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Nepal Gorkha Flood : नेपाल में बार-बार क्यों आ रही हैं विनाशकारी बाढ़, क्या भारत के लिए भी खतरे की घंटी?

नेपाल के गोरखा जिले में 11 अक्टूबर 2026 को बूढ़ी गंडकी नदी में अचानक बाढ़ से करीब 35 घर और 6 पुल बह गए, जबकि कम से कम 5 लोग लापता हैं। 341 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना को भी नुकसान पहुंचा। बिहार में गंडक नदी की निगरानी बढ़ाई गई।

Nepal Gorkha Flood : नेपाल में बार-बार क्यों आ रही हैं विनाशकारी बाढ़, क्या भारत के लिए भी खतरे की घंटी?

Nepal Gorkha Flood : नेपाल में अगस्त में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद अब 11 अक्टूबर 2026 को बूढ़ी गंडकी नदी में अचानक आई बाढ़ ने एक बार फिर भारी तबाही मचाई है। गोरखा जिले में भूस्खलन के कारण नदी का रास्ता बाधित होने और फिर पानी का तेज बहाव नीचे आने की आशंका है। शुरुआती स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 35 घर और कम से कम 6 पुल बह गए, जबकि कई लोग लापता हुए। बाद की रिपोर्टों में कम से कम 5 लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई है। बाढ़ में 341 मेगावाट की बूढ़ी गंडकी जलविद्युत परियोजना के निर्माण स्थल और मशीनों को भी नुकसान पहुंचा है। नेपाल की सेना, पुलिस और आपदा प्रबंधन एजेंसियां राहत-बचाव अभियान चला रही हैं। इस घटना के बाद बिहार में भी गंडक नदी के जलस्तर और तटबंधों की निगरानी बढ़ा दी गई है।

सुबह 4 बजे बस्तियों में घुसा पानी, घर और पुल बह गए

नेपाल के गोरखा जिले की चुमनुब्री और धारचे ग्रामीण नगरपालिकाओं के आसपास रविवार तड़के बाढ़ का पानी तेजी से नीचे की ओर आया। स्थानीय लोगों को अचानक बढ़ते जलस्तर के कारण घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा। बाढ़ से सड़क संपर्क, बिजली और संचार व्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा है।स्थानीय स्तर पर जारी शुरुआती स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, चुमनुब्री क्षेत्र के पायू और बगर गांवों में करीब 35 घर बह गए। कम से कम 6 पुलों को नुकसान पहुंचा या वे पूरी तरह बह गए। इनमें पैदल चलने के लिए बने सस्पेंशन ब्रिज और वाहनों की आवाजाही वाले पुल शामिल हैं। गोरखा और धादिंग जिलों को जोड़ने वाला एक पुल भी बाढ़ की चपेट में आया। कुछ पशुशालाएं और मवेशी भी बह गए।
लापता लोगों की संख्या को लेकर शुरुआती रिपोर्टों में अंतर रहा है। स्थानीय रिपोर्ट में 10 लोगों के लापता होने की आशंका जताई गई थी, जबकि नेपाल की आपदा प्रबंधन एजेंसी और बाद की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में कम से कम 5 लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई। इनमें दो महिलाएं और तीन पुरुष शामिल बताए गए हैं। शुरुआती रिपोर्टों में किसी की मौत की पुष्टि नहीं हुई थी। राहत-बचाव अभियान के दौरान लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।

भूस्खलन से नदी का रास्ता रुका, फिर अचानक आया तेज बहाव

अधिकारियों की शुरुआती जांच के मुताबिक, गोरखा जिले के ऊपरी पहाड़ी क्षेत्र में भूस्खलन के कारण नदी का रास्ता बाधित हुआ। इससे पानी जमा होने लगा और कुछ समय बाद मलबे से बना अस्थायी अवरोध टूटने पर पानी तेजी से निचले इलाकों की ओर बह निकला। इस तरह की घटना को लैंडस्लाइड-डैम आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है।पहाड़ी नदी में जब चट्टानें, मिट्टी और मलबा गिरकर पानी का रास्ता रोक देते हैं, तो पीछे अस्थायी जलाशय जैसी स्थिति बन सकती है। अगर यह अवरोध पानी का दबाव सहन नहीं कर पाता और अचानक टूट जाता है, तो नीचे बसे गांवों में बहुत कम समय में बाढ़ आ सकती है। इस दौरान नदी अपने साथ बड़े पत्थर, पेड़ और निर्माण सामग्री भी बहा सकती है।
नेपाल में बूढ़ी गंडकी नदी की ताजा बाढ़ को भी इसी तरह के अवरोध से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, घटना की पूरी वजह और पानी के अचानक बढ़ने की परिस्थितियों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक, प्रारंभिक आकलन में नदी का रास्ता भूस्खलन से रुकने को बाढ़ का प्रमुख कारण माना गया है।

341 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना को नुकसान

बाढ़ से बूढ़ी गंडकी नदी पर बन रही 341 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना का निर्माण कैंप और वहां रखी मशीनें भी प्रभावित हुईं। पानी के तेज बहाव में निर्माण से जुड़ा सामान बह गया। इस घटना से क्षेत्र में चल रहे बुनियादी ढांचे के काम पर असर पड़ा है।बूढ़ी गंडकी नदी नेपाल के मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्र से होकर बहती है और गोरखा तथा धादिंग जिलों के लिए महत्वपूर्ण है। यह आगे त्रिशूली नदी में मिलती है। त्रिशूली का पानी देवघाट के पास नारायणी नदी प्रणाली का हिस्सा बनता है, जो भारत में गंडक के नाम से बिहार में प्रवेश करती है।
इसी नदी प्रणाली से जुड़ाव के कारण नेपाल में अचानक आई बाढ़ का असर केवल स्थानीय गांवों तक सीमित रहने की आशंका नहीं रहती। नदी में पानी का बहाव बढ़ने पर नीचे के इलाकों में भी जलस्तर पर नजर रखना जरूरी हो जाता है। हालांकि, नेपाल में आई हर बाढ़ से बिहार में बड़े पैमाने पर बाढ़ आना तय नहीं है। इसका वास्तविक असर पानी की मात्रा, नदी के बहाव और रास्ते में मौजूद जलाशयों व अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

437 सुरक्षाकर्मी तैनात, चार हेलिकॉप्टरों से बचाव अभियान

नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीआरआरएमए) ने राहत और बचाव के लिए नेपाली सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के कुल 437 सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया। प्रभावित और दुर्गम इलाकों से लोगों को निकालने के लिए नेपाली सेना के चार हेलिकॉप्टर भी लगाए गए।बाढ़ से सड़क और पुलों को नुकसान पहुंचने के कारण कुछ जगहों तक पहुंचना मुश्किल हो गया। ऐसे में हेलिकॉप्टरों की मदद से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और राहत सामग्री भेजने का काम किया गया। रिपोर्टों के अनुसार, बचाव अभियान के शुरुआती चरण में दर्जनों लोगों को निकाला गया। बाद की रिपोर्टों में बचाए गए लोगों की संख्या बढ़कर 80 से अधिक बताई गई, हालांकि अलग-अलग समय पर जारी आंकड़ों में अंतर है।
प्रशासन ने भूस्खलन और नदी के रास्ते में आए अवरोध की जांच के लिए भूवैज्ञानिकों और ड्रोन संचालकों की विशेष टीम भी भेजी। इसके साथ ही, जिन जगहों पर पुल बह गए हैं, वहां अस्थायी बेली ब्रिज लगाने की संभावना का आकलन किया जा रहा है, ताकि प्रभावित क्षेत्रों का संपर्क फिर से बहाल किया जा सके।

सुबह 6:40 बजे जारी हुआ अलर्ट, SMS से लोगों को चेतावनी

नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण ने रविवार सुबह 6 बजकर 40 मिनट पर बाढ़ की चेतावनी जारी की। इसमें बताया गया कि चुमनुब्री ग्रामीण नगरपालिका-6 की ओर से बूढ़ी गंडकी नदी में बड़ा बाढ़ प्रवाह आ रहा है। लोगों से नदी के किनारे जाने से बचने और सुरक्षित ऊंचे स्थानों पर रहने की अपील की गई।गोरखा जिला पुलिस कार्यालय के इंस्पेक्टर आकाश कंडेल के मुताबिक, प्रशासन ने सिरदिबास और धारचे ग्रामीण नगरपालिका के खोर्लाबेसी, माछाखोला, सोती, अरखेत और आरुघाट जैसे इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी।
एनडीआरआरएमए के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. धर्मराज उप्रेती ने बताया कि ऊपरी इलाके से बाढ़ का पानी आरुघाट पहुंचने में करीब तीन घंटे लग सकते हैं। इससे नीचे के इलाकों में रहने वाले लोगों को चेतावनी मिलने के बाद सुरक्षित जगहों पर जाने का समय मिल सकता है। प्रशासन ने SMS के जरिए भी लोगों को सतर्क किया।
बाढ़ की चेतावनी केवल गोरखा जिले तक सीमित नहीं रखी गई। नदी के निचले हिस्सों में रहने वाले लोगों को भी सतर्क रहने को कहा गया, क्योंकि पहाड़ी इलाकों में पानी का बहाव अचानक बढ़ने पर नीचे बसे क्षेत्रों तक उसका असर तेजी से पहुंच सकता है।

बिहार में गंडक के जलस्तर पर नजर, तटबंधों की निगरानी बढ़ी

नेपाल में बाढ़ के बाद बिहार में भी नदी के जलस्तर को लेकर सतर्कता बढ़ाई गई। बिहार के जल संसाधन विभाग ने नेपाल से मिली जानकारी के आधार पर गंडक और बूढ़ी गंडक नदी के जलस्तर तथा जलप्रवाह पर नजर रखने के निर्देश दिए। विभाग के मुताबिक, गंडक बैराज से पानी के बहाव में सुबह के शुरुआती घंटों में बढ़ोतरी का रुझान देखा गया, लेकिन बाद में इसमें गिरावट भी दर्ज की गई।विभाग ने संबंधित अधिकारियों को नदी के जलस्तर, जलप्रवाह और तटबंधों की स्थिति की लगातार निगरानी करने को कहा। सोहगीबरवा, शिकारपुर और भोथहा समेत नदी के किनारे बसे इलाकों में भी सतर्कता बढ़ाई गई। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि नेपाल से आने वाले पानी के वास्तविक प्रभाव का आकलन करें और जरूरत पड़ने पर समय रहते एहतियाती कदम उठाएं।
बिहार सरकार के आकलन के अनुसार, उस समय राज्य में बड़े खतरे की आशंका नहीं जताई गई थी, लेकिन प्रशासन को किसी भी तरह की लापरवाही नहीं बरतने के निर्देश दिए गए। दूसरी ओर, बिहार के आधिकारिक बाढ़ पूर्वानुमान पोर्टल पर 12 अक्टूबर को गंडक के कुछ निगरानी केंद्रों पर जलस्तर चेतावनी स्तर से ऊपर दर्ज किया गया था। इसलिए स्थिति पर लगातार नजर रखना जरूरी है।
गंडक नदी बिहार में पश्चिम चंपारण, गोपालगंज और वैशाली समेत कई जिलों के लिए महत्वपूर्ण है। नेपाल में बारिश, भूस्खलन या अचानक पानी छोड़े जाने से नदी का जलस्तर प्रभावित हो सकता है। हालांकि, बूढ़ी गंडकी में आई बाढ़ का बिहार के अलग-अलग इलाकों पर कितना असर पड़ेगा, इसका आकलन वास्तविक जलप्रवाह और निगरानी केंद्रों के आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है।

अगस्त की तबाही के बाद नेपाल फिर संकट में

बूढ़ी गंडकी में आई बाढ़ ऐसे समय हुई है, जब नेपाल अगस्त में आई विनाशकारी बाढ़ के नुकसान से उबरने की कोशिश कर रहा है। 26 अगस्त के आसपास चीन के तिब्बत क्षेत्र से लगी सीमा के पास शुरू हुई बाढ़ का असर भोटेकोशी नदी और आसपास के इलाकों में पड़ा था। तेज बहाव ने घरों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया था।नेपाल सरकार के बाद के आंकड़ों के मुताबिक, उस आपदा में 1,457 लोगों की मौत हुई और हजारों लोग लापता बताए गए। शुरुआती रिपोर्टों में 5,000 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी भी सामने आई थी। करीब 13,795 लोगों को बचाया गया और 12 जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचने की खबर थी। 5 अक्टूबर को नेपाल सरकार ने उस आपदा से जुड़े खोज और बचाव अभियान को समाप्त कर पुनर्वास तथा पुनर्निर्माण पर ध्यान देने की बात कही थी।
अगस्त की आपदा और अक्टूबर की बूढ़ी गंडकी बाढ़ के कारण अलग हो सकते हैं, लेकिन दोनों घटनाएं हिमालयी क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को सामने लाती हैं। यहां भूस्खलन, अत्यधिक बारिश, ग्लेशियरों में बदलाव और संकरी घाटियों में बढ़ते निर्माण के कारण जोखिम बढ़ सकता है।

26 अगस्त के आसपास चीन के तिब्बत क्षेत्र से लगी सीमा के पास शुरू हुई बाढ़ का असर भोटेकोशी नदी और आसपास के इलाकों में पड़ा था।
26 अगस्त के आसपास चीन के तिब्बत क्षेत्र से लगी सीमा के पास शुरू हुई बाढ़ का असर भोटेकोशी नदी और आसपास के इलाकों में पड़ा था।

हिमालय में अचानक बाढ़ आने के पीछे कई वजहें

हिमालय में बाढ़ केवल भारी बारिश से नहीं आती। कई बार कम समय में बहुत तेज बारिश से नदियों और छोटी धाराओं में पानी तेजी से बढ़ जाता है। पानी अपने साथ मिट्टी, पत्थर और पेड़ बहाकर नीचे के गांवों तक पहुंच सकता है।दूसरा बड़ा कारण भूस्खलन है। पहाड़ की ढलान से मिट्टी और चट्टानें खिसककर नदी का रास्ता रोक सकती हैं। इसके बाद जमा हुआ पानी जब अचानक अवरोध तोड़ता है, तो नीचे की ओर तेज बाढ़ आ सकती है। ग्लेशियरों और उनसे बनी झीलों में पानी बढ़ने या प्राकृतिक बांध टूटने से भी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी हिमनद झील फटने से बाढ़ आ सकती है। ग्लेशियर या चट्टानों का बड़ा हिस्सा टूटकर नदी में गिरने से भी अस्थायी अवरोध बन सकता है।
जलवायु परिवर्तन इन जोखिमों को और गंभीर बना सकता है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और कुछ हिमनद झीलों का आकार बढ़ रहा है। साथ ही, कई क्षेत्रों में बारिश का पैटर्न अधिक अनियमित और तीव्र हो रहा है। हालांकि, किसी खास बाढ़ का कारण केवल जलवायु परिवर्तन को बताने के लिए घटना से जुड़े वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी होते हैं।

ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे, बाढ़ के जोखिम वाले इलाके बढ़े

सितंबर 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से पानी की सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका पर खतरा बढ़ रहा है। सिस्टमइक और अन्य संस्थाओं के अध्ययन ने चेतावनी दी कि इस क्षेत्र की कई नदी प्रणालियां सदी के मध्य के आसपास ‘पीक वॉटर’ की स्थिति तक पहुंच सकती हैं। इसका मतलब है कि ग्लेशियरों से मिलने वाला पानी पहले अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचेगा और बाद में ग्लेशियर लगातार घटने के कारण इसकी मात्रा कम हो सकती है।ग्लेशियरों पर ब्लैक कार्बन का भी असर पड़ता है। यह ईंधन और जैविक पदार्थों के जलने से निकलने वाले कालिख जैसे सूक्ष्म कण हैं। जब ये बर्फ पर जमते हैं, तो उसकी सूर्य की रोशनी परावर्तित करने की क्षमता कम हो जाती है और वह ज्यादा गर्मी सोखने लगती है। एक हालिया रिपोर्ट में हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने में ब्लैक कार्बन की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। उत्सर्जन कम करना इस खतरे से निपटने का एक ऐसा उपाय है, जिस पर भारत और पड़ोसी देश सीधे कदम उठा सकते हैं।
9 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 2016 से 2023 के बीच नेपाल और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में नदी के करीब स्थित निर्माण वाले इलाकों का क्षेत्रफल 46% बढ़ा। अध्ययन में यह भी अनुमान लगाया गया कि 2026 में करीब 2.94 लाख लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते थे, जहां नदी के नजदीक होने के कारण बाढ़ का खतरा हो सकता है। ग्लेशियल झीलों से आने वाली संभावित बाढ़ के दायरे में आने वाले निर्माण वाले क्षेत्रों में भी वृद्धि दर्ज की गई। यह शोध नेपाल के साथ भारत और चीन के सीमावर्ती हिमालयी क्षेत्रों को भी शामिल करता है।
हिमालयी घाटियों में सड़कें, घर, होटल और जलविद्युत परियोजनाएं अक्सर नदियों के पास बनाई जाती हैं, क्योंकि पहाड़ों में समतल जमीन सीमित है। इससे विकास और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, लेकिन बाढ़ या भूस्खलन की स्थिति में नुकसान का खतरा भी बढ़ सकता है।

हिमालयी बाढ़ से निपटने के लिए पहले चेतावनी जरूरी

हिमालय में बाढ़ को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन समय पर चेतावनी, निगरानी और सुरक्षित निकासी से जान-माल का नुकसान कम किया जा सकता है। इसके लिए ग्लेशियरों, हिमनद झीलों, भूस्खलन संभावित ढलानों और नदी के जलस्तर की लगातार निगरानी जरूरी है।ऊंचाई वाले इलाकों में मौसम और नदी के स्तर को मापने वाले सेंसर लगाने, उपग्रह और ड्रोन से निगरानी करने तथा सूचना को नीचे बसे गांवों तक तुरंत पहुंचाने से लोगों को सुरक्षित जगह जाने के लिए अधिक समय मिल सकता है। नेपाल में इस बार SMS अलर्ट और हेलिकॉप्टरों की तैनाती से बचाव अभियान में मदद मिली।
इसके साथ ही, बाढ़ और भूस्खलन के खतरे वाले क्षेत्रों में निर्माण की योजना बनाते समय नदी के प्राकृतिक रास्ते को ध्यान में रखना होगा। जंगलों और प्राकृतिक जल निकासी क्षेत्रों की रक्षा, तटबंधों की नियमित जांच और स्थानीय लोगों को आपदा के समय सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने का प्रशिक्षण भी जरूरी है।
बूढ़ी गंडकी की ताजा बाढ़ ने दिखाया है कि हिमालयी इलाकों में खतरा हमेशा केवल बारिश के बाद ही नहीं आता। कभी-कभी भूस्खलन से नदी का रास्ता रुकना और फिर अचानक खुलना भी कुछ ही घंटों में बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। नेपाल और भारत, दोनों के लिए समय पर सूचना साझा करना और नदी के निचले इलाकों में निगरानी बनाए रखना अहम है।

FAQ (Frequently Asked Questions):

नेपाल में बूढ़ी गंडकी नदी में बाढ़ कब आई?

बूढ़ी गंडकी नदी में 11 अक्टूबर 2026 को नेपाल के गोरखा जिले में अचानक बाढ़ आई। इससे घरों, पुलों और जलविद्युत परियोजना के निर्माण स्थल को नुकसान पहुंचा।

बूढ़ी गंडकी नदी में बाढ़ आने की वजह क्या थी?

शुरुआती आकलन के मुताबिक, ऊपरी पहाड़ी इलाके में भूस्खलन से नदी का रास्ता बाधित हुआ और पानी जमा होने के बाद अचानक नीचे की ओर बह निकला। इसकी पूरी वजह की पुष्टि जांच के बाद होगी।

बाढ़ में कितने लोग लापता हुए और कितना नुकसान हुआ?

शुरुआती स्थानीय रिपोर्ट में करीब 35 घर और कम से कम 6 पुल बहने की जानकारी दी गई। लापता लोगों की संख्या को लेकर रिपोर्टों में अंतर है। बाद की रिपोर्टों में कम से कम 5 लोगों के लापता होने की बात कही गई।

क्या नेपाल की बाढ़ से बिहार में खतरा है?

नेपाल की बूढ़ी गंडकी नदी आगे त्रिशूली और नारायणी नदी प्रणाली से जुड़ती है, जो भारत में गंडक के नाम से बिहार में प्रवेश करती है। इसलिए बिहार में जलस्तर और तटबंधों की निगरानी बढ़ाई गई है। वास्तविक खतरा नदी के जलप्रवाह और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

हिमालय में अचानक बाढ़ क्यों आती है?

अत्यधिक बारिश, भूस्खलन, नदी का रास्ता रुकने के बाद अवरोध टूटना और ग्लेशियल झीलों से अचानक पानी निकलना इसके प्रमुख कारण हैं। जलवायु परिवर्तन और जोखिम वाले क्षेत्रों में बढ़ता निर्माण नुकसान की आशंका को बढ़ा सकते हैं।

हिमालयी बाढ़ से नुकसान कैसे कम किया जा सकता है?

ग्लेशियरों और नदियों की निगरानी, समय पर चेतावनी, SMS अलर्ट, सुरक्षित निकासी, जोखिम वाले क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण पर रोक और पुलों व तटबंधों की नियमित जांच से नुकसान कम किया जा सकता है।

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