India Saudi Arabia Undersea Power Link : समुद्र के नीचे 2,100 किमी केबल से जुड़ेंगे भारत-सऊदी के पावर ग्रिड, क्यों खास है ये प्रोजेक्ट?
भारत और सऊदी अरब के बीच 2,100 किमी लंबी अंडरसी पावर लाइन प्रस्तावित है, जिसकी क्षमता 3 गीगावाट और लागत करीब 9 अरब डॉलर है। 5 अक्टूबर की बैठक में फिजिबिलिटी स्टडी, लागत घटाने और परियोजना के बिजनेस मॉडल पर चर्चा होगी।
India Saudi Arabia Undersea Power Link : भारत और सऊदी अरब के बीच प्रस्तावित अंडरसी पावर लिंक परियोजना की लागत करीब 9 अरब डॉलर यानी लगभग 84 हजार करोड़ रुपए आंकी गई है। यह बिजली ट्रांसमिशन लिंक करीब 2,100 किलोमीटर लंबा होगा और इसकी क्षमता 3 गीगावाट हाई-वोल्टेज डायरेक्ट करंट ट्रांसमिशन की होगी। भारत की ओर से करीब एक साल से चल रही फिजिबिलिटी स्टडी अब पूरी हो चुकी है और इसे 5 अक्टूबर को भारत-सऊदी जॉइंट वर्किंग ग्रुप ऑन एनर्जी की बैठक में पेश किया जाएगा। इस बैठक में दोनों देश परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता, लागत घटाने के विकल्प और इसे आगे बढ़ाने के मॉडल पर चर्चा करेंगे। यह प्रोजेक्ट पूरा होने पर भारत और सऊदी अरब के बिजली ग्रिड को समुद्र के नीचे केबल के जरिए जोड़ने वाली रणनीतिक परियोजना बन सकता है।

2,100 किमी लंबी होगी अंडरसी पावर लाइन
भारत ने प्रस्तावित पावर लिंक की फिजिबिलिटी स्टडी पूरी कर ली है। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, स्टडी में परियोजना का मौजूदा डिजाइन करीब 2,100 किलोमीटर लंबा बताया गया है। इसके जरिए दोनों देशों के बीच 3 गीगावाट बिजली ट्रांसमिशन की क्षमता विकसित करने का प्रस्ताव है।इसके लिए हाई-वोल्टेज डायरेक्ट करंट यानी एचवीडीसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। लंबी दूरी तक बिजली ट्रांसमिशन के लिए एचवीडीसी तकनीक का इस्तेमाल कई अंतरराष्ट्रीय ग्रिड इंटरकनेक्शन परियोजनाओं में किया जाता है। समुद्र के नीचे इतनी लंबी बिजली केबल बिछाना तकनीकी और आर्थिक दोनों लिहाज से चुनौतीपूर्ण होगा, इसलिए फिलहाल परियोजना को अंतिम मंजूरी मिलने से पहले इसकी लागत और कारोबारी मॉडल पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।
सबसे बड़ी चुनौती लागत को लेकर है। जब भारत-सऊदी पावर लिंक की शुरुआती चर्चा हुई थी, तब इसकी लागत करीब 5 अरब डॉलर बताई गई थी। अब फिजिबिलिटी स्टडी में यह अनुमान करीब 9 अरब डॉलर पहुंच गया है। यानी शुरुआती अनुमान के मुकाबले परियोजना की लागत में करीब 4 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई है।
5 अक्टूबर की बैठक में तय होगी परियोजना की आर्थिक तस्वीर
भारत और सऊदी अरब के बीच ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग के लिए जॉइंट वर्किंग ग्रुप ऑन एनर्जी बनाया गया है। यह भारत-सऊदी स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप काउंसिल के इकॉनॉमिक एंड इन्वेस्टमेंट पिलर के तहत काम करने वाले चार आधिकारिक स्तर के वर्किंग ग्रुप में से एक है।5 अक्टूबर की बैठक में सेंट्रल ट्रांसमिशन यूटिलिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड यानी सीटीयूआईएल, सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी, भारत और सऊदी अरब के पावर मिनिस्ट्री के वरिष्ठ अधिकारी तथा सऊदी अरब की नेशनल इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी शामिल होगी।
बैठक में फिजिबिलिटी स्टडी के नतीजों को सामने रखा जाएगा। अधिकारियों के मुताबिक, इस समय सबसे अहम सवाल यह है कि करीब 9 अरब डॉलर की लागत वाली परियोजना के लिए मजबूत बिजनेस केस कैसे तैयार किया जाए। दोनों पक्ष लागत कम करने के विकल्पों पर भी विचार करेंगे।
2023 में शुरू हुई थी पावर ग्रिड जोड़ने की पहल
भारत-सऊदी अंडरसी पावर लिंक अचानक सामने आई परियोजना नहीं है। दोनों देशों ने 2023 में बिजली और ग्रिड इंटरकनेक्शन के क्षेत्र में सहयोग शुरू करने पर सहमति जताई थी।10 सितंबर 2023 को भारत और सऊदी अरब ने व्यापक ऊर्जा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद 8 अक्टूबर 2023 को दोनों देशों ने इलेक्ट्रिकल इंटरकनेक्शन को लेकर एक अलग समझौता ज्ञापन किया।
अगला बड़ा कदम अक्टूबर 2024 में उठाया गया, जब भारत की सेंट्रल ट्रांसमिशन यूटिलिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड और सऊदी अरब की नेशनल इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी के बीच फिजिबिलिटी स्टडी के लिए समझौता हुआ। दोनों ही देशों में ये संस्थाएं बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क की योजना और विकास से जुड़ी प्रमुख एजेंसियां हैं।
इसके बाद सीटीयूआईएल ने 2025 में अंडरसी केबल की विस्तृत फिजिबिलिटी स्टडी के लिए टेंडर जारी किया। करीब एक साल की प्रक्रिया के बाद अब स्टडी के नतीजे दोनों देशों के सामने रखे जाने हैं।
भारत के वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड से जुड़ता है प्रोजेक्ट
भारत-सऊदी पावर लिंक को भारत की बड़ी वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड यानी ओसोवोग पहल के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। इसका विचार अलग-अलग देशों और क्षेत्रों के बिजली ग्रिड को आपस में जोड़कर नवीकरणीय ऊर्जा के सीमा-पार कारोबार को बढ़ावा देना है।भारत का लक्ष्य सौर और दूसरी नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन वाले अलग-अलग क्षेत्रों को बिजली ग्रिड के जरिए जोड़ने का है। भारत पहले से ओमान, यूएई, सिंगापुर, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों के साथ भी बिजली इंटरकनेक्शन की संभावनाओं पर काम कर रहा है।
हालांकि, अधिकारियों के मुताबिक भारत-सऊदी परियोजना इन प्रस्तावों में आगे बढ़ चुकी है क्योंकि इसकी विस्तृत फिजिबिलिटी स्टडी पूरी हो चुकी है। बाकी कई प्रस्ताव अभी इस स्तर तक नहीं पहुंचे हैं।
अगर भारत और सऊदी अरब के ग्रिड को जोड़ा जाता है तो दोनों देशों के बीच जरूरत के मुताबिक बिजली का आदान-प्रदान किया जा सकेगा। इससे ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और नवीकरणीय ऊर्जा के बेहतर इस्तेमाल में मदद मिल सकती है। हालांकि, यह लाभ परियोजना की अंतिम लागत, बिजली की कीमत, ट्रांसमिशन व्यवस्था और कारोबारी मॉडल पर निर्भर करेगा।
9 अरब डॉलर की लागत के बीच बिजनेस मॉडल सबसे बड़ी चुनौती
परियोजना के लिए तकनीकी संभावना का आकलन पूरा हो चुका है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि 9 अरब डॉलर की परियोजना को अंतिम मंजूरी मिल गई है। फिलहाल दोनों सरकारों के सामने सबसे अहम सवाल आर्थिक व्यवहार्यता का है।समुद्र के नीचे करीब 2,100 किलोमीटर लंबी हाई-वोल्टेज केबल बिछाने, कन्वर्टर स्टेशन बनाने और दोनों देशों के बिजली ग्रिड को जोड़ने में बड़ी पूंजी लगेगी। शुरुआती अनुमान करीब 5 अरब डॉलर था, जबकि मौजूदा अनुमान करीब 9 अरब डॉलर है। इसलिए 5 अक्टूबर की बैठक में लागत घटाने और परियोजना को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाने के तरीकों पर चर्चा महत्वपूर्ण होगी।
भारत के लिए इसका महत्व केवल सऊदी अरब से बिजली लेने या उसे बिजली बेचने तक सीमित नहीं होगा। यह भारत के बिजली ग्रिड को पश्चिम एशिया के ग्रिड से जोड़ने की दिशा में एक नया रास्ता खोल सकता है। इससे भविष्य में नवीकरणीय ऊर्जा के अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए भी आधार तैयार हो सकता है।
भारत-सऊदी निवेश समझौते के बाद पावर लिंक पर बढ़ी चर्चा
इस परियोजना पर चर्चा ऐसे समय हो रही है जब भारत और सऊदी अरब ने 29 सितंबर 2026 को अपने बाइलेट्रल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी यानी द्विपक्षीय निवेश समझौते पर बातचीत पूरी की है। दोनों देश अब इसके जल्द लागू होने की दिशा में काम कर रहे हैं।यह समझौता दोनों देशों के बीच निवेश के लिए ज्यादा पूर्वानुमान योग्य ढांचा तैयार करने के उद्देश्य से किया गया है। ऐसे में बिजली ट्रांसमिशन जैसी बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए निवेश और कारोबारी माहौल भी चर्चा का हिस्सा बन सकता है।
भारत और सऊदी अरब पहले से ऊर्जा, निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में रणनीतिक साझेदार हैं। प्रस्तावित अंडरसी पावर लिंक इस रिश्ते में बिजली और ग्रिड कनेक्टिविटी का एक नया आयाम जोड़ सकता है। लेकिन फिलहाल परियोजना की दिशा 5 अक्टूबर की बैठक में होने वाली आर्थिक और तकनीकी चर्चा पर निर्भर करेगी।
FAQ (Frequently Asked Questions):
भारत और Saudi Arabia के बीच Undersea Power Link क्या है?
यह भारत और सऊदी अरब के बिजली ग्रिड को समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली हाई-वोल्टेज बिजली केबल के जरिए जोड़ने की प्रस्तावित परियोजना है। मौजूदा फिजिबिलिटी स्टडी के अनुसार इसकी लंबाई करीब 2,100 किलोमीटर और ट्रांसमिशन क्षमता 3 गीगावाट होगी।
India-Saudi Arabia Undersea Power Link की अनुमानित लागत कितनी है?
फिजिबिलिटी स्टडी के मौजूदा अनुमान के मुताबिक परियोजना की लागत करीब 9 अरब डॉलर है। शुरुआती प्रस्ताव के समय इसकी लागत करीब 5 अरब डॉलर आंकी गई थी।
भारत और Saudi Arabia के बीच Power Link पर बातचीत कब होगी?
दोनों देशों के बीच जॉइंट वर्किंग ग्रुप ऑन एनर्जी की बैठक 5 अक्टूबर को होगी। इसमें फिजिबिलिटी स्टडी, परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता और लागत कम करने के विकल्पों पर चर्चा होगी।
Undersea Power Link से India और Saudi Arabia को क्या फायदा होगा?
यह दोनों देशों के बीच बिजली का सीमा-पार आदान-प्रदान संभव बना सकता है। इससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और नवीकरणीय ऊर्जा को बिजली ग्रिड में बेहतर तरीके से शामिल करने में मदद मिल सकती है।
India-Saudi Arabia Power Link का Energy Sector में क्या महत्व है?
यह भारत को पश्चिम एशिया के बिजली नेटवर्क से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण परियोजना बन सकती है और भारत की वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड की सोच से भी जुड़ती है। हालांकि, अंतिम महत्व परियोजना की लागत, कारोबारी मॉडल और इसे लागू करने की व्यवहार्यता पर निर्भर करेगा।