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RBI Rupee Derivatives Rules 2026 : RBI ने विदेशी मुद्रा कारोबार के नियम सख्त किए, क्या रुपये की गिरावट पर लगेगी लगाम ?

RBI ने 10 अक्टूबर 2026 को विदेशी मुद्रा बाजार के नियम सख्त करते हुए रद्द फॉरेक्स सौदों की दोबारा बुकिंग पर रोक लगाई और बिना वास्तविक कारोबारी जरूरत के सौदों की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी। कुछ बड़े सौदों पर 20% नकद रिजर्व भी अनिवार्य किया गया।

RBI Rupee Derivatives Rules 2026 : RBI ने विदेशी मुद्रा कारोबार के नियम सख्त किए, क्या रुपये की गिरावट पर लगेगी लगाम ?

RBI Rupee Derivatives Rules 2026 : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 10 अक्टूबर 2026 को विदेशी मुद्रा बाजार के नियम सख्त कर दिए। नए नियमों के तहत रुपये से जुड़े कुछ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों को रद्द करने के बाद दोबारा बुक करने की अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा, बिना वास्तविक कारोबारी जरूरत का प्रमाण दिए ऐसे सौदे करने की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई है। आरबीआई ने कुछ बड़े सौदों पर अतिरिक्त नकद रिजर्व रखने और बैंकों के कैश रिजर्व रेशियो (CRR) से जुड़े नियमों में भी बदलाव किए हैं। इन कदमों का मकसद रुपये पर दबाव कम करना, सट्टेबाजी को सीमित करना और विदेशी मुद्रा बाजार में अनुशासन बनाए रखना है।

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रद्द Forex सौदे दोबारा बुक करने पर रोक

आरबीआई के नए निर्देशों के मुताबिक, अधिकृत डीलर यानी बैंकों और संबंधित वित्तीय संस्थानों को रुपये से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट रद्द होने के बाद उन्हें दोबारा बुक करने की अनुमति नहीं देनी होगी। यह नियम डिलिवरेबल और नॉन-डिलिवरेबल, दोनों तरह के कॉन्ट्रैक्ट पर लागू होगा। हालांकि, कॉन्ट्रैक्ट की अवधि पूरी होने पर उसे आगे बढ़ाने यानी रोलओवर की अनुमति पहले की तरह लागू नियमों और शर्तों के तहत मिल सकती है। ये निर्देश जारी होने के बाद रद्द किए गए कॉन्ट्रैक्ट पर लागू हैं।डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट का इस्तेमाल कंपनियां और कारोबारी डॉलर या दूसरी विदेशी मुद्राओं की विनिमय दर में होने वाले बदलाव से संभावित नुकसान कम करने के लिए करते हैं। उदाहरण के लिए, कोई भारतीय कंपनी भविष्य में डॉलर में भुगतान करने वाली है, तो वह पहले से विनिमय दर तय करने के लिए ऐसा कॉन्ट्रैक्ट कर सकती है। इसे हेजिंग कहा जाता है।
आरबीआई की चिंता ऐसे सौदों को लेकर है जिनमें वास्तविक कारोबारी जरूरत से ज्यादा पोजिशन ली जाती है या रद्द करने और दोबारा बुक करने के जरिए बाजार में जोखिम बढ़ सकता है। नए नियमों से बार-बार सौदे बदलने की गुंजाइश सीमित होगी।

बिना वास्तविक जरूरत के सौदे की सीमा 100 से घटकर 5 मिलियन डॉलर

आरबीआई ने डॉलर से जुड़े सौदे करने के नियम सख्त कर दिए हैं। पहले लोग और कंपनियां बिना किसी असली कारोबारी जरूरत के ऐसे सौदों में 100 मिलियन डॉलर तक पैसा लगा सकते थे। अब यह सीमा घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई है।यह नियम बैंकों के जरिए होने वाले कुछ सौदों और शेयर बाजार में रुपये से जुड़े सौदों पर लागू होगा। शेयर बाजार में सभी मान्यता प्राप्त एक्सचेंजों पर किए गए सौदों को जोड़कर यह सीमा तय की जाएगी।
आसान उदाहरण से समझें: मान लीजिए, किसी कंपनी को विदेश से सामान खरीदने के लिए डॉलर की जरूरत है। यह उसकी असली जरूरत है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति सिर्फ डॉलर और रुपये की कीमत में होने वाले बदलाव से मुनाफा कमाने के लिए सौदा करता है, तो उसके पीछे कोई असली कारोबारी जरूरत नहीं है।
आरबीआई का मकसद ऐसे सौदों पर लगाम लगाना है, जो सिर्फ मुनाफा कमाने के लिए किए जाते हैं।

अब कंपनियों को देना होगा अतिरिक्त घोषणा-पत्र

RBI ने बैंकों के लिए दस्तावेजी जांच भी सख्त की है। रुपये से जुड़े डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट के जरिए किसी कारोबारी एक्सपोजर की हेजिंग करते समय अधिकृत डीलर को ग्राहक से लिखित घोषणा लेनी होगी कि उसी जोखिम को किसी दूसरे अधिकृत डीलर के पास पहले से हेज नहीं किया गया है।अगर एक ही वास्तविक एक्सपोजर को अलग-अलग बैंकों के जरिए हिस्सों में हेज किया जा रहा है, तो ग्राहक को दूसरे बैंकों के साथ पहले से किए गए सौदों की जानकारी भी देनी होगी। बैंकों को संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखने होंगे और यह सुनिश्चित करना होगा कि सौदे वास्तविक एक्सपोजर के अनुरूप हैं।
इस बदलाव से एक ही कारोबारी जोखिम के लिए कई जगहों पर जरूरत से ज्यादा हेजिंग करने की संभावना कम करने में मदद मिल सकती है।

₹2 मिलियन से बड़े कुछ सौदों पर 20% नकद रिजर्व

RBI ने विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व यानी फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (FERR) की व्यवस्था भी लागू की है। इसके तहत रुपये से जुड़े कुछ डेरिवेटिव सौदों में, जिनका उद्देश्य चालू खाते के लेनदेन के लिए रुपये के बदले विदेशी मुद्रा खरीदने के जोखिम से बचाव करना है, 2 मिलियन डॉलर से अधिक के सौदे पर 20% नकद रिजर्व रखने की जरूरत होगी। रिजर्व की गणना सौदे की निर्धारित यानी नॉशनल वैल्यू के रुपये में मूल्य के आधार पर होगी।इस व्यवस्था से संबंधित सौदों की लागत बढ़ सकती है, क्योंकि वित्तीय संस्थानों को अतिरिक्त रकम नकद रिजर्व के रूप में रखनी होगी। इसका असर कंपनियों की हेजिंग रणनीति और विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग पर पड़ सकता है। हालांकि, इससे रुपये की विनिमय दर में स्थायी सुधार होगा या नहीं, यह तेल की कीमतों, विदेशी निवेश और डॉलर की वैश्विक मांग जैसे दूसरे कारकों पर भी निर्भर करेगा।

बैंकों के CRR नियम भी सख्त, 16 अक्टूबर से लागू होगा बदलाव

RBI ने विदेशी मुद्रा बाजार के नियमों के अलावा बैंकिंग सिस्टम में नकदी के प्रबंधन को लेकर भी कदम उठाया है। 16 अक्टूबर से शुरू होने वाले पखवाड़े में बैंकों को अपने निर्धारित कैश रिजर्व रेशियो (CRR) का कम से कम 99% हिस्सा हर दिन आरबीआई के पास बनाए रखना होगा। पहले दैनिक न्यूनतम सीमा 90% थी। हालांकि, CRR का कुल निर्धारित अनुपात नहीं बदला है।CRR वह हिस्सा है, जिसे बैंकों को अपनी जमा राशि के अनुपात में आरबीआई के पास नकद के रूप में रखना होता है। दैनिक सीमा 99% होने से बैंकों के लिए दिन-प्रतिदिन की नकदी का प्रबंधन पहले के मुकाबले कम लचीला हो सकता है।
इसके साथ ही आरबीआई ने 13 अक्टूबर को खुले बाजार की प्रक्रिया यानी ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के तहत 25,000 करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचने की घोषणा की है। बॉन्ड बेचने से बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को सोखने में मदद मिलती है। इन कदमों का उद्देश्य बाजार में अतिरिक्त नकदी घटाना और अल्पकालिक ब्याज दरों को नीतिगत रेपो रेट के करीब लाना है।

रुपये पर दबाव कम करने की कोशिश

RBI के ये कदम ऐसे समय उठाए गए हैं, जब 2026 में रुपये पर दबाव बना हुआ है। रॉयटर्स की 10 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, महंगे कच्चे तेल और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के बीच रुपये में साल के दौरान 7% से अधिक गिरावट आई थी। आयातकों की डॉलर की मांग भी विदेशी मुद्रा बाजार पर दबाव डाल रही थी।RBI ने सरकारी तेल कंपनियों इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम के लिए डॉलर की सीधी आपूर्ति की विशेष व्यवस्था भी घोषित की थी। इसका उद्देश्य इन कंपनियों की डॉलर की मांग को खुले बाजार से हटाकर रुपये पर तत्काल दबाव कम करना है।
हालांकि, विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव पर सख्ती और बैंकिंग सिस्टम की नकदी घटाने से रुपये को कितना और कितने समय तक सहारा मिलेगा, यह आगे के बाजार रुझानों पर निर्भर करेगा। कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहने या विदेशी पूंजी का बहिर्वाह जारी रहने पर रुपये पर दबाव बना रह सकता है।

डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स और आधिकारिक जानकारियों पर आधारित है। आरबीआई के नियमों, उनके लागू होने की तारीख और संभावित प्रभावों से संबंधित जानकारी में समय के साथ बदलाव हो सकता है। पाठकों को सलाह दी जाती है कि किसी भी वित्तीय निर्णय से पहले आरबीआई की आधिकारिक अधिसूचना और संबंधित बैंक के निर्देशों की जांच करें।

FAQ (Frequently Asked Questions):

RBI ने Forex बाजार के नियमों में क्या बदलाव किए हैं?

RBI ने रुपये से जुड़े रद्द डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट दोबारा बुक करने पर रोक लगाई है, बिना अंडरलाइंग एक्सपोजर साबित किए सौदे करने की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर की है और कुछ बड़े सौदों पर 20% नकद रिजर्व की व्यवस्था लागू की है।

अंडरलाइंग एक्सपोजर क्या होता है?

यह किसी वास्तविक कारोबारी लेनदेन या वित्तीय जोखिम को कहा जाता है। उदाहरण के लिए, विदेश से सामान खरीदने के लिए भविष्य में डॉलर में भुगतान करना किसी कंपनी का वास्तविक विदेशी मुद्रा एक्सपोजर हो सकता है।

नए नियमों से कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा?

कुछ कंपनियों के लिए विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव यानी हेजिंग महंगी हो सकती है। उन्हें अतिरिक्त दस्तावेज देने होंगे और एक ही जोखिम को अलग-अलग बैंकों के जरिए हेज करने की जानकारी भी साझा करनी होगी।

क्या RBI ने CRR बढ़ा दिया है?

CRR का कुल अनुपात नहीं बढ़ाया गया है। बदलाव दैनिक न्यूनतम रखरखाव की सीमा में हुआ है, जो 16 अक्टूबर से 90% के बजाय 99% होगी।

RBI ने ये कदम क्यों उठाए हैं?

इनका उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक सट्टेबाजी और बार-बार सौदे बुक करने की प्रवृत्ति को सीमित करना, रुपये पर दबाव कम करना और बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करना है।

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