं, उन पर इसका आर्थिक दबाव ज्यादा पड़ सकता है।