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HTBt Cotton India: भारत में HTBt Cotton की खेती गैरकानूनी, फिर भी लाखों एकड़ में खेती - आखिर क्यों?

नई स्टडी के मुताबिक 2025-26 में भारत में 65-72 लाख एकड़ में अनधिकृत HTBt कपास उगाई गई, जो कुल कपास क्षेत्र का 24-30% है। किसानों के बढ़ते इस्तेमाल की प्रमुख वजह मजदूरों की कमी और खरपतवार नियंत्रण की ऊंची लागत बताई गई है।

HTBt Cotton India: भारत में HTBt Cotton की खेती गैरकानूनी, फिर भी लाखों एकड़ में खेती - आखिर क्यों?

भारत में HTBt Cotton को खेती के लिए मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन एक नए फील्ड स्टडी के मुताबिक किसान बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। अध्ययन का अनुमान है कि 2025-26 के खरीफ सीजन में देश में 65 से 72 लाख एकड़ क्षेत्र में अनधिकृत HTBt कपास उगाई गई, जो भारत के कुल कपास क्षेत्र का करीब 24 से 30% है। अध्ययन के मुताबिक इसके पीछे सबसे बड़ी वजह खेतों में मजदूरों की कमी और हाथ से खरपतवार हटाने की बढ़ती लागत है। यह स्थिति ऐसे समय सामने आई है जब भारत का कपास उत्पादन भी पिछले कुछ वर्षों में लगातार कमजोर हुआ है।यह स्टडी साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर ने फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया और नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सहयोग से की है। इसमें महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के 16 कपास उत्पादक जिलों को शामिल किया गया। किसानों के सर्वे, बीज की सप्लाई चेन की जांच और खेतों से लिए गए कपास के नमूनों की लैब टेस्टिंग के आधार पर HTBt के प्रसार का अनुमान लगाया गया है।

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HTBt Cotton आखिर है क्या, जिसे किसान चोरी-छिपे अपना रहे हैं?

HTBt यानी हर्बिसाइड टॉलरेंट बीटी कपास सामान्य बीटी कपास से अलग है। बीटी कपास में कीटों से बचाव के लिए विशेष जीन का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि HTBt में इसके साथ ऐसा गुण जोड़ा जाता है, जिससे कपास का पौधा कुछ खास खरपतवारनाशकों, खासकर ग्लाइफोसेट, को सहन कर सकता है।

इसका सीधा फायदा खरपतवार नियंत्रण में मिलता है। किसान कपास के खेत में ग्लाइफोसेट का छिड़काव कर सकता है और HTBt पौधा अपेक्षाकृत सुरक्षित रहता है, जबकि आसपास के खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। इससे खेत में बार-बार मजदूर लगाकर घास निकालने की जरूरत कम हो सकती है।स्टडी के मुताबिक ग्लाइफोसेट से खरपतवार नियंत्रण पर करीब ₹750-850 प्रति एकड़ खर्च आता है, जबकि हाथ से खरपतवार हटाने में यह लागत करीब ₹12,000-15,000 प्रति एकड़ तक पहुंच सकती है। यही लागत का अंतर किसानों को अनधिकृत बीज की तरफ खींचने वाली बड़ी वजहों में से एक बताया गया है।
भारत में जीएम कपास की मंजूरी सीमित जीन और इवेंट तक है। जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमिटी यानी जीईएसी की आधिकारिक जानकारी में मंजूर बीटी कपास में क्राई1एसी और क्राई2एबी जैसे जीन वाले इवेंट शामिल हैं। HTBt कपास को खेती के लिए मंजूरी नहीं मिली है।

65-72 लाख एकड़ में HTBt, महाराष्ट्र और तेलंगाना में ज्यादा असर

नई स्टडी के मुताबिक 2025-26 के खरीफ सीजन में HTBt कपास की खेती 65 से 72 लाख एकड़ में हुई। यह देश के कुल कपास क्षेत्र का 24 से 30% बैठता है। अध्ययन में महाराष्ट्र में अपनाने की दर करीब 58%, तेलंगाना में 66% और आंध्र प्रदेश में 49% बताई गई है।फील्ड सैंपल की जांच में 98.2% नमूनों में कम से कम एक जीएम गुण पाया गया। इनमें 41.9% नमूनों में चार अलग-अलग ट्रांसजीन वाला ‘क्वाड्रुपल स्टैक’ पाया गया। इनमें विप3ए भी शामिल था, जिसे भारत में खेती के लिए मंजूरी नहीं मिली है।
स्टडी के अनुसार HTBt बीजों की अनौपचारिक सप्लाई ने बड़ा बाजार खड़ा कर लिया है। हालिया रिपोर्ट में इस अनौपचारिक बाजार का अनुमान करीब ₹1,500 करोड़ लगाया गया है। इससे पहले सामने आए आंकड़ों में इसका आकार ₹820-880 करोड़ बताया गया था, इसलिए बाजार के अनुमान में रिपोर्टिंग के दौरान बड़ा अंतर दिखाई देता है। नए अध्ययन में करीब 1.25 करोड़ HTBt बीज पैकेट की बिक्री का अनुमान भी सामने आया है।

कपास की पैदावार घटी, सरकार ने ₹5,659 करोड़ का मिशन शुरू किया

HTBt का प्रसार ऐसे समय हुआ है जब भारत का कपास उत्पादन भी दबाव में है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 में कपास उत्पादन 352.48 लाख गांठ था, जो 2025-26 में घटकर 290.91 लाख गांठ रह गया। यानी इस अवधि में उत्पादन करीब 17.5% कम हुआ। इसी दौरान उत्पादकता 451 किलो प्रति हेक्टेयर से घटकर 431 किलो प्रति हेक्टेयर हो गई।सरकार ने उत्पादन में कमजोरी के लिए सिर्फ बीज को जिम्मेदार नहीं माना है। उसके अनुसार कपास क्षेत्र में बदलाव, कम या असमान बारिश, अत्यधिक तापमान, कीट और रोग तथा किसानों का ज्यादा लाभ वाली दूसरी फसलों की तरफ जाना भी इसके कारण हैं। इसी समस्या से निपटने के लिए केंद्र ने 2026-27 से 2030-31 तक पांच साल के लिए कपास उत्पादकता मिशन यानी कपास क्रांति को मंजूरी दी है, जिस पर ₹5,659.22 करोड़ खर्च किए जाएंगे। इसका लक्ष्य उत्पादकता बढ़ाने, बेहतर बीज और नई कृषि तकनीक को बढ़ावा देने तथा कपास की गुणवत्ता सुधारने का है।

किसान HTBt की तरफ क्यों जा रहे हैं?

स्टडी के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह खेतों में मजदूरों की कमी और खरपतवार नियंत्रण की महंगी प्रक्रिया है। कपास की खेती में खरपतवार हटाने के लिए मजदूरों की जरूरत पड़ती है। ग्रामीण इलाकों में मजदूरी बढ़ने और समय पर मजदूर नहीं मिलने से किसानों की लागत बढ़ती है।HTBt में ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल इस काम को आसान बनाता है। अध्ययन के मुताबिक 2024-25 से 2025-26 के बीच ग्लाइफोसेट की खपत 27,721 किलोलीटर से बढ़कर 35,642 किलोलीटर हो गई, यानी करीब 26% की वृद्धि। इसके साथ ही इसकी बिक्री अनौपचारिक नेटवर्क के जरिए बड़े पैमाने पर होने की बात भी सामने आई है। कुछ जगहों पर 20 लीटर तक के ड्रम में इसकी बिक्री की जानकारी दी गई है।
इसका दूसरा संकेत वैध बीटी बीजों की बिक्री में गिरावट से मिलता है। स्टडी के अनुसार 2022 से 2026 के बीच कानूनी बोलगार्ड-II बीजों की बिक्री में राष्ट्रीय स्तर पर 22.3% की कमी आई है।

मंजूरी और किसान की जरूरत के बीच बढ़ता अंतर

HTBt को लेकर विवाद सिर्फ इस बात का नहीं है कि किसान इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। असली चुनौती यह है कि एक तरफ किसान कम मजदूरी लागत और आसान खरपतवार नियंत्रण वाली तकनीक चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ जीएम फसलों की मंजूरी और जैव-सुरक्षा से जुड़ी नियामकीय प्रक्रिया अलग मानकों पर चलती है।बीज उद्योग से जुड़े लोगों का तर्क है कि जब बड़ी संख्या में किसान अनधिकृत बीज खरीद रहे हैं, तो सरकार को HTBt के लिए मंजूरी प्रक्रिया तेज करनी चाहिए। उनका कहना है कि मौजूदा स्थिति किसानों को अनौपचारिक बाजार पर निर्भर कर रही है।
दूसरी ओर, HTBt को मंजूरी देना केवल किसानों की मांग के आधार पर तय होने वाला फैसला नहीं है। जीएम फसल के लिए जैव-सुरक्षा, पर्यावरण और नियामकीय मूल्यांकन जरूरी होता है। इसलिए किसी तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होना अपने आप में उसके कानूनी रूप से मंजूर होने का प्रमाण नहीं है।
फिलहाल भारत में बीटी कपास की खेती मंजूर है, लेकिन हर्बिसाइड टॉलरेंट बीटी यानी HTBt कपास की खेती अधिकृत नहीं है। ऐसे में नई स्टडी ने भारत के कपास क्षेत्र के सामने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है - क्या मौजूदा नियामकीय व्यवस्था किसानों की जमीन पर पैदा हो रही तकनीकी जरूरतों के साथ कदम मिला पा रही है?

FAQ (Frequently Asked Questions):

HTBt Cotton क्या है?

HTBt यानी हर्बिसाइड टॉलरेंट बीटी कपास ऐसी जीएम कपास है जिसमें कीट प्रतिरोध के साथ कुछ खरपतवारनाशकों, खासकर ग्लाइफोसेट, को सहन करने की क्षमता होती है। इससे किसान खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल कर सकता है।

HTBt Cotton भारत के कितने Cotton Area में उगाया जा रहा है?

नई स्टडी के मुताबिक 2025-26 के खरीफ सीजन में करीब 65 से 72 लाख एकड़ में HTBt कपास उगाई गई, जो देश के कुल कपास क्षेत्र का करीब 24 से 30% है।

HTBt Cotton को भारत में Approval क्यों नहीं मिला है?

भारत में HTBt कपास को खेती के लिए मंजूरी नहीं मिली है। जीएम फसलों के लिए जैव-सुरक्षा और नियामकीय मूल्यांकन की प्रक्रिया होती है। जीईएसी की मंजूर जीएम कपास की सूची में HTBt कपास शामिल नहीं है।

HTBt Cotton और Bt Cotton में क्या अंतर है?

बीटी कपास में मुख्य रूप से कुछ कीटों से बचाव का गुण होता है, जबकि HTBt कपास में इसके साथ हर्बिसाइड टॉलरेंस का गुण भी होता है। इसी वजह से HTBt कपास में ग्लाइफोसेट के जरिए खरपतवार नियंत्रण आसान हो सकता है।

Farmers HTBt Cotton Seeds का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं?

स्टडी के मुताबिक मजदूरों की कमी और हाथ से खरपतवार हटाने की ज्यादा लागत इसकी बड़ी वजह है। ग्लाइफोसेट से खरपतवार नियंत्रण की लागत करीब ₹750-850 प्रति एकड़ बताई गई है, जबकि हाथ से निराई पर ₹12,000-15,000 तक खर्च हो सकता है।

HTBt Cotton में Herbicide Tolerance क्या होता है?

इसका मतलब है कि कपास के पौधे में ऐसे आनुवंशिक गुण मौजूद होते हैं, जिनसे वह किसी खास खरपतवारनाशक को सहन कर सकता है। इससे खेत में खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए उस हर्बिसाइड का इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि फसल अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती है।

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