Home / International / Balen Shah UNGA Speech : UNGA में नेपाल PM की हिमालय को लेकर चेतावनी, भारत-पाकिस्तान समेत दक्षिण एशिया पर क्या होगा असर?
International

Balen Shah UNGA Speech : UNGA में नेपाल PM की हिमालय को लेकर चेतावनी, भारत-पाकिस्तान समेत दक्षिण एशिया पर क्या होगा असर?

नेपाल के PM बालेन्द्र शाह ने UNGA में अगस्त की बाढ़ को जलवायु संकट की चेतावनी बताते हुए भारत-पाकिस्तान समेत दक्षिण एशिया का जिक्र किया। उन्होंने नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसमें डेटा शेयरिंग और साझा अर्ली वार्निंग सिस्टम शामिल हैं।

Balen Shah UNGA Speech : UNGA में नेपाल PM की हिमालय को लेकर चेतावनी, भारत-पाकिस्तान समेत दक्षिण एशिया पर क्या होगा असर?

Balen Shah UNGA Speech : नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने 81वें संयुक्त राष्ट्र महासभा यानी UNGA में अपने पहले बड़े संबोधन में जलवायु परिवर्तन, हिमालयी आपदा और दक्षिण एशिया के बदलते संकटों को दुनिया के सामने रखा। 24 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में दिए भाषण में शाह ने अगस्त में नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ का जिक्र करते हुए कहा कि इस आपदा ने दिखाया है कि जलवायु संकट की सबसे बड़ी कीमत उन लोगों को चुकानी पड़ रही है, जिन्होंने इसे पैदा करने में सबसे कम भूमिका निभाई है। उन्होंने भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव और श्रीलंका समेत पूरे दक्षिण एशिया का जिक्र करते हुए कहा कि यह केवल नेपाल की समस्या नहीं है। इसी भाषण में उन्होंने युद्ध और खाद्य आपूर्ति के बीच तुलना करते हुए कहा कि दुनिया ने युद्ध के लिए बेहद मजबूत लॉजिस्टिक्स बना लिए हैं, लेकिन भोजन पहुंचाने की व्यवस्था कमजोर है। इसके साथ ही शाह ने नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म बनाने का प्रस्ताव भी रखा, जिसमें सैटेलाइट डेटा शेयरिंग, ग्लेशियर और ग्लेशियल लेक्स की निगरानी, साझा अर्ली वार्निंग सिस्टम और सीमा पार आपदा सहायता शामिल होगी।

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह UN जनरल असेंबली को संबोधित कर रहे हैं।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह UN जनरल असेंबली को संबोधित कर रहे हैं।

UNGA में बाढ़ से लेकर जलवायु संकट तक, शाह ने दक्षिण एशिया को जोड़ा

बालेन्द्र शाह के भाषण का सबसे बड़ा हिस्सा नेपाल में 26 अगस्त को आई भोटेकोशी-त्रिशूली बाढ़ और उसके बाद पैदा हुई मानवीय तबाही पर केंद्रित रहा। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों से जुड़ी एक बड़ी घटना के बाद आई बाढ़ ने उत्तरी और मध्य नेपाल के कई इलाकों में भारी नुकसान किया। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार इस आपदा में 1,400 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और हजारों लोग लापता हुए। हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, सड़कें, पुल, बस्तियां और दूसरी बुनियादी सुविधाएं भी बुरी तरह प्रभावित हुईं।शाह ने UNGA में इस घटना को सिर्फ नेपाल की स्थानीय त्रासदी मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है और सवाल उठाया कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस चेतावनी को वास्तव में सुना है।
नेपाल की सरकारी आपदा एजेंसियों के आंकड़ों में भी समय के साथ स्थिति बदलती रही है। 20 सितंबर की नेपाल सरकार की स्थिति रिपोर्ट में 1,451 लोगों के हताहत होने और 5,786 लोगों के लापता होने का आंकड़ा दिया गया था, जबकि 13,784 लोगों को बचाए जाने की जानकारी थी। इससे पहले 13-14 सितंबर की रिपोर्टों में लापता लोगों की संख्या 5,130 बताई गई थी। इसलिए UNGA भाषण में शाह की ओर से 6,000 से ज्यादा लापता लोगों का उल्लेख उस समय उपलब्ध व्यापक आकलन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
शाह ने कहा कि जलवायु संकट का असर उन देशों पर ज्यादा पड़ रहा है जिनका ऐतिहासिक योगदान इसके लिए कम रहा है। उनके भाषण में क्लाइमेट जस्टिस यानी जलवायु न्याय का मुद्दा भी इसी संदर्भ में सामने आया। उन्होंने तर्क दिया कि जिन देशों ने ऐतिहासिक रूप से जलवायु संकट में ज्यादा योगदान दिया है और जिनके पास इससे निपटने की अधिक क्षमता है, उन्हें ज्यादा जिम्मेदारी उठानी चाहिए। उनके मुताबिक जलवायु न्याय केवल संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेजों में इस्तेमाल होने वाला शब्द नहीं रहना चाहिए।

“Ask India, Ask Pakistan” से शाह ने पूरे क्षेत्र का जिक्र किया

बालेन्द्र शाह ने अपने भाषण में भारत और पाकिस्तान का नाम जिस तरह लिया, वह भी चर्चा में रहा। उन्होंने कहा कि नेपाल जिस संकट का सामना कर रहा है, वह उसकी अपनी समस्या नहीं है। इसके बाद उन्होंने दक्षिण एशिया के कई देशों का नाम लेते हुए कहा कि बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, पाकिस्तान और श्रीलंका से भी बात की जाए तो वहां भी इसी तरह की चिंताएं सुनने को मिलेंगी।उनका संदेश यह था कि जलवायु परिवर्तन और उससे पैदा होने वाली आपदाएं राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहतीं। हिमालय से निकलने वाली नदियां और ग्लेशियर कई देशों की जल व्यवस्था, कृषि और आबादी से जुड़े हैं। इसलिए किसी एक देश में होने वाली ग्लेशियर, बाढ़ या भूस्खलन की घटना का असर सीमा पार के इलाकों तक जा सकता है।
शाह ने इसी संदर्भ में कहा कि जलवायु परिवर्तन सीमाओं को नहीं पहचानता। ग्लेशियर और बाढ़ पासपोर्ट पर वीजा लगाकर एक देश से दूसरे देश में नहीं जाते। उनका यह तर्क खास तौर पर हिमालयी क्षेत्र के संदर्भ में था, जहां नेपाल, भारत और चीन के बीच पर्वतीय और नदी तंत्र आपस में जुड़े हुए हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि शाह ने भारत या पाकिस्तान को अगस्त की नेपाली आपदा के लिए जिम्मेदार ठहराया। भाषण का संदर्भ यह था कि पूरे दक्षिण एशिया को जलवायु और आपदा जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है और क्षेत्रीय सहयोग के बिना इनसे निपटना मुश्किल होगा।

“War के लिए flawless logistics, food के लिए broken logistics”

बालेन्द्र शाह ने अपने भाषण में जलवायु संकट को युद्ध और वैश्विक सप्लाई चेन से भी जोड़ा। उन्होंने कहा, “हमने युद्ध के लिए flawless logistics वाला संसार बनाया है और भोजन के लिए broken logistics वाला संसार।”इस तुलना के जरिए शाह ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि दुनिया ने युद्ध के दौरान हथियार, सैन्य सामग्री और दूसरी जरूरी चीजों को तेजी से पहुंचाने के लिए जटिल और मजबूत सप्लाई नेटवर्क तैयार कर लिए हैं, लेकिन जब प्राकृतिक आपदा, भूख और मानवीय संकट आता है तो राहत और भोजन की आपूर्ति उतनी मजबूत नहीं दिखाई देती।
उनके भाषण में जलवायु परिवर्तन और संघर्ष को अलग-अलग संकट नहीं माना गया। शाह ने कहा कि नेपाल और दक्षिण एशिया के दूसरे देश ऐसे संकटों का सामना कर रहे हैं जिनकी शुरुआत उन्होंने नहीं की। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि क्षेत्र के लोग उस जलवायु की मार झेल रहे हैं जिसे उन्होंने गर्म नहीं किया और उन युद्धों का असर भी झेल रहे हैं जिन्हें उन्होंने शुरू नहीं किया।
यह टिप्पणी केवल नेपाल की बाढ़ तक सीमित नहीं थी। शाह ने इसे दक्षिण एशिया और व्यापक वैश्विक व्यवस्था की समस्या के रूप में पेश किया।

हिमालय को लेकर नेपाल, भारत और चीन के लिए नया प्रस्ताव

शाह के UNGA भाषण का सबसे ठोस प्रस्ताव हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म था। उन्होंने इसे नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में बनाने की बात कही। इसका उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र में जलवायु से जुड़ी आपदाओं के लिए तीनों देशों के बीच ज्यादा संस्थागत सहयोग तैयार करना है।प्रस्ताव के तहत सैटेलाइट डेटा और तकनीकी विशेषज्ञता साझा करने की बात कही गई है। इसके अलावा खतरनाक ग्लेशियल लेक्स की संयुक्त निगरानी, अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने और आपदा के समय सीमा पार राहत एवं सहायता कोऑर्डिनेट करने का सुझाव दिया गया है।
शाह ने हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र को करीब दो अरब लोगों के लिए महत्वपूर्ण बताया। इस क्षेत्र की नदियां और पारिस्थितिकी तंत्र पानी, कृषि और आजीविका से जुड़े हैं। इसलिए उनके मुताबिक हिमालय को केवल देशों के बीच की सीमा के तौर पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के क्षेत्र के रूप में देखा जाना चाहिए।
शाह ने कहा कि हिमालय को ऐसा क्षेत्र बनाया जाना चाहिए जहां देश मिलकर आपदा से जुड़ी जानकारी और तकनीक साझा करें, न कि ऐसा इलाका जहां जानकारी अलग-अलग देशों की सीमाओं के भीतर बिखरी रहे।
इस प्रस्ताव में भारत और चीन दोनों को शामिल करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाल भौगोलिक रूप से दोनों देशों के बीच स्थित है और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र तीनों देशों से जुड़ा हुआ है। हालांकि अभी यह एक प्रस्ताव है; इसे लागू करने के लिए तीनों देशों के बीच आगे संस्थागत और कूटनीतिक बातचीत की जरूरत होगी।

जलवायु परिवर्तन से हिमालय में बढ़ रहा जोखिम

शाह ने अपने भाषण में ग्लोबल वार्मिंग के हिमालय पर पड़ने वाले प्रभाव को भी रेखांकित किया। उनका कहना था कि तापमान बढ़ने के साथ हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र अस्थिर हो रहा है। पर्माफ्रॉस्ट यानी लंबे समय से जमी हुई जमीन के पिघलने से पहाड़ी ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है और इससे हिमस्खलन, बाढ़ तथा भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है।हाल की नेपाली आपदा ने इस चिंता को और गंभीर बना दिया है। 26 अगस्त की घटना के बाद नेपाल के कई जिलों में सड़कों, पुलों, घरों और हाइड्रोपावर से जुड़ी सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भी उस समय बताया था कि रेस्क्यू और राहत अभियान में रासुवा, नुवाकोट, धादिंग और नदी के रास्ते में आने वाले अन्य जिलों में बड़े स्तर पर नुकसान हुआ।
यही वजह है कि शाह ने आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने के बजाय पहले से चेतावनी देने और जोखिम की निगरानी करने पर जोर दिया। प्रस्तावित मैकेनिज्म में ग्लेशियल लेक्स की निगरानी और साझा अर्ली वार्निंग सिस्टम इसी सोच का हिस्सा है।

भारत का जिक्र सिर्फ चिंता को लेकर नहीं था

बालेन्द्र शाह ने भारत का जिक्र करते हुए केवल दक्षिण एशिया के साझा संकट की बात नहीं की। उन्होंने नेपाल को मिली मदद के लिए भारत और चीन दोनों का आभार भी जताया। UNGA के संबोधन में उन्होंने कहा कि दोनों पड़ोसी देशों ने आपदा के बाद तत्काल और उदार सहायता उपलब्ध कराई।यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाल की हालिया आपदा के बाद भारत और चीन दोनों ने राहत और बचाव में सहयोग किया है। भारत-नेपाल संबंधों के संदर्भ में आपदा प्रबंधन के अलावा कनेक्टिविटी, ऊर्जा और आर्थिक सहयोग भी महत्वपूर्ण हैं। सितंबर में भारत और नेपाल के अधिकारियों के बीच आर्थिक विकास, स्वच्छ ऊर्जा, कनेक्टिविटी और आपदा के बाद रिकवरी से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत हुई है।
इसलिए UNGA में भारत का उल्लेख केवल आलोचना के संदर्भ में नहीं था। शाह का व्यापक संदेश यह था कि हिमालयी क्षेत्र की आपदाओं से निपटने में नेपाल, भारत और चीन समेत पड़ोसी देशों के बीच ज्यादा समन्वय की जरूरत है।

नेपाल की अपनी जलवायु तैयारी पर भी शाह ने बात की

बालेन्द्र शाह ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहयोग की मांग करने के साथ नेपाल की अपनी कोशिशों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि नेपाल ने अपने क्षेत्र के लगभग आधे हिस्से में जंगलों की बहाली की है। इसके अलावा हाइड्रोपावर को क्लीन एनर्जी के स्रोत के तौर पर आगे बढ़ाने, इलेक्ट्रिक व्हीकल के इस्तेमाल को बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर क्लाइमेट अडैप्टेशन को मजबूत करने की बात कही।इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि नेपाल केवल दूसरे देशों से सहायता की मांग नहीं कर रहा, बल्कि अपने स्तर पर भी जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपाय कर रहा है। हालांकि नेपाल जैसे देश के लिए इतनी बड़ी आपदाओं से निपटना अकेले संभव नहीं है, खासकर तब जब आपदा का प्रभाव सीमाओं के पार भी फैल सकता है।
शाह ने इसी कारण जलवायु वित्त, तकनीक, डेटा और आपदा प्रबंधन में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत पर जोर दिया। उनका भाषण जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था, भोजन, सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और मानवीय जीवन से जुड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश के रूप में सामने आया।

FAQ (Frequently Asked Questions):

What did Balen Shah say about the “broken” global order?

शाह ने कहा कि दुनिया ने युद्ध के लिए “flawless logistics” यानी बेहद मजबूत लॉजिस्टिक्स तैयार किए हैं, लेकिन भोजन के लिए “broken logistics” यानी कमजोर सप्लाई व्यवस्था है। उनका तर्क था कि युद्ध और हथियारों के लिए जिस स्तर की वैश्विक व्यवस्था बनाई गई है, वैसी प्राथमिकता मानवीय और खाद्य संकटों में दिखाई नहीं देती।

Balen Shah ने “Ask India, Ask Pakistan” क्यों कहा?

उन्होंने यह बात दक्षिण एशिया में जलवायु संकट की व्यापकता बताने के लिए कही। शाह का कहना था कि अगर भारत, पाकिस्तान और क्षेत्र के दूसरे देशों से बात की जाए तो वहां भी जलवायु परिवर्तन, बाढ़ और दूसरी आपदाओं को लेकर इसी तरह की चिंताएं सामने आएंगी।

What is Balen Shah’s Himalayan Climate Resilience proposal?

शाह ने नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म बनाने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत सैटेलाइट डेटा और विशेषज्ञता साझा करने, खतरनाक ग्लेशियल लेक्स की निगरानी, साझा अर्ली वार्निंग सिस्टम मजबूत करने और आपदा के समय सीमा पार सहायता कोऑर्डिनेट करने की बात कही गई है।

Balen Shah ने food और war logistics के बीच क्या तुलना की?

शाह ने कहा कि दुनिया ने युद्ध के लिए बेहद प्रभावी लॉजिस्टिक्स तैयार किए हैं, जबकि भोजन और मानवीय सहायता की सप्लाई चेन उतनी मजबूत नहीं है। इस तुलना के जरिए उन्होंने वैश्विक प्राथमिकताओं और मानवीय संकटों से निपटने की व्यवस्था पर सवाल उठाया।

Which South Asian countries were mentioned by Balen Shah at UNGA?

अपने भाषण में शाह ने बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, पाकिस्तान और श्रीलंका का नाम लिया। उन्होंने इन देशों का उल्लेख दक्षिण एशिया में जलवायु और दूसरे साझा संकटों के संदर्भ में किया।

Was this article useful?
Full page popup ad