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Ravi River Irrigation Project: 44 साल बाद जम्मू-कश्मीर को मिला रावी का पानी,लेकिन जर्जर नहर कैसे बनी सबसे बड़ी रुकावट?

शाहपुर कंडी बांध से 4 मई 2026 को 44 साल बाद रावी का पानी जम्मू-कश्मीर की नहर में पहुंचा। लेकिन पुरानी नहर की क्षमता 1,150 से घटकर 400 क्यूसेक रह गई है। मरम्मत के लिए सरकार ने 534 करोड़ रुपये मांगे हैं।

Ravi River Irrigation Project: 44 साल बाद जम्मू-कश्मीर को मिला रावी का पानी,लेकिन जर्जर नहर कैसे बनी सबसे बड़ी रुकावट?

Ravi River Irrigation Project: जम्मू-कश्मीर को रावी नदी के पानी का पूरा हिस्सा पहुंचाने के लिए पंजाब के पठानकोट जिले में बने शाहपुर कंडी बांध से 4 मई 2026 को रावी नहर में पानी छोड़ा गया था। करीब 44 साल से अटकी इस परियोजना से कठुआ और सांबा के सूखे इलाकों में सिंचाई की उम्मीद जगी, लेकिन अब पुरानी नहर की खराब हालत बड़ी बाधा बन गई है। नहर की पानी ले जाने की क्षमता 1,150 क्यूसेक से घटकर करीब 400 क्यूसेक रह गई है। इसे ठीक करने के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने केंद्रीय जल आयोग से 534 करोड़ रुपये की मांग की है।

शाहपुर कंडी बैराज: 1982 में, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस परियोजना की आधारशिला रखी थी।
शाहपुर कंडी बैराज: 1982 में, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस परियोजना की आधारशिला रखी थी।

1,150 क्यूसेक पानी पहुंचाने वाली नहर में अब सिर्फ 400 क्यूसेक की क्षमता

रावी नहर जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों के मैदानी इलाकों में सिंचाई का प्रमुख माध्यम है। अधिकारियों के मुताबिक, नहर के भीतर जंगली वनस्पति उगने, इसकी लाइनिंग और अन्य संरचनाओं के खराब होने तथा वितरण नेटवर्क की हालत बिगड़ने से इसकी क्षमता प्रभावित हुई है।शाहपुर कंडी बांध से जम्मू-कश्मीर को प्रतिदिन मिलने वाले पानी की मात्रा और नहर की सुरक्षित जल-वहन क्षमता अलग-अलग बातें हैं। बांध से राज्य के हिस्से का 1,150 क्यूसेक पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था है, लेकिन मौजूदा स्थिति में नहर पूरे पानी को आगे पहुंचाने में सक्षम नहीं है। इसी वजह से उपलब्ध पानी का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
जम्मू-कश्मीर सरकार ने नहर और उसके वितरण नेटवर्क की मरम्मत तथा मजबूती के लिए 534 करोड़ रुपये का प्रस्ताव केंद्रीय जल आयोग को भेजा है। अधिकारियों के अनुसार, धनराशि मिलने और काम शुरू होने के बाद भी नहर को पूरी क्षमता से चलाने में समय लगेगा। सरकार का अनुमान है कि मरम्मत और सुधार का काम पूरा होने में करीब दो साल लग सकते हैं।

कठुआ और सांबा की सूखी जमीन को मिलेगा फायदा

शाहपुर कंडी परियोजना जम्मू-कश्मीर के लिए इसलिए अहम है, क्योंकि इससे रावी नदी का पानी महंगे लिफ्ट इरिगेशन सिस्टम के बजाय गुरुत्वाकर्षण के सहारे नहर में पहुंचाया जा सकता है। पहले पानी को पंपों की मदद से ऊपर उठाकर नहर में डालना पड़ता था। इसके बावजूद नहर के आखिरी हिस्से तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पाता था।करीब 79.8 किलोमीटर लंबी रावी नहर, रावी-तवी सिंचाई नहर नेटवर्क का हिस्सा है। यह सांबा जिले के विजयपुर क्षेत्र में जम्मू से आने वाली तवी नहर से जुड़ती है। इसका उद्देश्य कठुआ और सांबा के कंडी क्षेत्र की सूखी जमीन को सिंचाई उपलब्ध कराना है, जहां प्राकृतिक जल संसाधन सीमित हैं और खेती की उत्पादकता प्रभावित होती है।
परियोजना से जम्मू-कश्मीर में करीब 32,173 हेक्टेयर जमीन को सिंचाई सुविधा मिलने की संभावना है। सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, जम्मू, सांबा और कठुआ में रावी और तवी नहरों का संयुक्त वितरण नेटवर्क करीब 600 किलोमीटर है। इससे 75,652 हेक्टेयर सूखी जमीन की सिंचाई की क्षमता है, लेकिन फिलहाल इस क्षमता का लगभग आधा ही इस्तेमाल हो रहा है।

44 साल तक क्यों अटकी रही शाहपुर कंडी परियोजना?

शाहपुर कंडी बांध की योजना तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के बीच हुए समझौते के बाद बनाई गई थी। परियोजना की आधारशिला 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रखी थी, लेकिन निर्माण कार्य मई 1999 में शुरू हो पाया। इसके बाद भी फंड की कमी के कारण काम रुकता रहा।2013 में निर्माण कार्य ने फिर गति पकड़ी, लेकिन 2014 में पंजाब और जम्मू-कश्मीर के बीच विवाद के चलते इसे रोकना पड़ा। दोनों पक्षों के बीच नवंबर 2018 में सहमति बनने के बाद काम दोबारा शुरू हुआ। वर्ष 2025 में बांध परियोजना पूरी हुई और 4 मई 2026 को इससे रावी नहर में पानी छोड़ा गया।
इस दौरान जम्मू-कश्मीर ने पानी की कमी दूर करने के लिए 1994-95 में बसंतपुर और लखनपुर में पंपिंग स्टेशन लगाए थे। इनके जरिए रावी नदी से पानी उठाकर पहले से बनी नहर में डाला जाता था। हालांकि, इस व्यवस्था के बावजूद नहर के अंतिम हिस्से तक पानी पहुंचाने में परेशानी बनी रही।
शाहपुर कंडी बांध बहुउद्देशीय परियोजना है। इसके तहत दो बिजली घरों में कुल सात जनरेटर लगाने की योजना है, जिनकी संयुक्त स्थापित क्षमता 206 मेगावाट है। यह परियोजना भारत को 1960 की सिंधु जल संधि के तहत अपने हिस्से में आने वाली पूर्वी नदियों के पानी का बेहतर इस्तेमाल करने में भी मदद करती है। रावी, ब्यास और सतलुज पूर्वी नदियां हैं, जिनका पानी संधि के तहत भारत के हिस्से में रखा गया था।

रामगढ़ में हफ्ते में दो दिन मिल रहा पानी

नहर की सीमित क्षमता का असर पानी की नियमित आपूर्ति पर भी पड़ रहा है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने पिछले महीने भाजपा विधायक देविंदर सिंह के एक सवाल के जवाब में माना कि शाहपुर कंडी बांध से सीमित मात्रा में पानी मिलने के कारण रामगढ़ क्षेत्र में लगातार आपूर्ति सुनिश्चित नहीं की जा सकती।सरकार के अनुसार, फिलहाल स्वीकृत वाराबंदी व्यवस्था के तहत रामगढ़ क्षेत्र में हफ्ते में दो दिन पानी दिया जा रहा है। हालांकि, बांध से पानी की आपूर्ति शुरू होने के बाद रावी नहर प्रणाली में कुल उपलब्धता में सुधार हुआ है।
अब चुनौती यह है कि नहर की मरम्मत करके उसकी क्षमता को मूल डिजाइन के करीब लाया जाए, ताकि कठुआ, सांबा और जम्मू के किसानों को नियमित सिंचाई मिल सके। 534 करोड़ रुपये के प्रस्ताव पर मंजूरी और धन जारी होने के बाद ही इस दिशा में व्यापक काम आगे बढ़ सकेगा।

FAQ (Frequently Asked Questions):

जम्मू-कश्मीर को 44 साल बाद रावी नदी का पानी कैसे मिला?

पंजाब के पठानकोट जिले में बने शाहपुर कंडी बांध से 4 मई 2026 को रावी नहर में पानी छोड़ा गया। इससे जम्मू-कश्मीर को रावी नदी के अपने हिस्से का पानी नहर के जरिए मिलने लगा।

Ravi River Water Project जम्मू-कश्मीर के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

यह परियोजना कठुआ, सांबा और जम्मू के सूखे इलाकों में सिंचाई की सुविधा बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है। इससे महंगे पंपिंग सिस्टम पर निर्भरता कम करने और करीब 32,173 हेक्टेयर जमीन को सिंचाई सुविधा देने की उम्मीद है।

पानी की आपूर्ति में पुरानी नहर बाधा क्यों बन रही है?

नहर में जंगली वनस्पति उगने, लाइनिंग और संरचनाओं के खराब होने तथा वितरण नेटवर्क की स्थिति बिगड़ने से इसकी क्षमता 1,150 क्यूसेक से घटकर करीब 400 क्यूसेक रह गई है।

रावी नदी का पानी किन क्षेत्रों तक पहुंचाया जाएगा?

इस परियोजना का मुख्य लाभ जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों के कंडी क्षेत्र को मिलेगा। रावी-तवी नहर नेटवर्क के जरिए जम्मू क्षेत्र की कृषि भूमि तक भी सिंचाई का पानी पहुंचाने की योजना है।

पुरानी नहर की मरम्मत क्यों जरूरी है?

मरम्मत और मजबूती के बिना नहर बांध से उपलब्ध पूरे पानी को सुरक्षित तरीके से आगे नहीं पहुंचा सकती। सरकार ने इस काम के लिए केंद्रीय जल आयोग से 534 करोड़ रुपये मांगे हैं।

इस परियोजना से किसानों को क्या फायदा हो सकता है?

नहर की क्षमता बहाल होने पर किसानों को अधिक नियमित सिंचाई मिल सकती है। इससे सूखी जमीन पर खेती की संभावनाएं बढ़ेंगी और पानी उठाने के लिए महंगे पंपों पर निर्भरता कम हो सकती है।

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