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Sexual Offences Reporting पर SC सख्त! Media को क्यों कहा- सनसनी नहीं, संवेदनशीलता जरूरी?

सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों की रिपोर्टिंग में सनसनीखेज भाषा, ग्राफिक विवरण और पीड़ित की पहचान उजागर करने से बचने को कहा। कोर्ट ने मीडिया से तथ्यात्मक, संवेदनशील और जिम्मेदार पत्रकारिता करने तथा लोगों तक सहायता और सुरक्षा संबंधी जानकारी पहुंचाने पर जोर दिया।

Sexual Offences Reporting पर SC सख्त! Media को क्यों कहा- सनसनी नहीं, संवेदनशीलता जरूरी?

यौन अपराधों की खबरों में SC responsible journalism sexual offences पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। 28 सितंबर 2026 को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मीडिया संस्थानों, पत्रकारों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग में जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और संयम बरतने को कहा। कोर्ट ने कहा कि सनसनीखेज हेडलाइन और यौन हिंसा के ग्राफिक विवरण पीड़ितों और उनके परिवारों को दोबारा मानसिक आघात पहुंचा सकते हैं।

SC Responsible Journalism Sexual Offences पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों की रिपोर्टिंग में पत्रकारिता का उद्देश्य सिर्फ घटना को सनसनीखेज तरीके से पेश करना नहीं, बल्कि तथ्यात्मक जानकारी देना और न्याय व सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर ध्यान रखना होना चाहिए। कोर्ट के मुताबिक, sensationalist headlines, यौन हिंसा के भड़काऊ या अनावश्यक विवरण और असंवेदनशील भाषा किसी सार्वजनिक हित की पूर्ति नहीं करते। इसके बजाय ऐसी रिपोर्टिंग पीड़ित और उसके परिवार के लिए गंभीर secondary trauma का कारण बन सकती है।कोर्ट ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया से रिपोर्टिंग में पीड़ित की गरिमा और तथ्यात्मक सटीकता को प्राथमिकता देने को कहा।

किन मामलों के बाद कोर्ट ने लिया संज्ञान?

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में सामने आए हालिया यौन अपराधों से जुड़े मामलों पर संज्ञान लिया। इनमें दक्षिण दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की से कथित सामूहिक दुष्कर्म, स्वरूप नगर इलाके में एक किशोरी से कथित सामूहिक दुष्कर्म और हत्या तथा ग्रेटर नोएडा से दिल्ली तक चलती स्लीपर बस में नाबालिग लड़की से कथित यौन हमले का मामला शामिल था।कोर्ट ने इन मामलों के संदर्भ में मीडिया रिपोर्टिंग की भूमिका और उसके प्रभाव पर भी जोर दिया। संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर 28 सितंबर 2026 का आदेश दर्ज है।

Victim की पहचान को लेकर क्या है नियम?

सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को यौन अपराधों के पीड़ितों की पहचान सार्वजनिक नहीं करने के कानूनी प्रावधानों की याद दिलाई। कोर्ट ने BNS Section 72 और POCSO Act Section 23 का उल्लेख करते हुए कहा कि पीड़ित या नाबालिग की पहचान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से उजागर नहीं होनी चाहिए।इसका मतलब केवल नाम छिपाना ही नहीं है। ऐसी जानकारी प्रकाशित करने से भी बचना जरूरी है जिससे लोग पीड़ित की पहचान का अनुमान लगा सकें।

Media से मदद की जानकारी देने की भी अपील

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिला प्रशासन को स्थानीय मीडिया संस्थानों के साथ बैठक कर सुरक्षा और सहायता से जुड़ी जानकारी के लिए अखबारों में समर्पित कॉलम और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में निर्धारित समय उपलब्ध कराने पर विचार करना चाहिए।कोर्ट ने ऐसे हेल्पलाइन नंबर और सुरक्षात्मक उपायों की जानकारी लोगों तक पहुंचाने की जरूरत पर भी जोर दिया, ताकि किसी संभावित खतरे की स्थिति में प्रभावित व्यक्ति तुरंत सहायता ले सके।अदालत ने इस मुद्दे में सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता लिज मैथ्यू को Amicus Curiae नियुक्त किया है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सीधा संदेश है कि SC responsible journalism sexual offences का मतलब सिर्फ खबर देना नहीं, बल्कि उसे इस तरह पेश करना है जिससे पीड़ित की गरिमा और निजता सुरक्षित रहे। यौन अपराधों की रिपोर्टिंग में तथ्य, संवेदनशीलता और जवाबदेही को प्राथमिकता देते हुए सनसनीखेज भाषा और अनावश्यक विवरण से बचना जरूरी है।

FAQ (Frequently Asked Questions):

SC ने sexual offences की reporting को लेकर क्या कहा?

कोर्ट ने जिम्मेदार, संवेदनशील और संयमित पत्रकारिता पर जोर दिया तथा सनसनीखेज हेडलाइन और ग्राफिक विवरण से बचने को कहा।

Victim की पहचान सार्वजनिक क्यों नहीं की जा सकती?

कानून यौन अपराधों के पीड़ितों और POCSO मामलों में नाबालिगों की पहचान उजागर करने पर रोक लगाता है।

क्या केवल नाम प्रकाशित करना ही पहचान उजागर करना माना जा सकता है?

ऐसी अप्रत्यक्ष जानकारी से भी बचना होता है जिससे पीड़ित की पहचान सामने आ सके।

सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को और क्या सुझाव दिया?

कोर्ट ने सुरक्षा उपायों और सहायता के फोन नंबरों की जानकारी जनता तक पहुंचाने के लिए मीडिया में समर्पित जगह या समय देने की बात कही।

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