CEC Removal Process - विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की, मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?
CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग फिर चर्चा में है। विपक्ष सितंबर 2026 में नया रिमूवल मोशन लाने की तैयारी कर रहा है। CEC को केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर, सुप्रीम कोर्ट जज जैसी संसदीय प्रक्रिया के बाद राष्ट्रपति हटा सकते हैं।
CEC Removal को द इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद तेज हुआ, जिसमें दावा किया गया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने कुछ फैसलों को लेकर जानकारी से बाहर रखे जाने, नए मतदाताओं से जुड़े फॉर्म में बदलाव और मतदाता सूची से नाम हटाने जैसी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए थे। विपक्षी दलों ने इसे निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर गंभीर मुद्दा बताया है।
इसके बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी दल संसद के दोनों सदनों में ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए नया मोशन लाने की तैयारी कर रहे हैं। द इंडियन एक्सप्रेस ने 24 सितंबर को कांग्रेस सूत्रों के हवाले से बताया कि दोनों सदनों में नोटिस देने के लिए मोशन तैयार किया जा रहा है। हालांकि, यह अभी प्रस्तावित कदम है, यानी इसे संसद में स्वीकार किया जाना या आगे की प्रक्रिया शुरू होना अलग चरण है।इससे पहले मार्च 2026 में भी विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाला नोटिस दिया था।
लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सदस्यों के हस्ताक्षर वाले इन नोटिसों को अप्रैल में लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन ने स्वीकार नहीं किया था। इसलिए उस समय की प्रक्रिया शुरुआती स्तर पर ही खत्म हो गई थी।अब सवाल यह है कि भारत में CEC की नियुक्ति कौन करता है, उन्हें हटाने की प्रक्रिया क्या है और संसद की इसमें कितनी भूमिका होती है।

CEC की नियुक्ति कैसे होती है?
भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसकी जिम्मेदारी संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों से जुड़े कामों की निगरानी करना है। संविधान के अनुच्छेद 324 में निर्वाचन आयोग का प्रावधान है। इसके तहत राष्ट्रपति CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं, लेकिन नियुक्ति की प्रक्रिया अब संसद द्वारा बनाए गए 2023 के कानून से निर्धारित होती है।चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स (अपॉइंटमेंट, कंडीशंस ऑफ सर्विस एंड टर्म ऑफ ऑफिस) एक्ट, 2023 के तहत नियुक्ति की सिफारिश तीन सदस्यों वाली सिलेक्शन कमिटी करती है। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। राष्ट्रपति इसी कमिटी की सिफारिश पर CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं।
कानून के मुताबिक उम्मीदवार ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो भारत सरकार में सेक्रेटरी के बराबर पद पर रह चुका हो या रह रहा हो। उसके पास ईमानदारी के साथ चुनावों के प्रबंधन और संचालन का ज्ञान व अनुभव भी होना चाहिए। CEC और निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल छह साल या 65 साल की उम्र तक, जो भी पहले हो, रहता है और दोबारा नियुक्ति का प्रावधान नहीं है।
एक और जरूरी बात यह है कि 2023 के बिल के शुरुआती ड्राफ्ट में CEC और निर्वाचन आयुक्तों की सैलरी कैबिनेट सेक्रेटरी के बराबर करने का प्रस्ताव था। लेकिन संसद में इसे संशोधित कर अंतिम कानून में सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर सैलरी का प्रावधान रखा गया।

CEC को हटाना इतना आसान क्यों नहीं है?
CEC को संविधान में विशेष सुरक्षा मिली हुई है। अनुच्छेद 324(5) के अनुसार CEC को पद से उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों और तरीके से सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। इसका मतलब यह है कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्र सरकार अकेले आदेश जारी करके CEC को पद से नहीं हटा सकते।CEC को हटाने के दो संवैधानिक आधार हैं - सिद्ध कदाचार यानी proved misbehaviour और अक्षमता यानी incapacity। केवल राजनीतिक असहमति या किसी फैसले से नाराजगी अपने आप में CEC को हटाने का संवैधानिक आधार नहीं बनती। आरोपों को निर्धारित जांच प्रक्रिया में साबित करना जरूरी होता है। यही वजह है कि संसद में CEC के खिलाफ सिर्फ मोशन लाना और वास्तव में उन्हें पद से हटाना दो अलग-अलग चीजें हैं।
संसद में रिमूवल मोशन आने के बाद क्या होता है?
CEC को हटाने की प्रक्रिया की शुरुआत संसद के किसी एक सदन में रिमूवल मोशन के नोटिस से हो सकती है। इसके लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। नोटिस मिलने के बाद लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा के चेयरमैन के पास यह अधिकार होता है कि वे उपलब्ध सामग्री और लागू नियमों को देखते हुए नोटिस स्वीकार करें या खारिज कर दें।अगर नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है तो मामला जांच कमिटी के पास जाता है। जजेज इंक्वायरी एक्ट, 1968 के तहत बनने वाली कमिटी में तीन सदस्य होते हैं। इनमें सुप्रीम कोर्ट का एक जज, किसी हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ यानी डिस्टिंग्विश्ड ज्यूरिस्ट शामिल होता है। कमिटी आरोपों की जांच करती है और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर भी देती है।
अगर जांच कमिटी को कदाचार या अक्षमता साबित नहीं मिलती, तो हटाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती। लेकिन अगर आरोप साबित पाए जाते हैं तो कमिटी की रिपोर्ट संसद के सामने रखी जाती है।
इसके बाद भी CEC की पद से हटना अपने आप नहीं होता। दोनों सदनों को अलग-अलग एक एड्रेस यानी प्रस्ताव पारित करना होता है। इसके लिए उस सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और मौजूद तथा वोट करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है। दोनों सदनों में यह प्रस्ताव एक ही सत्र में पारित होना चाहिए। इसके बाद प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास जाता है और राष्ट्रपति CEC को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं।
बाकी निर्वाचन आयुक्तों के लिए नियम अलग हैं
CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सुरक्षा में संविधान ने स्पष्ट अंतर रखा है। किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त या रीजनल कमिश्नर को राष्ट्रपति केवल CEC की सिफारिश पर ही पद से हटा सकते हैं। इसके विपरीत CEC को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी संसदीय प्रक्रिया जरूरी है। 2023 के कानून की धारा 11 भी इसी व्यवस्था को दोहराती है।इसका मतलब यह हुआ कि CEC को हटाने की संवैधानिक सुरक्षा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की तुलना में ज्यादा है।

ज्ञानेश कुमार के मामले में अभी मामला किस चरण में है?
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मार्च 2026 में विपक्ष ने रिमूवल मोशन का नोटिस दिया था। लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सदस्यों के हस्ताक्षर वाले इन नोटिसों को दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने अप्रैल में स्वीकार नहीं किया। इसलिए उस प्रयास में जांच कमिटी बनने या संसद में हटाने के प्रस्ताव पर मतदान तक मामला नहीं पहुंचा।अब सितंबर 2026 में SIR को लेकर निर्वाचन आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्ष फिर से नया नोटिस लाने की तैयारी कर रहा है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज की थी। इनमें नए मतदाताओं के फॉर्म में बदलाव और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर सवाल शामिल थे।
वहीं बीजेपी ने इन मतभेदों को अलग तरीके से देखा है। पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि निर्वाचन आयुक्तों के बीच असहमति को लोकतांत्रिक संस्था के भीतर चर्चा के रूप में देखा जाना चाहिए और SIR को लेकर फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। इसलिए फिलहाल ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग राजनीतिक बहस का विषय है, जबकि उन्हें पद से हटाने के लिए संविधान में तय जांच और दोनों सदनों की विशेष बहुमत वाली प्रक्रिया से गुजरना होगा। संसद में नया नोटिस आने के बाद उसका स्वीकार होना पहला महत्वपूर्ण चरण होगा।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Chief Election Commissioner को India में कैसे हटाया जा सकता है?
CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही हटाया जा सकता है। इसके लिए proved misbehaviour या incapacity का आधार होना चाहिए। संसद में निर्धारित संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर वाला मोशन स्वीकार होने के बाद जांच कमिटी आरोपों की जांच करती है। आरोप साबित होने पर दोनों सदनों को विशेष बहुमत से हटाने का प्रस्ताव पारित करना होता है और इसके बाद राष्ट्रपति आदेश जारी करते हैं।
Gyanesh Kumar को हटाने की मांग क्यों की जा रही है?
सितंबर 2026 में द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ फिर से रिमूवल मोशन लाने की तैयारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं पर पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की थी। विपक्ष ने इन रिपोर्टेड मतभेदों को निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर गंभीर मुद्दा बताया है।
Article 324 CEC removal के बारे में क्या कहता है?
अनुच्छेद 324(5) कहता है कि CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन तरीके और आधारों पर सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। इसके तहत proved misbehaviour या incapacity पर ही हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
क्या Parliament Chief Election Commissioner को remove कर सकती है?
संसद खुद सीधे CEC को पद से नहीं हटाती। दोनों सदनों को संवैधानिक प्रक्रिया के तहत विशेष बहुमत से राष्ट्रपति के सामने हटाने का एड्रेस पारित करना होता है। इसके बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं।
CEC को हटाने के लिए किस तरह की parliamentary process होती है?
लोकसभा में कम से कम 100 या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर से मोशन का नोटिस दिया जा सकता है। नोटिस स्वीकार होने पर तीन सदस्यीय जांच कमिटी आरोपों की जांच करती है। आरोप साबित होने पर दोनों सदनों में कुल सदस्य संख्या के बहुमत और मौजूद तथा वोट करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है। दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद मामला राष्ट्रपति के पास जाता है।