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India West Asian oil imports : हॉर्मुज संकट के बीच भारत का गल्फ से तेल आयात बढ़ा, आखिर रूस से सप्लाई क्यों घटी?

हॉर्मुज में जोखिम के बावजूद सितंबर में भारत का West Asia से तेल आयात बढ़ा, जिसमें शिप-टू-शिप ट्रांसफर की बड़ी भूमिका रही। वहीं रूस से आयात 9% घटकर पांच महीने के निचले स्तर पर पहुंचा। चीन की मांग और अमेरिकी दबाव से भारतीय रिफाइनरों के लिए सप्लाई डायवर्सिफिकेशन अहम हुआ।

India West Asian oil imports : हॉर्मुज संकट के बीच भारत का गल्फ से तेल आयात बढ़ा, आखिर रूस से सप्लाई क्यों घटी?

India West Asian oil imports : भारत के पश्चिम एशिया से तेल आयत में सितंबर में बड़ा उछाल आया है। इसकी सबसे बड़ी वजह गल्फ देशों की ओर से अपनाया गया शिप-टू-शिप यानी STS ट्रांसफर है, जिसके जरिए तेल को स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के जोखिम भरे हिस्से से निकालकर दूसरे टैंकर में ट्रांसफर किया गया। दूसरी ओर, भारत के सबसे बड़े तेल सप्लायर रूस से क्रूड आयात लगातार दूसरे महीने घटा और सितंबर में करीब 1.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन (bpd) रह गया। केप्लर के प्रोविजनल टैंकर-ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, रूसी तेल की सप्लाई पर चीन की रिफाइनरियों की बढ़ती मांग, रूस के तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर पर यूक्रेनी हमलों और रूसी क्रूड की सीमित उपलब्धता का असर पड़ा है।

हॉर्मुज में जोखिम के बीच गल्फ देशों ने निकाला तेल पहुंचाने का रास्ता

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण पिछले कई महीनों से स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल की आवाजाही पर बड़ा दबाव था। भारत के क्रूड आयात का करीब 40% हिस्सा सामान्य तौर पर इसी समुद्री रास्ते से आता है, इसलिए हॉर्मुज में किसी भी तरह की रुकावट सीधे भारत की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए चिंता बढ़ाती है।सितंबर में स्थिति कुछ बदली। गल्फ देशों ने शिप-टू-शिप ट्रांसफर का इस्तेमाल बढ़ाया। सामान्य व्यवस्था में तेल से भरा टैंकर सीधे खाड़ी के किसी पोर्ट से भारत की ओर आता है। एसटीएस व्यवस्था में एक टैंकर तेल को कुछ दूरी तक लेकर जाता है और फिर उसे दूसरे टैंकर में ट्रांसफर कर दिया जाता है, जो अपेक्षाकृत सुरक्षित पानी से भारत की ओर रवाना होता है।
इस व्यवस्था में हॉर्मुज से तेल निकालने का जोखिम मुख्य रूप से सप्लायर की तरफ चला जाता है। पहले भारतीय रिफाइनर या खरीदारों को खुद टैंकर चार्टर करके फारस की खाड़ी के अंदर भेजना पड़ता था। अब सप्लायर हॉर्मुज वाले हिस्से तक तेल पहुंचाने की जिम्मेदारी और जोखिम ज्यादा हद तक खुद उठा रहे हैं। केप्लर ने भी सितंबर में गल्फ ऑफ ओमान में एसटीएस गतिविधियों के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने की जानकारी दी थी।

Iraq और Saudi Arabia से तेल की सप्लाई में जोरदार उछाल

इस बदलाव का असर सितंबर के आंकड़ों में साफ दिखा। Iraq से भारत का तेल आयात 238.2% बढ़कर 5.51 लाख bpd से ज्यादा हो गया। Saudi Arabia से आयात 56.2% बढ़कर करीब 5.43 लाख bpd पहुंच गया। Kuwait से आयात अगस्त के मुकाबले 104.4% बढ़ा, जबकि Qatar से अगस्त में कोई आयात नहीं हुआ था, लेकिन सितंबर में करीब 1.10 लाख bpd तेल भारत पहुंचा।West Asia के इन प्रमुख सप्लायर्स में सिर्फ UAE से आयात घटा। UAE से भारत का तेल आयात करीब 15.8% कम होकर 4.60 लाख bpd रहा। इन पांच देशों से सितंबर में कुल आयात करीब 2 मिलियन bpd रहा। यह भारत के कुल क्रूड आयात का करीब 36.7% था, जो अगस्त के 26% से काफी ज्यादा है। हालांकि फरवरी 2026 में, West Asia संकट शुरू होने से पहले, इन पांच देशों से भारत करीब 3 मिलियन bpd तेल ले रहा था और कुल आयात में इनकी हिस्सेदारी 56.3% थी।
Iraq, Kuwait और Qatar के लिए स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खास तौर पर महत्वपूर्ण है। वहीं Saudi Arabia और UAE के पास ऐसी पाइपलाइन व्यवस्था है, जो हॉर्मुज को बायपास कर सकती है। इसके बावजूद इन देशों का काफी तेल परंपरागत रूप से इसी रास्ते से जाता रहा है।

रूस से तेल आयात 9% घटा, लेकिन फिर भी सबसे बड़ा सप्लायर

दूसरी तरफ भारत के Russian oil imports में सितंबर में लगातार दूसरे महीने गिरावट आई। केप्लर के मुताबिक रूस से भारत का आयात अगस्त के 2.1 मिलियन bpd से करीब 9% घटकर सितंबर में 1.9 मिलियन bpd रह गया। यह पांच महीने का सबसे निचला स्तर था।जुलाई में भारत का रूसी तेल आयात रिकॉर्ड 2.8 मिलियन bpd तक पहुंच गया था। इसके बाद लगातार गिरावट आई। फिर भी सितंबर में रूस भारत के कुल तेल आयात का 35% से ज्यादा हिस्सा उपलब्ध करा रहा था, यानी वह अभी भी भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर बना हुआ है।
रूसी सप्लाई पर दबाव के पीछे कई वजहें हैं। यूक्रेन की ओर से रूस के तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले बढ़े हैं। ब्लैक सी में तेल निर्यात से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों के कारण टैंकरों की आवाजाही का जोखिम भी बढ़ा है। इसके अलावा रूस घरेलू ईंधन जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी रिफाइनरियों को ज्यादा क्रूड उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है।
इसी बीच चीन की रिफाइनरियों ने भी रूसी तेल की खरीद बढ़ाई है। ईरान से चीन को मिलने वाली सप्लाई में कमी के कारण रूसी क्रूड के लिए चीनी मांग और बढ़ी है। इससे भारतीय रिफाइनरों के लिए रूसी तेल की उपलब्धता पर दबाव पड़ा है।

अमेरिका का नया कानून भारत के लिए बढ़ा रहा दबाव

रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर अमेरिका का दबाव भी बढ़ा है। लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026 को 18 सितंबर को कानून बनाया गया। इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी तेल खरीदने वाले बड़े देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की शक्ति दी गई है। भारत और चीन ऐसे प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं। हालांकि यह टैरिफ अपने आप लागू नहीं होता, बल्कि राष्ट्रपति को इसके इस्तेमाल का अधिकार देता है।भारत लगातार कहता रहा है कि उसकी प्राथमिकता 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है और इसके लिए वह अलग-अलग देशों से तेल खरीद की रणनीति अपनाता है। लेकिन नए अमेरिकी कानून ने रूसी तेल की भविष्य की खरीद को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है।
केप्लर के लीड एनालिस्ट-रिफाइनिंग निखिल दुबे के मुताबिक, Middle Eastern crude की बेहतर उपलब्धता और रूस से तेल खरीद को लेकर बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता भारतीय रिफाइनरों को आगे और ज्यादा गल्फ क्रूड की ओर ले जा सकती है।

भारत ने तेल खरीद के स्रोत फिर बढ़ाए

मार्च 2026 के बाद से भारत की crude oil import strategy में बड़ा बदलाव आया है। हॉर्मुज में रुकावट और शिपिंग जोखिम बढ़ने के बाद भारतीय रिफाइनरों ने West Asia पर निर्भरता घटाने के लिए Africa, North America और South America से भी ज्यादा क्रूड खरीदा।अब सितंबर में West Asian सप्लाई की वापसी और Russia से आयात में गिरावट भारत के लिए एक अलग तरह का संतुलन दिखाती है। एक तरफ गल्फ देशों ने एसटीएस ट्रांसफर के जरिए हॉर्मुज के जोखिम के बावजूद सप्लाई बढ़ाने का रास्ता निकाला है, तो दूसरी तरफ रूसी क्रूड के लिए चीन से प्रतिस्पर्धा और अमेरिकी प्रतिबंधों का दबाव बढ़ रहा है।
हालांकि हॉर्मुज के रास्ते तेल की आवाजाही पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। अक्टूबर की शुरुआत में भी इस क्षेत्र में टैंकरों पर हमले और सुरक्षा जोखिम बने हुए हैं। इसके बावजूद सितंबर के अंत में Middle East से क्रूड निर्यात कई दिनों में युद्ध से पहले के स्तर से ऊपर पहुंच गया था।
भारत के लिए इसका सीधा मतलब है कि आने वाले महीनों में Russia, West Asia और दूसरे क्षेत्रों से मिलने वाले क्रूड के बीच संतुलन और महत्वपूर्ण हो सकता है। रूसी तेल अभी भी भारत की जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा कर रहा है, लेकिन हॉर्मुज जोखिम, चीन की बढ़ती खरीद और अमेरिकी टैरिफ की आशंका भारतीय रिफाइनरों को सप्लाई के ज्यादा विकल्प रखने के लिए मजबूर कर रही है।

डिस्क्लेमर : इस खबर में दिए गए तेल आयात, शिप-टू-शिप ट्रांसफर, रूस और वेस्ट एशिया से क्रूड सप्लाई से जुड़े आंकड़े उपलब्ध टैंकर-ट्रैकिंग डेटा, रिपोर्टों और संबंधित स्रोतों पर आधारित हैं। कुछ आंकड़े प्रोविजनल या अनुमानित हो सकते हैं और बाद में संशोधित किए जा सकते हैं। भू-राजनीतिक परिस्थितियों, शिपिंग जोखिमों और अंतरराष्ट्रीय नीतियों में बदलाव के कारण तेल आयात के आंकड़ों और रुझानों में भी बदलाव संभव है। टैरिफ और प्रतिबंधों से जुड़े प्रावधानों को उनके मौजूदा कानूनी स्वरूप के आधार पर समझाया गया है; किसी संभावित कार्रवाई को निश्चित निर्णय न माना जाए।

FAQ (Frequently Asked Questions):

Ship-to-ship transfers से India के West Asian oil imports कैसे बढ़े?

शिप-टू-शिप ट्रांसफर में एक टैंकर तेल को हॉर्मुज के जोखिम वाले हिस्से से बाहर तक लाता है और वहां दूसरे टैंकर में क्रूड ट्रांसफर किया जाता है। इसके बाद दूसरा टैंकर अपेक्षाकृत सुरक्षित पानी से भारत की ओर तेल लेकर जाता है। इससे खरीदारों के बजाय सप्लायर्स पर हॉर्मुज से जुड़े शिपिंग जोखिम का बड़ा हिस्सा चला जाता है।

India के crude oil imports में West Asia की क्या भूमिका है?

West Asia भारत के लिए क्रूड का प्रमुख स्रोत रहा है। सितंबर 2026 में Iraq, Saudi Arabia, Kuwait, Qatar और UAE से मिलाकर करीब 2 मिलियन bpd क्रूड आया, जो भारत के कुल आयात का करीब 36.7% था। फरवरी में इन देशों की संयुक्त हिस्सेदारी 56.3% थी।

Ship-to-ship oil transfers क्या होते हैं और India में इनका इस्तेमाल क्यों बढ़ा है?

इस व्यवस्था में एक जहाज से दूसरे जहाज में समुद्र के बीच क्रूड ट्रांसफर किया जाता है। हॉर्मुज में सुरक्षा जोखिम बढ़ने के कारण गल्फ सप्लायर्स ने इसका इस्तेमाल बढ़ाया, जिससे तेल को सीधे जोखिम वाले रूट पर भेजने के बजाय सुरक्षित पानी में दूसरे टैंकर के जरिए आगे भेजना संभव हुआ।

Russian oil flows पर supply pressure क्यों बढ़ रहा है?

रूसी तेल की सप्लाई पर यूक्रेन के तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों, ब्लैक सी में बढ़े शिपिंग जोखिम, रूस की घरेलू रिफाइनिंग जरूरतों और चीन की बढ़ती खरीद का दबाव है। इसके साथ ही रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी टैरिफ की नई शक्ति ने भी भारत जैसे बड़े खरीदारों के लिए अनिश्चितता बढ़ाई है।

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